Thursday, April 22, 2010

सैमसुंगःयह भी कोई मुद्दा है(संपादकीय)-वागर्थ

पत्रिका: वागर्थ, अंक: अपै्रल10, स्वरूप: मासिक, संपादक: विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 122, मूल्य:20रू.(वार्षिक 200रू.), ई मेल: bbparishad@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.bharatiyabhashaparishad.com/ , फोन/मो. 033.32930659, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद्, 36ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता 700.017
पत्रिका वागर्थ से प्रत्येक पाठक जिसे हिंदी साहित्य में रूचि है भलिभांति परिचित है। पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रकाशित आलेखों में - क्या कोसंबी नस्लवादी थे?(भगवान सिंह), मृत्यु बिना जीवन(गिरीश मिश्र) एवं ध्वंस तो जारी है(कृष्ण प्रताप सिंह) पाठकों के मस्तिष्क को काफी हद तक झकझोरते हैं। ख्यात कथाकार निर्मल वर्मा पर स्वयंप्रकाश जी का संस्मरण उन्हें फिर से स्मृति मंे ला देता है। शरण कुमा लिंबाले द्वारा लिखित उपन्यास(मराठी) के अनुदित अंश इस रचना को समझने में काफी अधिक सहायक हैं। आयशा खातून की बंग्ला लघुकथाएं पाठक के मन में गहराई तक जाकर प्रभावित करती हैं। दादूराम शर्मा का ललित निबंध इस विधा की अन्य रचनाएं पढ़ने की रूचि जाग्रत करता है। कहानियों में द्विजेन्द्र नाथ सैगल, हरिओम की कहानियों में सरसता अंत तक बनी हुई है। इनमें आख्यान का प्रभाव देखा जा सकता है। सविता भार्गव, सतीश अग्रवाल, विनीता जोशी एवं समीरा नईम की कविताएं आज के समाज का चित्र खींचती हुई उसे अतीत तक ले जाती हैं। प्रधानमंत्री को पसीना, पुरूष की स्मृति में बूढ़ी नहीं होती लड़कियां जैसी कविताएं उमाशंकर चैधरी को कथाकार के साथ साथ एक कवि के रूप में जानने समझने का पर्याप्त अवसर प्रदान करती हैं। राजेश् रेड्डी एवं सुधीर कुशवाह की ग़ज़ल तथा राकेश कुमार सिंह का भोजपुरी गीत पढ़ने की अपेक्षा सुनने योग्य अधक है। पत्रिका का संपादकीय इसका आईना है जिसे पढ़कर गैर हिंद भाषी पाठक हिंदी साहित्य की गहन सोच समझ से रूबरू हो सकता है।

2 comments:

  1. बहुत ही अच्छी लगी आप की यह समीक्षा.
    धन्यवाद

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  2. बिल्कुल सही लिखा आपने .....सम्पादकीय जबर्दस्त है ,विजय बहादुर जी ने कइयों की खबर ली है ।

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