Friday, February 26, 2010

बुद्धिवादी नाटकों की रौनक क्यों शेक्सपियर के नाटकों की तुलना मंे फीकी पड़ती दिखाई दे रही है-वागर्थ

पत्रिका: वागर्थ, अंक: फरवरी.10, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 134, मूल्य: 20रू.(वार्षिकः 200), ई मेल: bbparishad@yahoo.co.in , वेबसाईट: http://www.bharatiyabhashaparishad.com/ , फोन/मो. (033)32930659, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद्, 36ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता 700.017
वागर्थ के समीक्षित अंक में संस्कृत के प्रकांड विद्वान डाॅ. राधावल्लभ त्रिपाठी एवं शलभ श्रीराम सिंह की कविताएं जन भावनाओं की उत्कृष्ट प्रस्तुति है। दिलीप शाक्य व कुमार विश्वबंधु की कविताएं आज के संदर्भ में भारतीय युवा को विश्व समुदाय से जोड़ती है। सुधा अरोरा, अष्टभुजा शुक्ल, वेणु गोपाल, विनोद तिवारी, अरूण कुमार पानीबाबा अपने अपने आलेखों में पाठक को भारतीयता से जोड़े रखने में सफल रहे हैं। कहानियों में झड़ीलाल की बात(विवेकानंद) एवं तुम मर क्यों गए जान मोहम्मद(कैलास चंद्र) विचारणीय रचनाएं हैं। अमृतलाल बेगड़, गोविन्द मिश्र के यात्रा वृतांत तथा राम मेश्राम व खुर्शीद अकबर की ग़ज़लें नई सदी की आहट में हमारे संस्कारों से जोड़े रखने का प्रयास करती दिखाई देती हैं। कंचन सिंह चैहान की नज़्म ‘तुम्हारी मुस्कुराहटें हैं आस-पास वहीं’ अपने आसपास के वातावरण को सजीव कर उससे बातें करती जान पड़ती हैं। पत्रिका की अन्य समीक्षाएं रचनाएं व पत्र आदि भी साहित्य पर अच्छी जानकारी संजोकर लाए हैं। पत्रिका का नाट्य विधा पर संपादकीय नाटक के लिए वर्तमान चुनौतियों व संभावनाओं पर अच्छी तरह प्रकाश डालता है।

2 comments:

  1. समीक्षा हमेशा की तरह उत्तम... नज़्म का ज़िक्र करने का शुक्रिया...!

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