Friday, December 31, 2010

मॉरिशस से प्रकाशित ‘विश्व हिंदी समाचार’ का नया अंक

पत्रिका: विश्व हिंदी समाचार, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डॉ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र , पृष्ठ: 12, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: उपलब्ध नहीं , ई मेल: whsmauritus@intnet.mu , sgwhs@innet.mu , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 230.6761196, सम्पर्क: World Hindi Secretariat, Swift Lane, forest side, Mauritus
विश्वप्रसिद्ध समाचार पत्रिका विश्व हिंदी समाचार के समीक्षित अंक जानकारीपरक व ज्ञानवर्धक समाचारों को स्थान दिया गया है। अंक के मुखपृष्ठ पर मॉरिशस में हिंदी दिवस के आयोजन का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। हिंदी दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम में महामहिम श्री मधुसूदन गणपति ने अपने उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने कहा, ‘हिंदी भारत में तथा भारत के बाहर भारतवंशियों को एकता और स्नेह के सूत्र में बांधती है।’ मॉरिशस के कला एवं संस्कृति मंत्री ने कहा कि कुछ ही समय में हिंदी दुनिया में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बन जाएगी। इस अवसर पर मॉरिशस के शिक्षा एवं मानवसंसाधन मंत्री माननीय श्री वसंत कुमार बनवारी ने स्पष्ट किया, ‘हिंदी बहुत तेजी से वैश्विक भाषा का रूप ले रही है।’ इंदिरा गांधी भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र की निदेशक श्रीमती अनीता अरोड़ा ने अतिथियों की सहभागिता के लिए आभार व्यक्त किया। एक अन्य समाचार के अनुसार, लंदन में हिंदी पुस्तकों का लोकापर्ण कार्याक्रम आयोजित किया गया। यह लोकापर्ण कैलाश बुधवार एवं डॉ. अरूणा अजीतसरिया द्वारा किया गया। भारत नार्वे लेखक सेमिनार का समाचार अच्छा व रूचिकर है। इससे नार्वे में हिंदी के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यो की झलक मिलती है। लंदन में आयोजित सम्मान समारोह मंे बिहार(भारत) के रंगकर्मी व नाटककार हषिकेश सुलभ को वर्ष 2010 का अंतर्राष्ट्रीय इंदु वर्मा कथा सम्मान से सम्मानित किया गया है। इस कार्यक्रम मंे महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलपति व वरिष्ठ साहित्यकार श्री विभूतिनारायण राय ने स्पष्ट किया की विश्वविद्यालय विदेशों की हिंदी से संबंधित संस्थाओं के मध्य समन्वय का कार्य करेगा। लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय वातायन कविता सम्मान 2010 तथा ख्यात कथाकार चित्रा मुदगल को मिले दो प्रमुख पुरस्कारों को समाचार पत्रिका ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। अंक में राजस्थान प्रगतिशील लेखक मंच तथा जवाहर कला केन्द्र की पहल पर जयपुर में आयोजित कार्यक्रम का समाचार विस्तृत रूप से प्रकाशित किया गया है। पत्रिका ने इसे कार्यक्रम की रपट के रूप में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रकाशित किया है। 31जुलाई व 1 अगस्त 10 को प्रेमचंद जयंती के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में ख्यात कवि नंद भारद्वाज, जितेन्द्र भाटिया, आदिल रजा मंसूरी, सीमा विजय, दिनेश चारण ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस अवसर पर अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ लेखक व कवि श्री नंद भारद्वाज ने कहा, ‘आज पढ़ी गई कहानियों से राजस्थान की समकालीन रचनाशीलता का पता चलता है।’ नई दिल्ली स्थित भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के आडिटोरियम में आयोजित कार्यक्रम में मैथिलीशरण गुप्त पुरस्कार श्री मानिक वछावत द्वारा रचित इस शहर के लोग को दिया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री रत्नाकर पाण्डेय ने की। प्रो. शिवकुमार मिश्र ने एक कार्याक्रम के दौरान स्पष्ट किया है कि मनुष्यता के लिए साहित्य से जुड़ा रहना होगा। यह समाचार विचारणीय जानकारी प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त मॉरिशस में अनुवाद पर कार्यशाला, अब अ से अनार पढ़ेंगे अमरीकी तथा पोर्टबलेयर में प्रेमचंद जयंती के समचार पत्रिका ने आकर्षक ढंग से विस्तार के साथ प्रकाशित किए हैं। पत्रिका के संपादक राजेन्द्र प्रसाद मिश्र का संपादकीय हिंदी दिवस की धूम के मध्य पाठकों से कुछ अपेक्षा करता है।उनके अनुसार, ‘हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की 7वीं आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता दिलाने के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी के प्रचार प्रसार से जुड़ी विश्वव्यापी संस्थाएं अपने अभियान को और तेज करे। जिससे संयुक्त राष्ट्र संघ के ज्यादा से ज्यादा सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त करना सहज हो सकेगा।’

‘हिमप्रस्थ’ बाल साहित्य पर एकाग्र विशेषांक

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: नवम्बर2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 96, रेखा चित्र/छायांकन: जानकारी उपलब्ध नहीं, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हि.प्र. प्रिटिंग प्रेेस परिसर, घोड़ा चौकी, शिमला .4
पत्रिका का स्वरूप व सामग्री देखकर यह कहीं से नहीं लगता है कि यह पत्रिका किसी प्रदेश के प्रकाशन विभाग की होगी। पत्रिका की सामग्री व स्तर प्रभावित करता है। समीक्षित अंक बाल साहित्य पर एकाग्र किया गया है। अंक में बालोपयोगी रचनाएं व विश्लेषणात्मक आलेख प्रकाशित किए गए हैं। समय के साथ बदलता बाल साहित्य(प्रकाश मनु), बाल साहित्य की प्रासंगिकता(जया चौहान), शिशुगीत एवं बाल कविताएं(डॉ. परशुराम शुक्ल), साहित सभी आलेख अच्छे व जानकारीपरक हैं। प्रो. आदित्य प्रचंडिया,ओमप्रकाश गुप्ता, सुशील कुमार फुल्ल, डॉ. दिनेश चमोला, डॉ. अदिति गुलेरी, डॉ. आशु फुल्ल, प्यार सिंह ठाकुर तथा योगराज शर्मा के लेख बाल साहित्य व उसकी वर्तमान उपयोगिता, उपलब्धता पर प्रकाश डालते हैं। रमेश चंद्र पंत, राजेन्द्र परदेसी, साधुराम दर्शक, प्रमिला गुप्ता, डॉ. रामसिंह यादव, डॉ. श्याम मनोहर व्यास, श्याम सिंह घुना, केशव चंद्र, रणीराम गढवाली, द्विजेन्द्र द्विज, नरेन्द्र भारती एवं बालशौरि रेड्डी की बाल कहानियों में बच्चों के लिए अच्छी व मनोरंजक शैली में लेखन कार्य किया गया है। कविताओं में शबाब ललित, रामनिवास मानव, जगदीश चंद्र, ओम प्रकाश सारस्वत, महेन्द्र सिंह शेखावत, पीयूष गुलेरी, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, प्रतापसिंह सोठी, प्रत्यूष गुलेरी, नरेश कुमार उदास, मीना गुप्ता, अरूण कुमार शर्मा, तेजराम शर्मा, हिमेन्द्र बाली, हेमलता गुप्ता, राजकुमार कुम्भज, राजीव कुमार एवं डॉ. रीना नाथ शरण की बाल कविताएं बच्चों के साथ साथ प्रबुद्ध वर्ग को भी अच्छी लगेगी। साथ ही बानो सरताज की एकांकी, प्रेम पखरोल व श्रीनिवास श्रीकांत का चिंतन, प्रदीप कंवर का यात्रा वर्णन अच्छे व रूचिकर हैं। डॉ. रमाकांत श्रीवास्तव से पत्रिका के संपादक रणजीत सिंह राणा की बातचीत बाल साहित्य व उसकी प्रासंगिकता पर गंभीरता से विचार करती है। अशोक गौतम व दादुराम शर्मा के व्यंग्य बच्चों को अवश्य ही पसंद आएंगे। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी इसकी लोकप्रियता के संबंध में काफी कुछ कहते हैं।

Tuesday, December 28, 2010

बाल पत्रिका ‘सुमन सागर’ का नया अंक

पत्रिका: सुमन सागर, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: श्याम बिहारी आलोक, संजवी बिहारी आलोक, पृष्ठ: 22, रेखा चित्र/छायांकन: उपलब्ध नहीं, मूल्य: 10रू.(वार्षिक 80), ई मेल: skalok_25dec@rediffmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0983505365, सम्पर्क: विनीता भवन, सवेरा सिनेमा चैक, काजी चक्र , बाढ़ बिहार 803.213
बाल पत्रिका सुमन सागर के समीक्षित अंक में बच्चों के लिए शिक्षाप्रद तथा ज्ञानवर्धक रचनाओं का प्रकाश किया गया है। अंक में राकेश कुमार सिन्हा, पुष्पेश कुमार पुष्प, उमेश कुमार साहू, कंचन सिंह, स्वरूप सिंह, पारस दासोत, सुषमा भण्डारी, तारासिंह, ख्याल नारायण, गाफिल, कृष्णा, ब्रजेश, जमुआर, ईश्वर, नयन कुमार राठी, सहित सभी लेखकों की रचनाएं नयापन लिए हुए हैं।

Monday, December 27, 2010

अब गणित ही नहीं साहित्य में भी ‘समावर्तन’

