Saturday, July 3, 2010

सृजन, संवाद और विचार का माध्यम-‘संचेतना’

पत्रिका: संचेतना, अंक: .01वर्ष 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: महीप सिंह, पृष्ठ: 56, मूल्य:20रू.(वार्षिक 75रू.), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25222888, सम्पर्क: एच 108, शिवाजी पार्क, पंजाबी बाग, नई दिल्ली-26,
ख्यात पत्रिका संचेतना के समीक्षित अंक में कथाकार व उपन्यासकार कुसुम अंसल के नवीन उपन्यास तापसी पर कृति विमर्श के अंतर्गत विचार किया गया है। उन्होंने स्वयं इसे कैसे व क्यों लिखा गया के अंतर्गत इसकी रचना प्रक्रिया पर अपने विचार रखे हैं। पत्रिका के संपादक महीप सिंह, ख्यात साहित्यकार रमेश दवे, मीरा सीकरी, सरोज वशिष्ठ एवं विजया ने उनके लेखन का विस्तार से विश्लेषण किया है। यशवंतकर संतोष कुमार लक्ष्मण ने अपने आलेख में दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों पर अपनी बात रखी है। प्रवासी लेखिका उषा वर्मा से वंदना मुकेश की बातचीत में प्रवासी लेखकों की समस्याओं व उनके लेखन पर चर्चा अच्छी तरह पस्तुत की गई है। अब्दुल अलीम ने ख्यात उर्दू साहित्यकार ग़ज़ल गो नजीर अकबराबादी की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत किया है। कहानियों में जुम्मा(इकबाल अंसारी), गिद्ध और जानवर(कृष्णा श्रीवास्तव) एवं परिवर्तन(अखिलेश शुक्ल) आज के वातावरण में व्यप्त विसंगतियों की पड़ताल करती दिखाई देती हैं। सुनीता जैन, कुलभूषण कालड़ा, फूलचंद मानव, जसवंत सिंह विरदी, समीर बरन नंदी एवं मलविंदर सिंह की कविताएं प्रभावित करती हैं। हरि सिंह पाल का व्यंग्य, पूरन सिंह की लघुकथाएं पत्रिका को पूर्णता प्रदान करती हैं। अन्य रचनाएं समीक्षाएं व प्रतिक्रियाएं भी इसे एक सार्थक साहित्यिक पत्रिका बनाती है।

1 comment:

  1. अति सुंदर जानकारी के लिये धन्यवाद

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