Sunday, May 30, 2010

आदिवासी कल्याण के लिए-‘अरावली उद्घोष’

पत्रिका: अरावली उद्घोष, अंक: मार्च2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: वी.पी. वर्मा ‘पथिक’, पृष्ठ: 80, मूल्य:20रू.(वार्षिक 80रू.), ई मेल: not avilable , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 02942431742, सम्पर्क: 448,टीचर्स कालोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर 313001(राजस्थान)
पत्रिका का समीक्षित अंक आदिवासी कहानी विशेषांक द्वितीय है। अंक में आदिवासी जीवन व उनकी संस्कृति पर एकाग्र रचनाओ का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- समर्पण(विजयकांत), शालवन में तबदील होती लड़की(भवानी सिंह), सलीब(बिपिन बिहारी), समायोजन(सुरेन्द्र नायक), बेस(रत्नकुमार सांभरिया), एक बित्ता जमीन(डाॅ. कृष्णचंद्र टुडू), दूल्हा ढेके पर(चन्दालाल चकवाला), वही चप्पलें(भारत दोषी) एवं उड़ान(डाॅ. लखनलाल पाल)। इन कहानियों का शिल्प आधुनिक होते हुए भी आदिवासी कल्याण के लिए तड़प दिखाई देती है। पत्रिका में प्रकाशित लघुकथाओं में भवानीे सिंह हिरवानी, अशफाक कादरी एवं तारिक असलम ‘तस्नीम’ की लघुकथाएं मानव जीवन के विभिन्न पक्षों पर बारीकी से विचार करती हैं। साहित्य और सरोकार के अंतर्गत वेद व्यास, डाॅ. साजिद मेवाली, डाॅ. यशोदा मीणा एवं ख्यात लोक गायक धवले मीणा से बातचीत उल्लेखनीय हैं। संपादक लेखिका रमणिका गुप्ता का आलेख सत्ता में अविश्वास ने ही जन्म दिया है नक्सलवाद को पत्रिका का स्वर मुखर करता है। वर्षो से आदिवासियों के विस्थापन का दर्द-तड़प तथा उनके पुनर्वास की मांग करती रचनाओं में ‘हमारी दुनिया हमारे लोग’ विशेष स्तंभ के अंतर्गत पत्रिका के संपादक व रचनाकार हरिराम मीणा का लेख पाठकों के विचार के लिए नए आयाम देता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समाचार, पत्र आदि इसे पठनीय व संग्रह योग्य बनाते हैं। पत्रिका के अतिथि संपादक शंकरलाल मीणा का संपादकीय चिंतन और चेतना के खत्म होने के खतरे के वक्त में आम जीवन पर नए सिरे से विचार करने की ओर पुरजोर तरीके से संकेत करता है।

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