पत्रिका: समावर्तन, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ: 114, रेखा चित्र/छायांकन: अक्षय आमेरिया , मूल्य: 25रू.(वार्षिक 300), ई मेल: samavartan@yahoo.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: ‘Madvi’ 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
साहित्य एवं कला पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रभावशाली रचनाओं का समावेश किया गया है। यह जानकार सुखद लगा कि अंक ख्यात लेखक, संपादक व समालोचक विजय बहादुर सिंह जी पर एकाग्र है। उनके समग्र पर इतनी अच्छी व विविधतापूर्ण सामग्री बहुत दिनों बाद पढ़ने में आयी है। पत्रिका के संपादक रमेश दवे जी के उन के व्यक्तित्व पर विचार सारगर्भित है। ख्यात कवि अशोक वाजपेयी, कथाकार उदयप्रकाश, कहानीकार जयश्ंाकर व दिनेश कुशवाहा के विचार एकदम सटीक व संतुलित हैं। पहली बार किसी पत्रिका ने किसी व्यक्तित्व पर बिना किसी पूर्वाग्रह के संतुलित सामग्री का प्रकाशन किया है। उनसे बातचीत व अन्य रचनाएं भी संग्रह योग्य है। लोकप्रिय आलोचक धनंजय वर्मा का लेख, हरि मृदुल की कविताएं समाज का अच्छा विश्लेषण प्रस्तुत करती है। राजकुमार कुम्भज, आशा पाण्डेय, ओम नागर, की कविताएं तथा सिम्मी हर्षिता की कहानी पत्रिका के स्तर में वृद्धि करती है। रंगशीर्ष के अंतर्गत गुन्देचा बंधु के कृतित्व पर नए सिरे से विचार किया गया है। चांदमल गुन्देचा, रमाकांत गुन्देचा के लेख व साक्षात्कार उपयोगी हैं। पत्रिका के अन्य सभी स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं व रचनाएं स्तरीय हैं।

Sunday, December 26, 2010

साहित्य सागर का दिसम्बर 2010 अंक

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, रेखा चित्र: उपलब्ध नहीं, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल म.प्र.
साहित्य सेवा में विगत 9 वर्ष से सेवारत पत्रिका के समीक्षित अंक को श्री दिवाकर वर्मा जी पर एकाग्र किया गया है। अंक में उनपर उपयोगी सामग्री संजोयी गई है। रामप्रकाश शर्मा, सुरेश गौतम, नचिकेता, मयंक श्रीवास्तव, मधुकर गौड, डाॅ. देवेन्द्र आर्य, मधुकर आष्ठाना, रामकृष्ण शर्मा, राधाकृष्ण दीक्षित व विमलेश शर्मा के आलेख प्रभावित करते हैं। इस परिशिष्ट के अतिरिक्त पत्रिका में डाॅ. रामस्नेहीलाल शर्मा व आर.एम.पी. सिंह के आलेख उपयोगी हैं। रामप्रकाश अनुरागी, सतीश श्रोत्रिय, वर्षा रश्मि, यतीन्द्रनाथ राठी तथा डाॅ. चंद्रप्रकाश शर्मा की कविताएं हैं।

Saturday, December 25, 2010

पाखी का दिसम्बर 2010 अंक

पत्रिका: पाखी, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: प्रेम भारद्वाज, पृष्ठ: 120, रेखा चित्र: राजेन्द्र परदेसी, बंशीलाल परमार, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 240), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: http://www.pakhi.in/ , फोन/मो. 0120.4070300, सम्पर्क: बी-107, सेक्टर 63, नोएड़ा 201303 उ.प्र.
साहित्य जगत की अग्रणी पत्रिका पाखी के इस अंक में सामाजिक व्यवस्था व उसकी बनावट को उजागर करती कहानियों का प्रकाशन किया गया है। प्रकाशित कहानियों में क्या मनु लौटेगा?(विजय), मेमोरी फुल(राजेन्द्र दानी), एक अंजाने खौफ की रिहर्सल(मुर्शरफ आलम जौकी), ये भी समय है(दुष्यंत), वह टेªन निरंजना को जाती है(संजीव चंदन) एवं राख होती जिंदगी(शिवअवतार पाल) सम्मलित है। वाद, विवाद, संवाद कालम के अंतर्गत अजय वर्मा, दिनेश कर्नाटक, संदीप अवस्थी तथा रूपलाल बेदिया के विचार प्रकाशित किए गए हैं। राजकुमार कुम्भज, प्रमोद कुमार व रामजी तिवारी की कविताएं भी सामाजिक परिवेश की रक्षा करते हुए उसे जटिल होने से बचाती दिखाई देती है। हमेशा की तरह राजीव रंजन गिरि, विनोद अनुपम व प्रतिभा कुशवाहा के कालम अच्छे व सकारात्मक सोच लिए हुए हैं। मेरी बात के अंतर्गत अपूर्व जोशी के विचार व कमल चोपड़ा की लघुकथाएं प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं एव पत्र भी जानकारीपरक हैं।

Thursday, December 23, 2010

साहित्यिक पत्रिका ‘शुभ तारिका’ का हरियाणा अंक

पत्रिका: शुभ तारिका, अंक: नवम्बर2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 102, मूल्य: 25रू.यह अंक(वार्षिक 120), ई मेल: urmi.klm@gmail.com , वेबसाईट: not avilale , फोन/मो. 0171.2631068, सम्पर्क: कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालोनी अम्बाला छावनी हरियाणा
अग्रिम पंक्ति की ख्यात पत्रिका शुभतारिका का समीक्षित अंक हरियाणा साहित्य अंक है। अंक में हरियाणा की कला, साहित्य व संस्कृति पर एकाग्र रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। पत्रिका के इस अंक में प्रकाशित लेखों में डाॅ. परशुराम शुक्ल, जितेन्द्र सूद, पवन चैधरी मनमौजी, रश्मि, राजेश चुघ, अंजु शर्मा, लालचंद गुप्त मंगल, कमलेश भारतीय, क्षिप्रा बनर्जी, प्रमिला गुप्ता, सुरेन्द्र कुमार, ओमप्रकाश कादयान, सोमवीर शर्मा, आनंद प्रकाश आर्टिस्ट, सुनीता आनंद, सत्यपाल शर्मा, संजीव कुमारी, ओ.पी. वनमाली, अनीता शर्मा, पंकज शर्मा, विजय कुमार, मनजीत कौर, प्रवीण शर्मा स्नेही, शिवकुमार शर्मा, विक्की नरूला एवं तेजिन्द्र के लेख उल्लेखनीय हैं। देवचंद की लोक कथा दो उरली दो परली तथा मुक्ता एवं कमल कपूर की कहानियां प्रभावित करती हैं। प्रमिला गुप्ता का व्यंग्य महिमा जूते की अच्छा है। सुखचैन सिंह भण्डारी, घमंडीलाल अग्रवाल, राधेश्याम भारतीय, कुलदीप अरोड़ा एवं बलजीत गढ़वाल भारती की लघुकथाएं अच्छी व पठनीय हैं। उदयभानु हंस, रामनिवास मानव, लक्ष्मी रूपल, ईश्वर सिंह खिच्ची, निर्मला जौहरी, महेन्द्र जैन, नज़र जालंधरी, यश खन्ना नीर, मदनलाल वर्मा, विनोदिनी पात्र, कुमार शर्मा अनिल, ओमीशा पारूथी, सुनील सिंह मार, राजन शर्मा एवं अंजु सूरी की कविताएं पत्रिका के कलेवर के अनुरूप हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ व रचनाएं भी प्रभावित करती हैं।

Wednesday, December 22, 2010

मुम्बई से हिंदी के लिए ‘प्रोत्साहन’

पत्रिका: प्रोत्साहन, अंक: 76 वर्ष2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक:कमला जीवितराम सेतपाल, पृष्ठ: 32, मूल्य: 15रू.(वार्षिक 60), ई मेल: arts@hotmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 022.26365138, सम्पर्क: ई-3/307, इन्लैक्स नगर, यारी रोड़, वर्सोवा अंधेरी पश्चिम मुम्बई 400061
स्व. श्री जीवितराम सेतपाल जी द्वारा स्थापित व वर्षो से संपादित पत्रिका प्रोत्साहन का समीक्षित अंक अब पुनः उसी रूप व साज सज्जा के साथ प्रकाशित हो रहा हैै जैसा वह पूर्व मंे था। अंक में सुदर्शन शर्मा का व्यंग्य, लक्ष्मी यादव की कहानी एवं रामदलाल, नरेन्द्र धड़कन, जसप्रीत कौर जस्सी, हीरालाल जायसवाल एवं रामचरण यादव की कविताएं उल्लेखनीय हैं। डॉ. पूरन सिंह, अशोक मनवानी, सुधा भार्गव की लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। शिवशंकर चतुर्वेदी, मिर्जा हसन नासिर एवं बेताब अलीपुरी के गीत अच्छे बन पड़े हैं। स्व.श्री जीवितराम सेतपाल की रचना नेता पुराण आज के संदर्भ पर सटीक बैठती है।

Tuesday, December 21, 2010

प्रकाशन जगत से ‘वाणी प्रकाशन समाचार’

