Friday, February 5, 2010

‘भारत के पर्यावरण आंदोलन जन-आंदोलन बनने के बजाए व्यक्ति केन्द्रित बनकर रह जाते हैं’-कथन

पत्रिका-कथन, अंक-जनवरी-मार्च10, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ-96, मूल्य-25रू.(वार्षिक 100रू.), फोनः (011)25268341, ई मेलः kathanpatrika@hotmail.com ,सम्पर्क-107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली 110063
पत्रिका कथन का प्रत्येक अंक विशेषांक होता है जिसमें किसी समसामयिक विषय पर चर्चा व संवाद को स्थान दिया जाता है। समीक्षित अंक में पर्यावरण पर गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है। प्रायः सभी रचनाओं मं पर्यावरण के प्रति जनचेतना का स्वर सुनाई देता है। प्रकाशित कहानियों में- शहर संुदर है(रमेश उपाध्याय), इल्तिजा(जावेद हुसैन) एवं एक जुलूस के साथ साथ(नीला प्रसाद) में पर्यावरण के प्रति चिंता दिखाई देती है। प्रमुख आलेखों में पर्यावरण की संस्कृति(पुष्पम् ए कुमार), पर्यावरण की रक्षा और सामाजिक न्याय का सवाल(अमिता बावीसकर) में भविष्य में पर्यावरण से होने वाले दुष्प्रभाव व इसके प्रदूषण से मनुष्य को जाग्रत करने का प्रयास किया गया है। हरीश भदानी ज्ञानेन्द्रपति, अरूण आदित्य, अमित मनोज की कविताएं आज के बदलते समाज को अपने मूल्यों व संस्कृति के प्रति सचेत करती हैं। नीलेश रघुवंशी की कविताएं उस आम आदमी की कविताएं हैं जिसे भुला विसरा दिया गया है। आमजन से संबंधित विषयों को उठाने का सार्थक प्रयास कवयित्री ने किया है। मुकुल शर्मा से बातचीत में पर्यावरण संरक्षण के लिए जमीनी प्रयास की आवश्यकता पर बल दिया गया है। दरअसल आज पर्यावरण सम्पन्न वर्ग ने अपने लाभ के लिए हथिया लिया है। जिसे उससे शीघ्र ही मुक्त किए जाने की आवश्यकता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व आलेख भी उपयोगी हैं।

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