Friday, January 22, 2010

पुस्तकों से बढ़ कर कोई मित्र हो सकता है क्या?--‘हिंदुस्तानी जबान’

पत्रिका-हिंदुस्तानी ज़बान, अंक-जनवरी.मार्च 2010, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. सुशीला गुप्ता, पृष्ठ-80, मूल्य-10रू.(वार्षिक 40रू.), फोनः (022)22812871, ईमेल hpsabha@hotmail.com , सम्पर्क-महा. गां. मेमो. रिसर्च सेंटर और लाइब्रेरी, महा. गां. बिल्ंिडग, 7 नेताजी सुभाष रोड़, मुम्बई 400002
हिंदी एवं उर्दू ज़बान में एक साथ साए होने वाले इस अहम रिसाले के मर्कज़ में गांधी साहित्य का रोल काबिले तारीफ है। रिसाले की नुमाइंदगी कुछ इस तरह है कि उसे पढ़ने वाला हर आमों-खास अचरज से भर उठता है। इसमें तफ़शीस, और खुतूत के तरम्यान एक ऐसा तालमेल दिखाई देता है जो गौर फरमाने के काबिल है। जनाब विजय राघव रेड्डी ने ‘भाषा की आधुनिकीकरण प्रक्रियाःहिंदी का संदर्भ में अपनी बात को इस तरह से पेश किया है जिसे पढ़ते ही ज़बान के ताल्लुक बेवजह तकरार करने वालों पर तरस आता है। जाने माने अफ़सानान निगार जनाब पे्रमचंद पर डाॅ. संजीब कुमार दुबे और कवि घनानंद की आम लोगों को दिए गए कीमती तोहफे पर बहुत खूब लिखा है। प्रो. शंकर बुदेले ने तुकड़ो जी महाराज पर लिखा है। पत्रिका के तमाम तफसिरे, खत, समाचार भी काबिले गौर है। एक अच्छे रिसाले के लिए पत्रिका की संपादक को कथाचक्र परिवार की ओर से ढेरों बधाईयां।

1 comment:

  1. इस अति सुंदर जानकारी के लिये धन्यवाद

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