पत्रिका: वाणी प्रकाशन समाचार, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अरूण माहेश्वरी, पृष्ठ: 30, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 60), ई मेल: vaniprakashan@gmail.com , वेबसाईट: http://www.vaniprakashan.in/ , फोन/मो. 011.23273167, सम्पर्क: 21ए, दरियागंज, नयी दिल्ली 110002
वाणी प्रकाशन की नवीनतम जानकारी प्रदान करने वाला यह समाचार बुलेटिन साहित्य जगत को नए प्रकाशनों के संबंध में उपयोगी जानकारी प्रदान करता है। समीक्षित अंक में चांद आसमान डाट काम(विमल कुमार), तीसरी ताली(प्रदीप सौरभ), ज़ख्म हमारे(मोहनदास नैमिशराय) उसी शहर में उसका घर(धु्रव शुक्ल), पहर दोपहर(असगर वजाहत), वह जो घाटी ने कहा(पुन्नी सिंह)एवं मुमताज महल(सुरेश कुमार वर्मा) जैसे उत्कृष्ट प्रकाशनों की जानकारी बहुुत ही संुदर ढंग से प्रकाशित की गई है। अज्ञेय साहित्य की विस्त्त जानकारी एवं आलोचना पुस्तक ‘उत्तर छायावाद काल, दिनकर और उर्वशी’(सं. गोपेश्वर सिंह) इन पुस्तकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। भील इतिहास के रोमांचकारी एवं मार्मिक उपन्यास ‘मगरी मानगढ़’(राजेन्द्र मोहन भटनागर) की समीक्षा इस उपन्यास को शीघ्र प्राप्त कर पढ़ने की इच्छा जाग्रत करती है। राजस्थान के मेवाड़ इलाके में मोहन गिरि आदिवासियों के मसीहा रहे हैं। उनके साथ (लेखक के अनुसार) लगभग 1500 निहत्थे भील आदिवासियों पर अंग्रेजों ने गोलियां बरसाई थीं। उनमें से 379 आदिवासी मारे गए थे। कर्नल शटन के इस गोलीकांड़ की लोमहर्षक कहानी पाठक की आंखें नम कर देगीं। राघेय राघव के उपन्यास प्रतिदान व कल्पना की जानकारी अच्छी व प्रभावशाली है। अन्य पुस्तकों की जानकारी पाठकों का ज्ञानार्जन करती है।

अब आपके पास भी है ‘शब्दशिल्पियों के आसपास’

पत्रिका: आसपास, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक:राजुरकर राज, पृष्ठ: 32, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50), ई मेल: , वेबसाईट: , फोन/मो. 9425007710, सम्पर्क: एच 3, उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर , भोपाल 462003 म.प्र.
लेखकों की संवाद प्रधान पत्रिका का हर अंक जानकारीप्रद होता है। समीक्षित अंक में बेले कोरियोग्राफर पद्मश्री गुलवर्धन से संबंधित समाचार पत्रिका ने प्रमुखता से प्रकाशित किया है। विनय उपाध्याय का लेख चिराग़-ए-गुल की रौशनी कम न होगी(दैनिक भास्कर से साभार) अच्छा व जानकारीपरक लेख है। बाल साहित्यकार चित्रांश बाघमारे को मिले राष्ट्रपति सम्मान, अब बनेगा साहित्यिक गजेटियर, अरूंधति के आशियाने पर भी शामत तथा सतत सक्रियता का नाम ज्ञानरंजन लेख शब्दकर्मियों को एक दूसरे से जुड़े रहने में उपयोगी हैं। श्री मंडलोई को सौपी पाण्डुलिपि संग्रहालय की कमान तथा हिंदी भवन में हिंदी सेवी अलंकरण समारोह की विस्तृत रपट एवं प्रदेश के उर्दू अकादमी सम्मानों की घोषणा के समाचार साहित्यिक हलचल व गतिविधियों की जानकारी विस्तार से देते हैं। पत्रिका के अन्य समाचार, स्थायी स्तंभ व सामग्री भी सूचनापरक व उपयोगी है।

Monday, December 20, 2010

देश के लिए भी सार्थक है ‘अंचल भारती’

पत्रिका: अंचल भारती, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक:डाॅ. जयनाथ मणि त्रिपाठी, पृष्ठ: 64, मूल्य: 15रू.(वार्षिक 60), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09415320854, सम्पर्क: अंचल भारती प्रिंटिंग पे्रस, राजकीय औद्योगिक संस्थान, गोरखपुर मार्ग, देवरिया उ.प्र.
स्तरीय व ख्यात साहित्यिक पत्रिका अंचल भारती का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाओं से युक्त है। अंक में प्रख्यात साहित्यकार विश्वरंजन से राजेन्द्र परदेसी की बातचीत साहित्य व साहित्येत्तर वातावरण को समेटते हुए भविष्य में साहित्य की बुनियाद टटोलती है। डाॅ. आरती द्वारा प्रस्तुत स्व. मंजु अरूण की कविताएं अतीत व भविष्य के मध्य कड़ी के समान दिखाई देती है। जयचक्रवर्ती, हरपाल अरूण, बृजेन्द्र मिश्र, नूर मोहम्मद नूर, ऋषिवंश, श्रीकांत प्रसाद सिंह, गिरिमोहन गुरू, अखिलेश निगम ‘अखिल’, मधुर नज्मी, अक्षयगोजा, खुर्शीद नवाब, सर्वेश कुमार पाण्डेय की कविताएं अच्छी बुनावट व कलेवर के साथ मनन योग्य हैं। सोनाली सिंह , डाॅ. दिग्विजय कुमार वर्मा, बद्रीनारायण तिवारी, के लेख अच्छे बन पड़े हैं। मदन मोहन वर्मा तथा अखिलेश शुक्ल की लघुकथाएं पत्रिका का अतिरिक्त आकर्षण है। डाॅ. रामनारायण सिंह मधुर का व्यंग्य व हरदयाल मिश्र, सुरेश धीगड़ा के विविधतायुक्त लेख प्रभावशाली हैं। पत्रिका की समीक्षाएं, अन्य रचनाएं भी उपयोगी व समयानुकूल हैं।

बेंगलोर से प्रकाशित ‘हिंदी प्रचार वाणी’

पत्रिका: हिंदी प्रचार वाणी, अंक: दिसम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक:सुश्री बी.एस. शांताबाई, पृष्ठ: 32, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 60), ई मेल: उपलब्ध नहीं, वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 26617777, सम्पर्क: कर्नाटक महिला हिंदी सेवा समिति, 178, चैथा मेन रोड़, चामराजपेठ, बेंगलोर 560.018 कर्नाटक
कर्नाटक से प्रकाशित महिला विषयक समीक्षित पत्रिका में अन्य विषयों को भी पर्याप्त महत्व दिया जाता है। अंक में साहित्यिक ऋषिः एक भारतीय आत्मा माखनलाल चतुर्चेदी(डाॅ. रामसिंह यादव), समुद्र पार तुलसी निष्ठ विदेशी मनीषी(बद्री नारायण तिवारी), पंख न तोड़ने वाला राग(बी.वेकटराव) तथा तेलुगु कहानी को नवीन संस्कार प्रदाता(विजय नारायण रेड्डी) सराहनीय आलेख हैं। इन लेखों में संबंधित विषय पर अच्छा व सार्थक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। प्रो. सुनीता विवेक, अशोक कुमार शोरी, कविराज डाॅ. आचार्य राधागोविंद थौड्गाम, पुष्पा तिवारी, डाॅ. एम. शेषन तथा सत्यकाम महायिा के लेख भी स्तरीय व पढ़ने योग्य हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं आदि भी प्रभावित करती हैं।

Friday, December 17, 2010

चन्दौसी की मेला गणेश चौथ पत्रिका-‘विनायक’

पत्रिका: विनायक, अंक: मेला गणेश चौथ 2010, स्वरूप: वार्षिकी, संपादक:प्रजीत कुमार वार्ष्णेय, अमित के. एस. वार्ष्णेय, पृष्ठ: 200, मूल्य: उपलब्ध नहीं, ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09412391255, 09219564570, सम्पर्क: गोपाल भवन, 25 देवी स्ट्रीट, चन्दौसी 202412 मुरादाबाद उ.प्र.
चन्दौसी का गणेश स्थापना पर्व देश भर में प्रसिद्ध है। लोग देश विदेश से गणेश चौथ मेला देखने के लिए यहां प्रतिवर्ष आते हैं। वर्ष इस स्थान के लिए स्वर्ण जयंती वर्ष होने के कारण और भी महत्वपूर्ण है। इस अवसर पर प्रकाशित पत्रिका विनायक में धार्मिक के साथ साथ समाजोपयोगी व साहित्यिक रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। प्रकाशित पत्रिका में देश के रचनाकारों को स्थान दिया गया है। पत्रिका में कविताएं, लघुकथाएं, यात्रा वृतांत, संस्मरण, जीवनी, कहानी आदि सभी कुछ है। प्रत्येक रचना अपने आप में प्रभावशाली व संग्र्रह योग्य है। संपादक एवं प्रधान संपादक ने इन रचनाओं को बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया हैै।

Monday, December 13, 2010

दक्षिण में हिंदी का वाहक-‘मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका’

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक:डॉ. बी. रामसंजीवैया, डॉ. मनोहर भारती , पृष्ठ: 52, मूल्य: 5 रू.(वार्षिक: 50रू.) ई मेल: brsmhpp@yahoo.co.in , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 080.23404892, सम्पर्क: 58, वेस्ट ऑफ कार्ड रोड़, राजाजीनगर, बेंगलुरू कर्नाटक
कर्नाटक से प्रकाशित हिंदी साहित्य के इस उत्कृष्ट प्रयास की रचनाएं प्रभावित करती है। समीक्षित अंक में जनसामान्य से जुड़ी रचनाओं का प्रकाशन कर पत्रिका ने आम लोगों को हिंदी साहित्य एवं भाषा से जोड़ने का प्रयास किया है। प्रकाशित लेखों में विकास का संकट(एस.पी. केवल), राष्ट्रभाषा की महत्ता एवं हिंदी(महेश चंद्र शर्मा), हिंदी के अस्तित्व का संकट(मित्रेश कुमार गुप्त), राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार में आर्य समाज का योगदान(कृष्ण कुमार ग्रोवर), हरिवंश राय बच्चन और उनका साहित्य जगत(स्नेहलता), समकालीन हिंदी नाटक और रंगमंच(भरत स वाबलिया) एवं राम की शक्तिपूजा एक परिचय(निरूपमा कपूर) उल्लेखनीय है। पत्रिका का सबसे उपयुक्त व सार्थक आलेख लघुकथा को समर्पित राजेन्द्र परदेसी(दुर्गाशंकर त्रिवेदी) है। इस लेख में राजेन्द्र परदेसी जी के मार्फत लघुकथाओं के विकास व आम जन में स्वीकार्यता पर विचार किया गया है। राजेन्द्र परदेसी जी की लघुकथाएं समाज में परिवर्तन का संदेश देती हैं। इसे आलेख में त्रिवेदी जी ने अच्छी तरह से व्यक्त किया है। अंक की अन्य रचनाओं में लालता प्रसाद मिश्र, नरेन्द्र सिंह सिसोदिया, अनिल सवेरा, राज सक्सेना तथा मोहन तिवारी की कविताएं अच्छी व समयानुकूल हैं। डॉ. रामनिवास मानव एवं हितेश कुमार शर्मा की लघुकथाएं प्रभावित करती है। मनीष कुमार सिंह की कहानी कंपनी का कथानक नए संदर्भ लिए हुए है। प्रो. बी. बै. ललिताम्बा का लेख बोळुवार एक विशिष्ट साहित्यकार व्यक्तित्व कन्नड़ साहित्य जगत से हिंदी के पाठक का परिचय कराता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं पत्र आदि भी पठनीय हैं।

