Thursday, May 27, 2010

क्यों हों साहित्य कला के सरोकार-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: मई2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू. (वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: www.pakhi.in , फोन/मो. (0120)4070300, सम्पर्क: इंडिपेडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोयड़ा उ.प्र.
पाखी का समीक्षित अंक अपने पूर्ववर्ती अंकों के समान समसामयिक व पठनीय रचनाओं से युक्त है। अंक में दलित विमर्श पर नए सिरे से विचार किया गया है। दलित व उनको लेकर राजनीति पर गहन विमर्श युक्त पत्रिका का यह भाग संग्रह योग्य होने के साथ साथ समय सापेक्ष भी है। इस भाग में अनिल चमडिया, गुरूदयाल सिंह, मित्तरसेन मीत, रत्नकुमार सांभरिया, कृष्ण प्रताप सिंह, राजेन्द्र यादव, कंवल भारती, उदित राज, आशीष नंदी, प्रो. तुलसीराम, चन्द्रभान प्रसाद एवं रामबहादुर राय के विचार प्रकाशित किए गए हैं। पत्रिका की कहानियां ो पीढ़ियों के मध्य संवाद स्थापित करती हुई दिखाई देती हैं। इनमें प्रमुख हैं - कथा(जितेन्द्र ठाकुर), उन्होंने कहा था(सोनाली सिंह), मास्टर साहब की डायरी(अरविंद शेष), हरि मुस्कानों वाला कोलाज(गौतम राजरिशी) एवं इंतजार पांचवे सपने का(प्रेम भारद्वाज)। प्रेम भारद्वाज की कहानी के साथ टिप्पणी प्रकाशित की गई है जिसमें स्पष्ट किया गया है कि यह रचना दो ख्यात पत्रिकाओं से लौट आई है। किसी रचना का पत्रिकाआंे से लौटना यह कभी नहीं दर्शाता कि वह रचना अनुपयोगी है अथवा उसका कोई औचित्य नहीं है। एक ख्यात पत्रिका के संपादक को यह कहते हुए मैंने सुना है कि अमुक कथाकार बहुत सुंदर है उनकी कहानी तो इस अंक में जाना ही चाहिए। जब किसी रचना के प्रकाशन संबंधी इस तरह के मानदण्ड स्थापित होने लगेंगे तो मेरे जैसे कुरूप व असंदुर रचनाकार को शायद प्रकाशन के लिए पुनर्जन्म लेना पडे़गा। दूसरी ओर आजकल रचनाओं का प्रकाशित होना न होना आपसी संबंधों व सम्पर्को पर निर्भर होता जा रहा है। इसलिए आप किसी भी ख्यात पत्रिका को उठाकर देख लीजिए एक न एक रचना बेकार व लचर मिल ही जाएगी। अंक में भारत भारद्वाज, अरविंद अवस्थी, डाॅ. रंजना जायसवाल एवं संतोष कुमार तिवारी की कविताएं सिद्ध करती है कि कविता विधा का अस्तित्व अनंत काल तक बना रहेगा भले ही कोई कुछ भी कहता रहे। राधेश्याम व कुमार विनोद के गीत ग़ज़ल प्रभावशाली है। देवेन्द्र कुमार पाठक, डाॅ. वेदप्रकाश अमिताभ व श्रीभगवान सिंह के आलेख पत्रिका के विविध स्परूप को अधिक स्पष्ट करते हैं। राजीव रंजन गिरि, पुण्य प्रसून वाजपेयी, विनोद अनुपम रवीन्द्र त्रिपाठी, प्रेम भारद्वाज एवं प्रतिभा कुशवाहा के स्तंभ अधिक गंभीरता से तो नहीं पढ़ सका लेकिन इतना अवश्य है कि इनमें इतना कुछ है जो साहित्य तो क्या हिंदी भाषा की किसी दूसरी पत्रिका में भी नहीं मिलेगा (ब्लाग के पाठक यह न समझे कि मुझे अतिरिक्त प्रशंसा का कोई भुगतान किया गया है।) पत्रिका की समीक्षाएं व लघुकथाएं भी पत्र तथा साहित्यिक समाचारों के साथ रचना पढ़ने का आनंद देती है। पत्रिका का संपादकीय हमेशा की तरह धारयुक्त व प्रहारक है। बधाई

2 comments:

  1. बहुत अच्छी विवेचना। आपका कर्य बहुत ही अच्छा है।

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