Monday, June 14, 2010

छेड़ मत दिल को कि पर्दे चाक हैं-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: जून10,स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू. (वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: www.pakhi.in , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: इंडिपेंडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर-63, नोएडा 201303 उ.प्र.
पत्रिका पाखी का समीक्षित अंक सार्थक कहानियांे का अंक है। इसमें किस्साकोताह(ए.असफल), पेंच-पाना(लता शर्मा), एक लेखक की पार्टी(अपूर्व जोशी) तथा स्पेसीमैन(जीलानी बानो) की कहानियां प्रकाशित की गई हैं। इनमें ए. असफल व पाखी के संपादक अपूर्व जोशी की कहानियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन कहानियों को वर्तमान बौद्धिक यथार्थ की कहानियां कहा जा सकता है। आजादी के बाद के दशकों में देश के साहित्य व उसके वातावरण को उजागर करती अपूर्व जोशी की कहानी यदि अंग्रेजी लिखी गई होती तो उसके पाठक इसे हाथों हाथ लेते। उनकी कहानी का अंश ‘पचास के दशक में जब हिंदी साहित्यकारों की एक पीढ़ी विदा सी हो रही थी और नई पीढ़ी, नई कहानियों के साथ, बिल्कुल नए तेवर, नए अंदाज में जन्म ले चुकी थी, उन्हीं दिनों जगन की मसें भीगने लगी थी। जवानी फनफना कर सिर उठा रही थी और घर की काम वाली बाई छोटे बाबू के कमरे में ज्यादा समय दे सफाई करने लगी थी।’ पचास के दशक व उसके बाद की साहित्यिक पार्टियों की परिणति के संबंध में सब कुछ कह जाता है। स्वयंप्रकाश जी की कहानी चैथा हादसा वर्तमान सदी की युवा पीढ़ी के साथ न्याय करती दिखाई देती है। कविताओं में ऋतुराज, रामकुमार आत्रेय, अंशु मालवीय, नरेश कुमार टांक, ज्योति किरण व शिरोमणि महतो ने विविधतापूर्ण वातावरण का सृजन किया है। राजेश रेड्डी व कमलेश कमल की ग़ज़लें भी ग़ज़ल की कसौटी पर खरी उतरती हैं। विजय शर्मा का लेख दारियो फोःएक आंदोलन नई जानकारियां प्रदान करता है। पीढ़ियां आमने सामने की सार्थक चर्चा कुछ विचारणीय प्रश्न उत्पन्न करती है जिसके लिए अलग से मंथन की आवश्यकता है। सुंदर चंद ठाकुर के उपन्यास अंश पत्थर में दूब के अंश उपन्यास के कथ्य के बारे में अधिक जानकारी नहीं दे सकेे हैं। लेखक को कोई दूसरा भाग जिससे उपन्यास के शिल्प व उसके कथ्य के बारे में जानकारी मिल उसे भेजना चाहिए था। राजीव रंजन गिरि, पुण्य प्रसून वाजपेयी, विनोद अनुपम तथा रवीन्द्र त्रिपाठी के स्तंभ हमेशा की तरह गंभीर विश्लेषणात्मक चिंतन प्रस्तुत करते हैं। उप संपादक प्रतिभा कुशवाहा के ब्लाॅगनामा का आलेख ‘मम्मी चलो चांद पर जाएं’ ब्लाॅग जगत में बच्चों पर लेखन के बारे में विस्तार से जानकारी देता है। पत्रिका की मीमांसा, बीज तथा लघुकथाएं व समाचार भी विचारणीय व पठनीय हैं। पत्रिका के इस अंक में संपादकीय की कमी महसूस हुई।

2 comments:

  1. अपुन तो हिन्दी मैग. फोकट मे लेना मांगता ,बोल भेजेगा ?

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  2. ek acchi patrika hai. aporv joshi ki kahani pasand ayye.

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