Sunday, December 12, 2010

क्रांतिकारी और सोशलिस्ट एक ज़मीन पर काम करें-संबोधन

पत्रिका : सम्बोधन, अंक : अक्टूबरदिसम्बर 2010, स्वरूप : त्रैमासिक, संपादक : क़मर मेवाड़ी, पृष्ठ : 172, मूल्य : 20 रू.(वार्षिक : 80रू.) ई मेल : qamar.mewari@rediffmail.com , वेबसाईट : उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 09829161342, सम्पर्क : पो. कांकरोली, जिला राजसमंद, राजस्थान 313324
लगातार 44 वर्ष से प्रकाशित हो रही त्रैमासिक पत्रिका संबोधन का प्रत्येक अंक नवीनता लिए हुए होता है। पत्रिका में प्रकाशित रचनाओं में विविधता के साथ प्रस्तुतिकरण की नवीनता आकर्षित करती है। समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियों में ऋतुचक्र(स्वाति तिवारी), वर्जित सुख(जयश्री राय), पहाड़(इंदिरा दांगी), चकबंदी(हुस्न तबस्सुम निहां) उल्लेखनीय है। प्रायः सभी कहानियों में बाजारवाद की अपेक्षा मानव मूल्यों व आदर्शो को तहरीज दी गई है। कालम विशिष्ट कवि के अंतर्गत दिनेश कुमार शुक्ल की तीन कविताओं में से अजब संसार व लिखना कविता में भाव के साथ एक विचार केन्द्र में निहित है जो इन दोनों कविता की विशेषता है। भगवतीलाल व्यास, मधूसूदन पाण्डेया, टीकम चंद्र बोहरा, एम.डी. कनेरिया ॔स्नेहिल’व अखिलेश शुक्ल की कविताएं सम्मिलित हैं। इन कविताओं का स्वर भी तत्कालीन समाज के प्रति सहानुभूति लिए हुए है। शमोएल अहमद का ऐ दिलए-आवारा, नासिरा शर्मा द्वारा लिखित मिस्त्र की ममी तथा पी.सी. पाण्डे का आलेख प्रिंट मीडिया की सामाजिक जवाबदेही पठनीय होने के साथ साथ सरसता लिए हुए है। कवि कथाकार विष्णुचंद्र शर्मा से सुधीर विद्यार्थी की बातचीत क्रांतिकारी और सोशलिस्ट एक जमीन पर काम करें विचारयोग्य व गंभीर साक्षात्कार है। सुरेश पंडित का लेख पहचान का संकट और हिंसा आज के संदर्भ में सामाजिक बहस की मांग करता है। राम मेश्राम, शेख अब्दुल हमीद की ग़ज़लें तथा सीमा श़फक के ख़त, स्वामी वाजिद कासमी की रचना ॔पर्वत पर जब रहा अपना डेरा, के संदर्भ व तफसीलें पाठक के जेहन में स्थान बना लेंगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी पॄने व विचारने योग्य हैं।

Sunday, December 5, 2010

‘हिंदी चेतना’ का महामना मालवीय विशेषांक-पाठकों के लिए साहित्यिक उपहार

पत्रिका: हिंदी चेतना, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, प्रमुख सम्पादक: श्याम त्रिपाठी, संपादक: डाॅ. सुधा ओम ढीगरा, पृष्ठ: 82, ई मेल: hindichetna@yahoo.ca , वेबसाईट: http://www.hindi-chetna.blogspot.com/ , http://www.vibhom.com/ फोन/मो. (905)7165, सम्पर्क: 6 Larksmere Court, Markham, Ontario L3R3R1
विश्व प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रिका हिंदी चेतना का समीक्षित अंक 48 महामना मदनमोहन मालवीय जी पर एकाग्र है। अंक में मालवीय जी पर संग्रह योग्य पठनीय सामग्री का प्रकाशन किया गया है। अब तक भारत सहित किसी भी देश में मालवीय जी पर इतनी अधिक विविधतापूर्ण व उपयोगी सामग्री किसी पत्रिका में पढ़ने में नहीं आई है। संस्मरण खण्ड के अंतर्गत मालवीय जी पर एकाग्र संस्मरण व आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें उनके व्यक्तित्व व कृतित्व के साथ साथ रचनाकारों ने अपने विचार भी व्यक्त किए हैं। सभी लेख मालवीय जी के विविध स्वरूपों पर भलीभांति प्रकाश डाल सके हैं। महामना का हिंदी प्रेम(चंद्रमौलि मणि), महामना का विलक्षण(गिरधर मालवीय), महामना मदनमोहन(ओमलता अखौरी), राष्ट्रशिक्षक पंडित(डाॅ. चंद्र सूद), मनुष्य में पशुत्व....(वीरभद्र मिश्र), मानस सुत अथक...(वेदप्रकाश वटुक), अत्यंत पवित्र था...(डाॅ. शंकरदयाल शर्मा), वे बातें वे छवियां(राजकुमारी सिन्हा), वह युवक(गोपालदास नागर), मालवीय जी और हिंदी(डाॅ. दिग्विजय सिंह), प्यार की सौगात(डाॅ. अफरोज ताज), सबसे बड़ा भिक्षुक(शीला मालवीय), मेरे परिवार जैसे(डाॅ. आनंद संुदरम्), उन्होंने पत्थरों में जान डाल दी(अखिलेश शुक्ल) अमन की आशा(डाॅ. गुलाम मुतर्जा शरीफ) एवं हिंदी के पितामाह(प्रो. हरिशंकर आदेश) आलेखों संग्रह योग्य व हिंदी के सामान्य पाठक से लेकर शोधार्थियों के लिए समान रूप से उपयोगी हैं। महामना जी पर एकाग्र कविताएं उनके जीवन संघर्ष व आम जन की भलाई के लिए किए गए कार्यो पर अपने अपने दृष्टिकोण से प्रकाश डालती हैं। श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी, राजकुमारी सिन्हा, अमित कुमार सिंह, मैथिलीशरण गुप्त तथा संजीव सलिल की कविताएं मालवीय जी के प्रति श्रृद्धांजलि के साथ साथ उनके द्वारा किए गए कार्यो का पुर्नस्मरण भी है। पत्रिका की अन्य रचनाओं में सीताराम चतुर्वेदी व श्रीकांत कुलश्रेष्ठ की रचनाएं भी उल्लेखनीय है। श्री श्याम त्रिपाठी जी का संपादकीय अंक के संयोजन व प्रस्तुतिकरण में अथक परिश्रम, रचना संग्रह व महामना अंक प्रकाशन की दृढ़ इच्छा शक्ति व्यक्त करता है। अंतिम पृष्ठ पर पत्रिका की संपादक डाॅ. सुधा ओम ढीगरा ने स्पष्ठ किया है कि इस अंक की योजना बहुत पहले बन गई थी। बुद्धिजीवियों व रचनाकारों को मालवीय जी पर अंक न निकालने की सलाह दी थी। यह प्रसन्नता की बात है कि डाॅ. सुधा जी के जुनून तथा कर्मठता ने एक जन-उपयोगी व सार्थक अंक पाठकों के सामने लाने का भागीरथी प्रयास सफलतापूर्वक किया है। इससे पाठकों को मालवीय जी के जीवन संघर्ष से प्रेरित होने व लाभ उठाने का अमूल्य अवसर मिलेगा।

हिंदी का वैश्विक विस्तार-‘साक्षात्कार’

पत्रिका: साक्षात्कार, अंक: जून-जुलाई 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल, पृष्ठ: 120, मूल्य: 30 रू.(वार्षिक 250 रू.), ई मेल: sahitya_academy@yahoo.com , वेबसाईट: N.A. , फोन/मो. 0755.2554782, सम्पर्क: मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, वाणगंगा, भोपाल म.प्र.
साहित्य जगत की शीर्ष पत्रिका साक्षात्कार का समीक्षित अंक साहित्यिक सामग्री से भरपूर है। अंक में सुधीर सक्सेना, सुरेश उजाला, वीरेन्द्र गोयल तथा वसंत सकरगाए की कविताएं आज के भ्रष्टतम होते समाज के बीच लोगों में आशा का संचार करती हैं। अंक में प्रकाशित कहानियों में ‘बिग बाजार’(रमेश दवे), पापी चाण्डाल(शिवकुमार पाण्डेय) तथा शर्त का सच(दिव्या शुक्ला) भी वर्तमान परिवेश के लिए कुछ नया करने की बात कहती है। पत्रिका के इस अंक में प्रकाशित सभी लेख मानव जीवन व उससे जुड़ी समस्याओं पर विचार करते दिखाई देते हैं। रामेेश्वर मिश्र पंकज, कन्हैया सिंह, श्याम स्रुंदर दुबे, श्रीराम परिहार तथा शंकर शरण के लेख आश्वस्त करते हैं कि समाज का वातावरण भले ही बिगड़ गया हो पर उसमें सुधार किया जा सकता है। वरिष्ठ साहित्यकार राममूर्ति त्रिपाठी से अमित कुमार विश्वास की बातचीत भूमंडलीकरण के दौर में काव्य तथा कला पर एकाग है। काव्य को उनकी चिंता आम पाठक की चिंता भी है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं भी पठनीय व जानकारीपरक हैं। पत्रिका का संपादकीय विश्व में हिंदी के बढ़ते प्रभाव पर एक गंभीर चिंतन है।

