Wednesday, January 27, 2010

साहित्य की द्वैमासिकी--अक्षरा

पत्रिका-अक्षरा, अंक-जनवरी-फरवरी 2010, स्वरूप-द्वैमासिक, प्रधान संपादक-कैलश चंद्र पंत, प्रबंध संपादक-सुशील कुमार केडिया, संपादक-सुनीता खत्री, पृष्ठ-120, मूल्य-20रू.(वार्षिक 120रू.), फोनः (0755)2661087, सम्पर्क-म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन श्यामला हिल्स, भोपाल म.प्र.
समीक्षित पत्रिका अक्षरा का यह 28वां वर्ष है। इन वर्षो में पत्रिका ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। अंक में ख्यात आलोचक रमेश चंद्र शाह का स्तंभ हमेशा की तरह विचारणीय सामग्री पाठकों के समक्ष रखता है। फधीश्वर नाथ रेणु का संस्मरण तथा स्वामी विवेकानंद का आलेख साहित्य के नए विज्ञ को हमारी धरोहर की जानकारी देने में सफल रहे हैं। प्रकाशित आलेख जिस ढंग से साहित्य व अन्य विषयों की परख करते हैं वह पत्रिका की शक्ति है। हिंदी के प्रति बढ़ती उदासीनता(परमानंद पांचाल), विदेशो व्याप्त रोमानी हिंदी(सूर्यप्रसाद दीक्षित), बाज़ार का दबाव और विज्ञापन की भाषाः उपभोक्ता का संदर्भ(अरूण कुमार पाण्डेय) तथा भारतीय संस्कृति और संगीत(महारानी शर्मा) जैसे आलेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि अब हिंदी साहित्य दुनिया के किसी भी साहित्य से कमतर नहीं है। नमिता सिंह और राजेन्द्र परदेसी की बातचीत बाजारवाद के संदर्भ में कहानी विधा की उपयोगिता व सार्थकता पर गहन विमर्श प्रस्तुत करती है। श्री रमेश चंद्र शाह के उपन्यास ‘सफेद परदे पर’ की परख करत हुए सुधीर कुमार ने लिखा है कि इसका कथानक तथा कथ्य एक नूतन, नव कलात्मक वैशिष्ट्य भी प्रदान करता है। उनके इस कथन से उपन्यास की उपयोगिता व सार्थकता अपने आप सिद्ध हो जाती है। नीरजा माधव, करूणाशंकर उपाध्याय व राजेन्द्र नागदेव के विभिन्न विधाओं में लिखे गए लेख शास्वत विषयों को आज के संदर्भ में विश्लेषित करते हैं। मालती जोशी की कहानी ‘इन्तहा मेरे सब्र की’ तथा बंधनों का सुख(सविता मिश्रा) में वर्तमान पीढ़ी को हमारी मान्यताओं परंपराओं से जोड़े रखने का प्रयास किया गया है। पुरूषोत्तत चक्रवर्ती व प्रद्युम्न भल्ला की कहानियां कुछ खास नहीं कह सकीं है। विवेक रंजन श्रीवास्तव, अशोक सोनी व रमेश कुमार त्रिपाठी की कविताएं व इसाक अश्क के दोहे भी पठनीय बन पड़े हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं, रचनाएं भी साहित्य जगत के लिए उपयोगी हैं।

1 comment:

  1. बहुत सुंदर समीक्षा, आप का धन्यवाद

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