Sunday, May 16, 2010

‘हंस’ नहीं राजहंस कहिए

पत्रिका: हंस, अंक: मई10, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजेन्द्र यादव, पृष्ठ: 96, मूल्य:25रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: editorhans@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.hansmonthly.in/ , फोन/मो. 011.23270377, सम्पर्क: अक्षर प्रकाशन प्रा.लि. 3/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110.002
कथा प्रधान मासिक हंस का प्रत्येक अंक सामाजिक व विचारोत्तेजक रचनाओं से परिपूर्ण होता है। इस अंक में देश की वर्तमान परिस्थिति, आर्थिक सामाजिक दशा व्यक्त करती कहानियां प्रकाशित की गई है। इनमें चिडिया ऐसे मरती है(मधु कांकरिया), एक अकेली इस जंगल में(सलिल सुधाकर), शहर की मौत(प्रेम भारद्वाज), अनिणीत(निरूपमा अग्रवाल) एवं चांद अभी ढला नहीं(अहमद निसार) शामिल है। इस बार हंस में कविताओं का चयन बहुत सोच समझ कर किया गया है। अनामिका, सविता भारद्वाज, पूनम नुसामड, कुमार विश्वबंधु एवं रामप्रकाश कुशवाह की कविताएं पढ़कर आज के वातावरण व उसकी नियति जानी समझी जा सकती है। मो. आरिफ दगिया का आलेख वर्तमान में विश्व भर में आतंकवाद का शिकार हो रहे मुस्लिमों का दर्द सामने लाता है। क्षमा शर्मा ने बहुत ही संतुलित ढंग से अपने आलेख मायावती की मालाएं में विचार श्रंृखला प्रस्तुत की है। अभय कुमार दुबे का कानू सान्याल पर आलेख व राजेन्द्र कसवा का लेख इस तरह बिगाड़ा मुझे किताबों ने वर्तमान में सामाजिक विश्लेषण सामने रखती है। नूर मोहम्मद नूर की ग़ज़लें, सभी लघुकथाएं भी पत्रिका के स्तर के अनुरूप है। शीबा असलम फहमी व भारत दोषी अपने अपने विचारों के माध्यम से संतुलित व सार्थक विश्लेषण करने में सफल हैं। सुधा अरोड़ा का संस्मरण दीवारों में चिनी चीखों का महाप्रयाण बार बार पढ़ने योग्य रचना है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं, पत्र व संपादकीय भी अद्वितीय व अपने आप में में विशिष्ठ है।

3 comments:

  1. अच्छी जानकारी दी आप ने

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  2. लगता है आपने हंस के सारे अंक नहीं देखे..इसी कारण उसे राजहंस बता रहे हैं
    देखे होते तो उसे कौव्वा भी नहीं कहते.

    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  3. हंस के अंक के बारे मे एक संक्षिप्त मगर विहंगम आलेख

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