Saturday, December 4, 2010

‘नेपथ्य में रहकर भी मंच पर रहे तनवीर’-‘इप्टा वार्ता’

पत्रिका: इप्टा वार्ता, अंक: जुलाई 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: हिमांशु राय, पृष्ठ: 12, मूल्य उपलब्ध नहीं(वार्षिक उप. नहीं), ई मेल: iptavarta@rediffmail.com , वेबसाईट: http://www.iptavarthahindi.blogspot.com/ , फोन/मो. 0761.2417711, सम्पर्क: पी.डी. 4, परफेक्ट एन्क्लेव, स्नेह नगर, जबलपुर 02 म.प्र.
नाट्य प्रधान पत्रिका इप्टा वार्ता के समीक्षित अंक में जनउपयोगी समाचारों का प्रकाशन किया गया है। यह समाचार नाट्य से जुड़े लोगों के साथ साथ आम आदमी को भी नाटकों के प्रति रूचि जाग्रत करने में पूरी तरह से सहायक हैं। पत्रिका के मुख पृष्ठ पर समाचार ‘नेपथ्य में रहकर भी मंच पर ही रहे तनवीर’ एक ऐसा समाचार है जो आम जन की नाट््य व उसके स्वरूप पर जिज्ञासा शांत करता है। वसंत काशीकर का लेख ‘कहानी का रंगमंच’ नाट्य रूपांतर को लेकर लिखा गया एक सार्थक व पाठकों को नाटकों की बारीकियों से अवगत कराने वाला लेख है। समाचार रंगालाप नाट्य समारोह तथा आवाज का शेष भाग प्रभावित करता है। समाचार ‘रायपुर में हबीब की याद’, इफतेखार नाट्य समारोह तथा रवि वासवानी की यादें संदर्भ हेतु काफी विस्तृत जानकारी प्रदान करती हैै। पत्रिका का संपादकीय पढ़ने व मनन योग्य है।

Sunday, November 28, 2010

अरे! मैं तो अप्रवासी था(संपादकीय)-‘वागर्थ’

पत्रिका: वागर्थ, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 120, मूल्य:20रू.(वार्षिक 200रू.), ई मेल: , वेबसाईट: , फोन/मो. 033.32930659, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद, 36 ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता
पत्रिका का समीक्षित अंक इसके पूर्ववर्ती अंकों के समान संग्रह योग्य है। अंक में वर्ष 2010 में साहित्य के नोबल पुरस्कार पर ख्यात कवि व आलोचक अशोक वाजपेयी जी का लेख काफी कुछ कहता है। नद दुलारे वाजपेयी जी का सामाजिक सदभाव व समरसता पर लेख तथा मकबूल फिदा हुसैन से सीमा चैधुरी की बातचीत इस समरसता पर विस्तार से विचार करती है। स्त्री की आवाज के अंतर्गत चंद्र किरण सौनेरेक्सा का लेख काफी मायने रखता है। ख्यात कथाकार उदयप्रकाश, स्वप्निल श्रीवास्तव, शोभा सिंह व प्रत्यूष चंद्र मिश्र की कविताएं समाज में व्यापप्त असमानताओं पर विचार लोगों को एक दूसरे के करीब लाने में तत्पर दिखाई देती हैं। दोनों कहानियां(बनियान-उमेश अग्निहोत्री, रणनीति-प्रमोद कुमार अग्रवाल) भी समाज व समाजिकता के लिए प्रयासरत हैं। राम मेश्राम की ग़ज़लें तथा अनुभूति के अंतर्गत विजयदेव नारायण शाही(प्रस्तुति-कमल किशोर गोयनका) पत्रिका की अनोखी तथा संग्रह योग्य प्रस्तुति है। आलोचना पसंद करने वाले पाठकों के लिए प्रो. मैनेज र पाण्डेय का लेख हिंदी आलोचना और मुक्ति का सवाल एक पठनीय व मनन योग्य लेख है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं, पत्र आदि भी स्तरीय हैं। हमेशा की तरह संपादकीय एक गंभीर चिंतन मनन योग्य लेख की तरह है।

Saturday, November 27, 2010

प्रगति वार्ता का नया अंक

पत्रिका: प्रगति वार्ता, अंक: 55-वर्ष 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: डाॅ. रामजन्म मिश्र, सच्चिदानंद, पृष्ठ: 48, मूल्य:20रू.(वार्षिक 240रू.), ई मेल: , वेबसाईट: , फोन/मो. 06436.222467, सम्पर्क: प्रगति भवन चैती दुर्गा स्थान, साहिबगंज 816100 झारखण्ड
पत्रिका के समीक्षित अंक में डाॅ. मोहनानंद मिश्र व डाॅ. हरपाल सिंह के आलेख साहित्य व संस्कृति का अच्छा लेखा जोखा प्रस्तुत करते हैं। दिवाकर पाण्डेय, रेखा चतुर्वेदी, किशनलाल शर्मा तथा ज्ञानदेव मुकेश की कहानियां प्रभावित करती हैं। डाॅ. रामजन्म मिश्र का संस्मरण तथा मोहन द्विवेदी, अंकुश्री की कविताएं अच्छी हैं। जयकांत सिंह व अनीता रश्मि के आलेख भी उल्लेखनीय हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं भी ठीक ठाक हैं।

Thursday, November 25, 2010

मृत्युशास्त्र ही पढ़ने योग्य है(संपादकीय)-‘साहित्य सागर’

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 52, मूल्य:20रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: , वेबसाईट: , फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल म.प्र.
साहित्य सागर का समीक्षित अंक ख्यात रचनाकर्मी राजेन्द्र मिलन पर एकाग्र है। अंक मंे प्रकाशित अन्य रचनाओं में ब्रजबिहारी निगम, रमेश सोबती, माधवशरण द्विवेदी, पशुपति नाथ उपाध्याय, श्रीमती भारती राउत व नर्मदा प्रसाद त्रिपाठी की रचनाएं व आलेख प्रभावित करते हैं। सनातन कुमार वाजपेयी, आचार्य भगवत दुबे, जयसिंह आर्य, रामसहाय बरैया, चन्द्रसेन विराट, दामोदर शर्मा, मनोज जैन मधुर, कमला सक्सेना, गिरिमोहन गुरू एवं पे्रमलता नीलम की कविताएं आज के वातावरण को सटीक अभिव्यक्ति प्रदान करती है। पुष्पारानी गर्ग व प्रभात दुबे की लघुकथाएं भी स्तरीय व पठनीय हैं। डाॅ. राजेन्द्र मिलन पर प्रो. शरदनारायण खरे का लेख व उनके लेखन पर विभिन्न अभिमत अच्छी जानकारी प्रदान करते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र आदि भी समयानुकूल व उपयोगी हैं।

Tuesday, November 23, 2010

कथाबिंब का नया अंक

पत्रिका: कथा बिंब, अंक: जुलाई-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, सम्पादक: माधव सक्सेना अरविंद, मंजुश्री, पृष्ठ: 52, मूल्य:15रू.(वार्षिक 60रू.), ई मेल: kathabimb@yahoo.com , वेबसाईट: http://www.kathabimb.com/ , फोन/मो. 25515541, सम्पर्क: ए-10, बसेरा आॅॅफ दिन क्वारी रोड़, देवनार मुम्बई 400088
कथाप्रधान त्रैमासिकी कथाबिंब के समीक्षित अंक मंे अच्छी व पठनीय कहानियों का प्रकाशन किया गय हैै। इनमें प्रमुख हैं - फंदा क्यो?(डाॅ. सुधा ओम ढीगरा), पिताजी चिंता न करे(चंद्रमोहन प्रधान), चूल्हे की रोटी(सुरेन्द्र अंचल), सइयां निकस गए(डाॅ. वासुदेव) एवं सरहद के पार(डाॅ. संदीप अवस्थी)। पत्रिका की सबसे अच्छी रचना डाॅ. सुधा ओम ढीगरा की कहानी ‘फंदा क्यो?’ है। कहानी का कथानक बहुत ही मार्मिक है व पाठक को मन की गहराइयों तक आंदोलित करता है। दिनेश पाठक शशि, जसविंदर शर्मा, विकास रोहिल्ला, की लघुकथाएं उल्लेखनीय हैं। डाॅ. भावना शेखर, राही शंकर व उमाश्री की कविताएं आज के संदर्भो से भलीभांति जुड़ी हुई प्रतीत होती है। अन्य कविताएं, ग़ज़लें आदि केवल खानापूर्ति लगती है। ख्यात व्यंग्यकार एवं व्यंग्य यात्रा के संपादक प्रेम जनमेजय से सुश्री मधुप्रकाश की बातचीत अच्छी व समसामयिक होने के साथ साथ आज के साहित्यिक वातावरण की गहन पड़ताल करती है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, रचनाएं आदि भी पढ़ने योग्य हैं।

Monday, November 22, 2010

बस अब और कुछ नहीं-‘केवल सच’

