Thursday, June 24, 2010

साहित्य की प्रगति के लिए ‘प्रगतिशील आकल्प’

पत्रिका: प्रगतिशील आकल्प, अंक: 35,स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. शोभनाथ यादव, पृष्ठ: 20, मूल्य:केवल आजीवन सदस्यता स्वीकार्य (आजीवन 1000रू.), ई मेल: drshobnathyadav@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 28376109, सम्पर्क: पंकज क्लासेस, पोस्ट आॅफिस बिल्ंिडग, जोगेश्वरी (पूर्व) मुम्बई 400060
टैब्लाइड आकार में मुम्बई से प्रकाशित यह पत्रिका साहित्य जगत की प्रगतिशीलता की जानकारी उपलब्ध करा रही है। समीक्षित अंक में सुरेन्द्र तिवारी जी का आत्म संघर्ष पठनीय है यह उनकी रचनाशीलत के प्रवाह को दिशा देने में लोगों के योगदान पर विचार करता है। कहानियों में तेलुगु कहानी प्राथमिकताएं(अंबल्ला जनार्दन-अनुवादः डाॅ. के.बी. नरसिंह राव), एक मुलाकात(गोवर्धन यादव), आम आदमी(शैल अग्रवाल) आम लोगों के जीवन की यातनाओं व वेदनाओं को बड़ी शिद्दत के साथ व्यक्त करती हैं। उषा यादव का आलेख साहित्य के मर्म तक पहंुचता साहित्य और परिवेश एक संग्रह योग्य प्रस्तुति है। पत्रिका में प्रकाशित प्रेम शंकर रघुवंशी की लम्बी कविता जामला आज केे प्रगतिशील समाज का आईना है। उषा यादव की कुछ ग़ज़लें पढ़ी जाने योग्य हैं। सतीश दुबे, सिद्धेश्वर एवं जसवीर चावला की लघुकथाएं पाठकों को अवश्य पसंद आएंगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं, पत्र व स्थायी स्तंभ भी पढ़ने योग्य हैं।

2 comments:

  1. अच्छी जानकारी !

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  2. बहुत अच्छी जानकारी

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