Sunday, May 9, 2010

आप भी करें ‘परिकथा’ के साथ समय और समाज की परिक्रमा

पत्रिका: परिकथा, अंक: मार्च-अपै्रल10, स्वरूप: द्वैमासिक, संपादक: शंकर, पृष्ठ: 104, मूल्य:25रू.(वार्षिक 275रू.), ई मेल: parikatha.hindi@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.parikathahindi.com/ , फोन/मो. 0129.4116726, सम्पर्क: 96, बेसमेंट, फेज 3, इरोज गार्डन, सूरज कुंड़ रोड़, नई दिल्ली 110.044
समाज के लिए उत्कृष्ट साहित्य प्रकाशित करने वाली यह पत्रिका नवीन होते हुए भी गंभीर व समकालीन साहित्य का प्रकाशन कर रही है। समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण रचनाएं पाठक का ध्यान आकर्षित करती है। पत्रिका में प्रकाशित प्रमुख आलेखों में- नई सदी में राजनीतिक व सामाजिक सोच(ब्रज कुमार पाण्डेय), हमारे समय के साहित्यिक शहीद(जितेन्द्र भाटिया), बाबा का गुस्सा(संस्मरण-रूपसिंह चंदेल) एवं लेखक के साथ साथ पाठक की भी...(संवाद-शंभू गुप्त) शामिल हैं। इन आलेखों में समय के सापेक्ष व वर्तमान सदी के संदर्भ में लेखकों ने अपने विचारों को व्यक्त किया है। वर्तमान में नए लेखकों द्वारा किए जा रहे लेखन जिसे नवलेखन कहा जा रहा है। यह लेखन उतना ही गंभीर व साहित्य के प्रति उत्तरदायी है जितनी अनुभवी पीढ़ी है। ख्यात आलोचक डाॅ. परमानंद श्रीवास्तव, लेखक व रचनाकार खगेन्द्र ठाकुर एवं अशोक कुमार पाण्डेय की रचनाएं युवा लेखन का विश्लेषण करती हुई अपनी बात पुरजोर तरीके से रखती है। पत्रिका की प्रत्येक कहानी स्तरीय व पठनीय है। प्रकाशित कहानियों में बाज़ारवाद की अपेक्षा हमारी संस्कृति के संरक्षण का विशेष ध्यान रखा गया है। इसकी आज के संदर्भ में आवश्यकता भी है। कहानी प्लेसमेंट एजेंसी(पुन्नी सिंह), मकोड़ा(महेन्द्र सिंह सरना), राजीव बाबू की खेती(जयप्रकाश), कोसी सतलुज एक्सप्रेस(अमिताभ शंकर राय चैधरी), एक दिन(शुक्ला चैधरी) एवं पराए समय में(विद्या सिंह) में हमारी मान्यताओं केे संरक्षण का स्वर सुनाई देता है। वरिष्ठ कवि विजेन्द्र जी की कविताएं विशेष रूप से वसंत, शब्द व ओ वाग्देवी आज की युवा पीढ़ी को स्वयं के बारे में पुनः विचारने के लिए प्रेरित करती दिखाई देती है। विमल कुमार, प्रताप राव कदम, शहंशाह आलम, महादवे टोप्पो एवं मनीषा झा की कविताएं भी भारतीयता का स्वर लिए हुए हैं। मुर्शरफ आलम जौकी का आलेख उर्दू के इतिहास को सफलतापूर्वक प्रस्तुत कर सका है। कुमार हसन की ओडिया कहानी डूब(अनुवाद-अरूण होता) बांध बनने के पहले विस्थापितों का दर्द बयान करने में पूर्णतः सफल रही है। परिकथा में वीरेन्द्र कुमार गौतम, नीरज खरे, विवेक श्रीवास्तव, ज्योति किरण एवं वसंत त्रिपाठी द्वारा की समीक्षाएं आलोचनात्मक ढंग से संग्रह/पुस्तकों का विश्लेषण करती है। सारा राय का उपन्यास अंश चील वाली कोठी इस रचना को विस्तार से पढ़ने की इच्छा जाग्रत करता है। परिकथा की अन्य रचनाएं भी आकर्षक व पठनीय है। इतने कम समय में साहित्य जगत की प्रथम पंक्ति में शामिल होने के लिए परिकथा बधाई की पात्र है।

2 comments:

  1. अति सुंदर जी धन्यवाद

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  2. on line लिंक देने का शुक्रिया ... विजेंद्र
    की कविताये आकाश , वसंत और शब्द पढ़ी ... यथार्थ के धरातल पर लिखी गयी कवितायेँ हैं ..

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