पत्रिका: केवल सच, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, सम्पादक: ब्रजेश मिश्र, पृष्ठ: 62, मूल्य:25रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: , वेबसाईट: http://www.kewalsach.com/ , फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: पूर्वी अशोक नगर, रोड़ नं. 14, कंकड़बाग, पटना 800020 बिहार
पत्रिका केवल सच बिहार की राजधानी पटना से विगत पांच वर्ष से लगातार प्रकाशित हो रही है। समीक्षित अंक पत्रिका का संपादकीय संग्रह अंक है। पत्रिका नेे विगत पांच वर्ष में जो भी संपादकीय प्रकाशित किए हैं उन्हें पुनः प्रकाशित किया गया है। इनमें से प्रमुख है- बस एक और आंदोलन, हावी होती पश्चिमी सभ्यता, क्या हम आजाद हैं?, कौन है अपना और पराया, राजनीतिक उल्लू, झूठ बोल कौवा काटे, राम बड़े या रावण, न्यायालय और बढ़ता अपराध, दिल है कि मानता नहीं, अब और नहीं, जागते रहो जैसे उच्च कोटि के विचार योग्य संपादकीय का पुनः प्रकाशन पत्रिका का स्वर व उसकी दिशा की जानकारी देता है।

Sunday, November 21, 2010

क्या साहित्य बचेगा?-‘समावर्तन’

पत्रिका: समावर्तन, अंक: नवम्बर 2010, स्वरूप: मासिक, समग्र संपादक: रमेश दवे, सम्पादक: मुकेश वर्मा, निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ: 102, मूल्य:25रू.(वार्षिक 250रू.), ई मेल: samavartan@yahoo.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
साहित्य जगत के शीर्ष पर स्थापित हो चुकी इस पत्रिका ने अपने अथक परिश्रम से पाठकों को साहित् य सुलभ कराया है। समीक्षित अंक आंशिक रूप से ख्यात कवि केदार नाथ सिंह पर एकाग्र है। पत्रिका के संपादक रमेश दवे से उनकी बातचीत साहित्य के कुछ अनसुझे प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास करती हैे। केदार नाथ सिंह जी का आलेख ‘क्या साहित्य बचेगा?’ व उनकी बेटी संध्या सिंह का लेख मेरे बाजी संगह योग्य जानकारी उपलब्ध कराते हैं। डाॅ. नामवर सिंह, दूधनाथ सिंह व अरूण कमल के लेख भी उनकी कविताओं के साथ साथ उनके समग्र व्यक्तित्व पर भलीभांति प्रकाश डाल सके हैं। ‘मैं जिद्दी ढंग का आशावदी हूं’ साक्षात्कार प्रत्येक नवलेखक के लिए पठनीय है। पत्रिका की व्यंग्य केन्द्रित भाग के अंतर्गत ख्यात व प्रतिष्ठित व्यंग्यकार गोपाल चतुर्वेदी पर अच्दी सामग्री संजोयी गई हैै। व्योमेश शुक्ल, अरूण शीतांश, पवन जैन की कविताएं आज के संदर्भो से जुड़कर नया कुछ कर सकने के लिए प्रयासरत दिखाई देती है। पत्रिका की एकमात्र कहानी ‘सप्तश्रंृगी(सतीश दुबे) एक अच्छी व पठनीय कहानी है। इस बार का रंगशीर्ष सिरेमिक को विभिन्न रूपों में ढालकर दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देने वाली युवा कलाकार शम्पा शाह पर एकाग्र है। राजुला शाह, दीपाली दरोज व नवीन सागर, अनंत गंगोला, मुदिता भण्डारी उनके व्यक्तित्व की विशेषताएं बहुत अच्छी तरह से पाठकों के सामने लाते हैं। राग तेलंग, सुशील त्रिवेदी व विनय उपाध्याय के स्तंभ हमेशा की तरह पत्रिका की उपयोगिता बनाए रखने में सहायक रहे हैं।

Saturday, November 20, 2010

डूब जाने के विरूद्ध(संपादकीय)-‘कथन’

पत्रिका: कथन, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संस्थापक संपादक: रमेश पाध्याय, सम्पादक: संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ: 98, मूल्य:25रू.(वार्षिक 100रू.), ई मेल mailto:kathanpatrika@hotmail.comtmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 011.25768341, सम्पर्क: 107, साक्षरा अपार्टमेंट्स, ए-3, पश्चिम विहार नयी दिल्ली 110068
कथा प्रधान त्रैमासिकी कथन अपने पूर्ववर्ती अंकों के समान पठनीय रचनाओं से युक्त है। अंक में प्रकाशित कहानियां आम आदमी को समस्याओं के दलदल से निकालकर विकास की मुख्य धारा में लाने की छटपटाहट लिए हुए है। किस्सा अनजाने द्वीप का(जोसे सारामागो, अनु. जितेन्द्र भाटिया), बाजार में बगीचा(सी. भास्कर राव), झूठ(महेश दर्पण), दूसरा जीवन(प्रभात रंजन) तथा दीनबंधु बाबू का मकान(रूपलाल बेदिया) कहानियों में उपरोक्त कथन की सत्यता परखी जा सकती है। ऋतुराज, लीलाधर मंडलोई, लाल्टू तथा प्रदीप जिलवाने की कविताओं में बाज़ारवाद के दुष्परिणामों से जन साधारण के अप्रभावित रहने का आग्रह है। इसे लीलाधर मंडलोई की ‘अपराध का धंधा’ तथा ‘रिश्तों की नमी’ कविताओं से अच्छी तरह से जाना जा सकता है। लगभग यही स्वर प्रदीप जिलवाने की कविता ‘आभास’ में भी दिखाई देता है। वरिष्ठ कवि राजेश जोशी महेश चंद्र पुनेठा की कविताओं पर टिप्पणी करते हुए उन्हीं दुष्परिणामों से सचेत रहने का आग्रह करते हैं जो हमारी संस्कृति में बाजारवाद से प्रविष्ट हुए हैं। समाज के दलित श्रमजीवी वर्ग को पुनेठा बाजारीकरण के दुष्परिणामों से सचेत रहने का आग्रह करते हैं। आदित्य निगम से पत्रिका की संपादक संज्ञा उपाध्याय की बातचीत समाज के नए नजरिए पर एकाग्र है। प्रश्न ‘सामाजिक परिवर्तन के लिए किया जाने वाला कोई भी आंदोलन वर्तमान समाज की समस्याओं को हल करने के लिए भविष्य की ओर देखता है .....।’ के उत्तर में श्री आदित्य निगम का कहना है कि, ‘‘मसलन माक्र्स के समय को आप देखें तो माक्र्स के पास भविष्य के वे खयाल नहीं थे जो सोवियत रूस के वजूद में आने के बाद माक्र्सवादियों को हासिल हुए।’’ इस उत्तर से लगता है कि माक्र्स का भविष्य के संबंध में कोई चिंतन ही नहीं था। पर माक्र्स का चिंतन भविष्य को लेकर भी उतना ही सटीक था जितनी उन्होंने वर्तमान में परिवर्तन की अपेक्षा समाज से की है। विचार स्तंभ के अंतर्गत मिहिर शाह, रमेश उपाध्याय, मुकुल शर्मा व गोहर रजा ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अनिश्चितता पर विचार संग्रह योग्य हैं। पंजाबी के सुप्रसिद्ध कवि परविंदरजीत की कविता ‘‘जन साधारण’’ के अंश ‘मेरी फ्रिकों में वह सब कुछ शामिल है , जो इंसान को इंसान से करता है खारिज’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं व यही कविता का केन्द्रीय भाव भी है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्थायी स्तंभ, पत्र समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Tuesday, November 16, 2010

अंधेरे और उजाले के बाहुपाश मे(संपादकीय)-‘साहित्य परिक्रमा’

पत्रिका: साहित्य परिक्रमा, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, प्रबंध संपादक: जीत सिंह जीत, सम्पादक: मुरारी लाल गुप्त गीतेश, पृष्ठ: 64, मूल्य:15रू.(वार्षिक 60रू.), ई मेल: shridhargovind@gmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0751.2422942, सम्पर्क: राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क, ग्वालियर म.प्र.
अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास द्वारा प्रकाशित यह पत्रिका संस्थान के सजग पहरी श्रीधर गोविंद जी के अथक परिश्रम से दिनप्रति दिन निखरती जा रही है। समीक्षित अंक में प्रकाशित प्रायः सभी आलेख अपनी विषय वस्तु के साथ भलीभांति न्याय कर सके हैं। रामकथा परंपरा एवं प्रवाह(डाॅ. गिरजाशंकर गौतम), कबीर-काव्य और विश्वबंधुत्व का भाव(प्रो. चमनलाल गुप्ता), हिंदी शोध में स्तालिनवार(अशोक कुमार ज्योति) तथा डाॅ. रमानाथ त्रिपाठी कृत रामकथा में नारी विमर्श(रामविलास अग्रवाल) आलेख आज के युवा रचनाकारों का मार्गदर्शन कर उन्हें साहित्य के साथ गहराई तक जुड़ने की पे्ररणा देते हैं। तेलुगु कहानी ‘रेल के इंजन ने सीटी दी’(ऐता चंद्रैया, अनु. ओम वर्मा) तथा विश्वमोहन तिवारी जी का ललित निबंध मेरा नाती सिद्ध करते हैं कि अब हिंदी साहित्य विश्व की किसी भी भाषा के साहित्य से कमतर नहीं है। प्रायः सभी कहानियां आमज न को अभिव्यक्ति देती हैं। इनमें प्रमुख हैं- बेंत(महेश मिश्र), हम किस ओर(अंजु उबाना) तथा अभागिन(सरोज गुप्ता)। इस बार की लघुकथाओं पर कुछ अधिक परिश्रम किए जाने की आवश्यकता थी। लेकिन फिर भी अखिलेश निगम अखिल तथा सीताराम गुप्ता ने इनके साथ अच्छा निर्वाह किया है। कृष्ण चराटे का व्यंग्य अच्छा व मनन योग्य है। कुमार रवीन्द्र, देवेन्द्र आर्य, कुलभूषण कालड़ा, मीना खोंड़, यतीन्द्र तिवारी, विजय त्रिपाठी, अली अब्बास, आचार्य भगबत दुबे, तेजराम शर्मा, नरेन्द्र लाहड़, श्रीमती सुबोध चतुर्वेदी तथा नलिनीकांत की कविताएं भी आमजन के उन अछूते विषयों पर दृष्टिपात करती हैं जिनपर गंभीरतापूर्वक विचार किए जाने की आवश्यकता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार भी प्रभावित करते हैं।

Monday, November 15, 2010

मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका का नया अंक

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, प्रधान संपादक: डाॅ. रामसंजीवैया, गौरव संपादक: डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, मूल्य:5रू.(वार्षिक 50रू.), ई मेल: brsmhpp@yahoo.co.in , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 080.23404892, सम्पर्क: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर 560010 (कर्नाटक)
मैसूर हिंदी प्रचार परिषद द्वारा प्रकाशित इस पत्रिका में हमेशा अच्छे व संग्रह योग्य आलेखों को स्थान दिया जाता है। समीक्षित अंक में जीवन और कला...(एस.पी. केवल), भारती का भारतदर्शन(डाॅ. एम.शेषन), हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा(हितेश कुमार शर्मा), हिंदी अंक अस्पृश्य क्यों?(देवेन्द्र भारद्वाज), विश्व भाषा हिंदी(दिलीप शा. घवालकर), अकबर काल में हिंदी का उत्थान(डाॅ. अमर सिंह बधान), समरांगण उपन्यास में चित्रित विविध आयाम(एम. नारायण रेड्डी), जयशंकर प्रसाद की कृतियों में नारी विषयक दृष्टिकोण(मिरगणे अनुराधा), अर्श पर नारी(प्रेमलता मिश्रा) तथा नारी तुम केवल श्रद्धा हो(प्रदीप निगम) लेख सार्थक व अपने अपने विषयों का अच्छा प्रतिपादन करते हैं। पत्रिका का सबसे अच्छा व विश्लेषणात्मक आलेख प्रगतिवादी रचनाकर्मी: केदारनाथ अग्रवाल है। गोविंद शेनाय, इन्द्र सेंगर तथा दिलीप भाटिया की लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। नरेन्द्र सिंह सिसोदिया, प्रकाश जीवने, मधुर, रामगोपाल वर्मा, वाई.एस. तोमर यशी तथा लालता प्रसाद मिश्र की कविताएं आज की कविताओं से अलग हटकर हैं। शोधपरक आलेख स्मृति शेष-2 डी.आर.(प्रो.बी.वै. ललिताम्बा) मंे नए ढंग से विचारों को शोध छात्रों के लिए प्रस्तुत किया गया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी स्तरीय हैं।

Sunday, November 14, 2010

हिंदी साहित्य के ‘हिमाचल मित्र’

पत्रिका: हिमाचल मित्र, अंक: जून-सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: कुशल कुमार, सलाहकार संपादक: अनूप सेठी, पृष्ठ: 108, मूल्य:20रू.(वार्षिक 80 रू.), ई मेल: himachalmittra@gmail.com , वेबसाईट: http://www.himachalmittra.com/ , फोन/मो. 09869244269, सम्पर्क: डी-46/16, साई संगम, सेक्टर 48, नेरूल, नयी मुम्बई 400.706
आज देश भर में विभिन्न प्रादेशिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं। यह वह समय है जब बढ़ती साक्षरता व सामाजिक जाग्रति की वजह से देश के साथ साथ विश्व का आम जन एक दूसरे के समीप आ चुका है। इस समय में हिंदी साहित्य जगत की पत्रिकाएं अपनी तरह से योगदान कर रही हैं। इस पुनीत कार्य में हिमाचल मित्र का योगदान उल्लेखनीय है। पत्रिका हिमाचल ही नहीं देशभर के साहित्य व कला जगत का प्रतिनिधित्व करती है। समीक्षित अंक में ख्यात बांसरी वादक राजेन्द्र सिंह गुरंग से बातचीत कला जगत के विस्तारित होते स्वरूप पर एक गंभीर चर्चा है। लोक संस्कृति के अंतर्गत हिमाचली लोक साहित्य में मुक्तक गीत(कृष्ण चंद्र महादेविया), हिमाचली कोकिलाःवर्षा कटोच(अशोक जेरथ) तथा लाहौल स्पिति के जनजातीय लोगों का विवाह समारोह(उरज्ञान छैरिंग मैलगपा) प्रकाशित लेख हिमाचल की लोक कला की विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं। छत्तीसगढ़ की परंपरा व संस्कृति पर ख्यात कवि शरद कोकास का लेख ‘देश की हर शहर में एक छत्तीसगढ़ है’ लेख विचार योग्य व पठनीय आलेख है। ‘सतखसमी’ भले ही पहाड़ी गाली हो पर कहानी पढ़कर इसके कथ्य व शिल्प से भलीभांति परिचित हुआ जा सकता है। संुदर लोहिया एक ऐसे कहानीकार हैं जो अपने आसपास के समाज से कथानक लेकर उसे कथा में ढालने में सिद्धहस्त हैं। कुलदीप शर्मा, भास्कर चैधुरी, हंसराज भारती, सिद्धेश्वर सिंह की कविताएं विश्वास दिलाती हैं कि भले ही कविता विधा को लेकर कूुछ भी कहा जाए पर यह चिर अमर विधा है। यह बरसों पहले थी और कई साल बाद तक अस्तित्व में रहेगी। बद्री सिंह भाटिया की कहानियों में समाज के निचले तबके तथा कमजोर लोगों को मुख्य धारा में लाने का जज्बा दिखाई देता है। उनकी कहानी लाजवन्ती पढ़कर आप उक्त विचार की प्रासंगिकता समझ सकते हैं। एच.आर. हरनोट से बातचीत कथा विधा के साथ साथ साहित्य के विभिन्न पहलूओं पर विचार करती है। पहाड़ी कलम के अंतर्गत यश मालवीय, केशो ज्ञानी, धौलाधार की कविताएं व रेखा ढडवाल के गीत प्रभावित करते हैं। अनूप सेठी, गप्पी बरैबर, केशव चंद्र, की रचनाएं पहाड़ी जीवन से आम जन को जोड़ने में पूर्णतः सफल रहे हैं। शैलेन्द्र सिहं का हिमालय दर्शन व पत्रिका ने पहाड़ी लेखकों डाॅ. गौतम व्यथित तथा डाॅ. प्रत्यूष गुलेरी से सार्थक व सारगर्भित बातचीत की है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Saturday, November 13, 2010

समृद्ध संस्कृति ही समृद्ध राष्ट्र की पहचान होती है-‘हिमप्रस्थ’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य:5 रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. (000)00000, सम्पर्क: हि.प्र. प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला 5
शासकीय पत्रिकाओं में सबसे अलग किस्म की पत्रिका हिमप्रस्थ के समीक्षित अंक में समाज से जुड़े हुए विषयों पर आलेखों का प्रकाशन किया गया है। अंक में फारसी के दरबारी माहौल में खुसरों की हिंदवी कविता(कृपाशंकर सिंह), बदलते दौर में साहित्य के सरोकार(कृष्ण कुमार यादव), हिंदी पत्रकारिताःचुनौतियां एवं जन अपेक्षाएं(सुरेश उजाला), धरती धन न अपना में पंजाबी दलित वर्ग की स्थिति(पूजा कपूर) एवं नारी चेतना का सृजन(ललिता चैहान) विशेष रूप से ध्यान देने योग्य आलेख हैं। प्रदीप कंवर का यात्रा वर्णन कुछ अधिक गंभीर हो गया है जिससे उसकी सरसता प्रभावित हुई है। राजीव गुप्त एवं कालीचरण प्रेमी की लघुकथाएं ठीक ठाक कही जा सकती है। कहानियों में शहतूत पक गए हैं(संतोष श्रीवास्तव) अच्छी व लम्बे समय तक याद रखी जाने वाली कहानी है। सुरभि तथा निधि भारद्वाज की कहानी भी अच्छी है लेकिन कहीं कहीं इन कथाओं में कथातत्व विलोपित सा हो गया है। देवांशु पाल, यशोदा प्रसाद सेमल्टी, एल.आर. शर्मा तथा जया गोस्वामी की कविताएं समयानुकूल हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी अच्छी व पठनीय हैं।

Friday, November 12, 2010

‘हिंदुस्तान पेपर संदेश’ का संयुक्तांक

पत्रिका: संदेश, अंक: 72-73, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. प्रमथनाथ मिश्र, पृष्ठ: 32, मूल्य:उपलब्ध नहीं, (वार्षिक उपलब्ध नहीं), ई मेल: , वेबसाईट: http://www.hindpaper.in/ , फोन/मो. (033)22496911, सम्पर्क: हिंदुस्तान पेपर कारपोरेशन लिमिटेड, 75 सी, पार्क स्ट्रीट, कोलकाता 700016
यह पत्रिका हिंदुस्तान पेपर कारपोरेशन का मुखपत्र है। अंक में कारपोरेशन से संबंधित विचार व अन्य रचनाओं का समावेश किया गया है। प्रायः सभी लेखों में हिंदी व उसके राजभाषा स्वरूप पर विचार किया गया है। इनमें राकेश कुमार, कुसुम धीर, बसन्ती लाल बाबेल, दिग्विजय सिंह व अश्विनी कुमार के लेख प्रमुख हैं। पत्रिका में हिंदी के ख्यात आलोचक डाॅ. रामविलास शर्मा के दो लेखों को भी पत्रिका में प्रमुख रूप से स्थान दिया गया है। कृष्ण कुमार ग्रोवर, डाॅ. शहाबुद्दीन नियाज मुहम्मद शेख, डाॅ. प्रमथनाथ मिश्र, रवीन्द्र अग्निहोत्री तथा राजभाषा विभाग के संयुक्त सचिव का लेख भी उल्लेखनीय है।

Thursday, November 11, 2010

साहित्य का धंधा और सम्मान की चाह(संपादकीय)-‘अरावली उद्घोष’

पत्रिका: अरावली उद्घोष, अंक: सितम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: बी.पी. वर्मा ‘पथिक’, अतिथि संपादक: भागीरथ, पृष्ठ: 80, मूल्य:20रू. (वार्षिक 80रू.), ई मेल: , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. (0294)2431742, सम्पर्क: 448, टीचर्स कालोनी, अम्बामाता स्कीम, उदयपुर 313.001(राजस्थान)
सामाजिक साहित्यिक, जनचेतना के लिए प्रतिबद्ध पत्रिका अरावली उद्घोष के समीक्षित अंक में प्रकाशित रचनाओं का मूल स्वर आदिवासियों के अस्तित्व की चिंता है। अंक में आदिवासियों पर आए अस्तित्व के संकट को लेकर परिचर्चा आयोजित की गई है। इस परिचर्चा से आदिवासियांे पुनर्वास व कल्याण के लिए सुझाव व उनसे जुड़ी समस्याओं पर विचार आए हैं। रामजी ध्रुव, साहू रामलाल गुप्ता, जे. आर. आर्मी, सुरेन्द्र नायक, चन्दालाल चकवाला, जवाहर सिंह मार्को, अमित पोया के साथ साथ भागीरथ जी के विचार उपयोगी व अमल में लाने योग्य हैं। कहानियों में थप्पड़(डाॅ. परदेशी राम वर्मा), त्रासदी....माय फुट(रमेश उपाध्याय) तथा वरेन्डा(केदार प्रसाद मीणा) अच्छी व समाज से जुड़ी हुई रचनाएं हैं। विशेष रूप से त्रासदी......माय फुट का कथानक भोपाल गैस त्रासदी की फिर से याद दिला देता है। कहानी पढ़कर गैस से पीड़ित लोगांे के दुख दर्द व उनकी पीड़ा से आम पाठक अपने आप को जुड़ा पाता है। गिरजा शंकर मोदी, अशोक सिंह, राजकुमार कुम्भज व हेमराज मीणा ‘दिवाकर’ की कविताएं अच्छी व आम जन को अभिव्यक्ति प्रदान करती है। एन.जी. ओ. साम्राज्यवाद के चाकर(जेम्स पेत्रास तथा हेनरी वेल्तमेयर), अम्बेड़कर का सपना अभी अधूरा है(वेद व्यास), हम भ्रष्टाचार और शोषण को कैस खत्म कर सकते हैं(वी.टी. राजशेखर), आदिवासी नहीं जलाते रावण को(के.आर. शाह) तथा आदिवासी वीर छीतू किराड़ राजा(विद्या कालूसिंग) के लेख पठनीय व सहेजकर रखने योग्य हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं तथा समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Tuesday, November 9, 2010

गांधी साहित्य एवं विचार की पत्रिका-‘हिंदुस्तानी जबान’

पत्रिका: हिंदुस्तानी जबान, अंक: अक्टूबर-दिसम्बर2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: सुशीला गुप्ता, पृष्ठ: 120, मूल्य:10रू. (वार्षिक 40रू.), ई मेल: hp.sabha@hotmail.com , वेबसाईट: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. (022)22812871, सम्पर्क: महात्मा गांधी मेमोरियल रिसर्च सेंटर, महा. गां. बिल्डिंग, 7 नेताजी सुभाष रोड़ मुम्बई 400002
गांधी साहित्य एवं विचार के प्रचार प्रसार मंे वर्षो से लगी पत्रिका के समीक्षित अंक में अच्छी व पढ़ने योग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। पत्रिका का साहित्य गांधी जी के विचारों को आज के संदर्भ में भी प्रस्तुत करता है। प्रकाशित प्रमुख आलेखों में गांधी जी की सकारात्मक सोच(डाॅ. सुरेन्द्र वर्मा), गांधी जी के अहिंसा सिद्धांत की प्रासंगिकता(डाॅ. सत्यपाल श्रीवत्स), वैश्विक बदलावः स्त्री और कथा साहित्य(उर्मिला शिरीष), हिंदी कहानियों में बाल मजदूरी(सूर्या बोस), आधुनिक हिंदी ग़ज़ल का शिल्प(श्री विजय अरूण), भाषा को नहीं काव्य को बचाओ(जसप्रीत कौर जस्सी) एवं लोक साहित्य में स्वाधीनता की अनुगंूज(आकांक्षा यादव) प्रमुख हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार भी उपयोगी हैं।

Sunday, November 7, 2010

कादम्बिनी क्लब हैदराबाद का ‘पुष्पक’

पत्रिका: पुष्पक, अंक: 15, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. अहिल्या मिश्र, पृष्ठ: 112, मूल्य:75रू. (वार्षिक 250रू.), ई मेल: mishraahilya@yahoo.in , वेबसाईट: , फोन/मो. (040)23703708, सम्पर्क: 93सी, राजभवन, वेंगलराव नगर, हैदराबाद 500038 सी-7 आंध्रप्रदेश
पत्रिका पुष्पक के समीक्षित अंक मंे अच्छी व पठनीय रचनाओं को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। सभी कहानियां आज के वातावरण तथा अपसंस्कृति पर विचार करती दिखाई देती है। इनमें प्रमुख हैं - मानवता जीवित है(शांति अग्रवाल), पुराना प्रेमी(पवित्रा अग्रवाल), पिता की ममता(रमा द्विवेदी), शपथ(मधु भटनागर), सबका मालिक एक है(वी. वरलक्ष्मी)। लघुकथाओं में संजय कुमार द्विवेदी, विनादिनी गोयनका, सुधाकर आशावादी, विक्की नरूला, प्रेमबहादुर कुलश्रेष्ठ एवं जगदीश पाठक प्रभावित करते हैं। ए. अरविंदाक्षन, अहिल्या मिश्र, हीरालाल प्रसाद जनकवि, रामशंकर चंचल, देवेंन्द्र कुमार मिश्रा, अनिल अनवर, ज्ञानेंद्र साज, यासमीन सुल्ताना, सुरेंन्द्र अग्निहोत्री, कमल सिंह चैहान, शुभदा पाण्डेय, सराफ सागरी, चंपालाल बैड, मीना मुथा, डाॅ. सुरेश उजाला की कविताएं मानव को कुछ नया करने के लिए प्रेरित करती हैं। सत्यप्रकाश अग्रवाल एवं राजेन्द्र परदेसी के व्यंग्य अपने अपने तरीकों से समाज की कुरीतियों पर प्रहार करते हैं। प्रमुख लेखों में प्रेमचंद्र के कथा साहित्य में दलित स्त्री(शुभदा वांजपे), भारतीय समाज में स्त्री स्वतंत्रता(सरिता सुराणा जैन), नारी उत्पीड़नःशोर बनाम सच(लक्ष्मी नारायण अग्रवाल), साहित्य में पुरस्कारों की राजनीति(राम शिव मूर्ति यादव), वैचारिक क्रांति क्यों और कैसे?(डाॅ. महेश चंद्र शर्मा) को शामिल किया जा सकता हैै। डाॅ. मोहन आनंद द्वारा लिखी गई जीवनी तथा डाॅ. सीता मिश्र का संस्मरण ‘महारानी कालेज’ भी उल्लेखनीय रचना है। पत्रिका की अन्य रचनाएं समीक्षाएं व समाचार प्रभावित करते हैं।

Saturday, October 30, 2010

नामवर सिंह हमारे युग के एक फिनीमिनन हैं(राजेन्द्र यादव)-‘पाखी’

पत्रिका: पाखी, अंक: मई2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अपूर्व जोशी, पृष्ठ: 96, मूल्य:20रू. (वार्षिक 240रू.), ई मेल: pakhi@pakhi.in , वेबसाईट: http://www.pakhi.in/ , फोन/मो. (0120)4070300, सम्पर्क: इंडिपेडेंट मीडिया इनिशिएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोयड़ा उ.प्र.
पत्रिका पाखी का यह अंक हिंदी के ख्यात आलोचक-वरिष्ठ साहित्यकार डाॅ. नामवर सिंह जी पर एकाग्र है। इसके पूर्व भी उन पर तीन चार अंक प्रकाशित हो चुके हैं। डाॅ. नामवर सिंह जी पर अंक निकालना अत्यधिक साहस व जोखिम का कार्य है। इसलिए प्रायः अन्य साहित्यिक पत्रिकाएं भले ही किसी विधा विशेष या अन्य रचनाकार पर अंक निकाल लें पर डाॅ. नामवर सिंह जी पर उन्हें प्रायः कठिनाइयों का सामना ही करना पड़ता है। समीक्षित अंक में उन पर स्थापित तथा स्थापित होने की दिशा में अग्रसर लेखकों द्वारा लेख लिखे गए हैं। सुरेश शर्मा द्वारा लिखे गए उनके जीवन परिचय में वर्ष दर वर्ष उनकी साहित्यिक यात्रा को पाठक तक पहुंचाने का प्रयास किया गया है। आकलन के अंतर्गत विश्वनाथ त्रिपाठी, प्रो. निर्मला जैन, खगेन्द्र ठाकुर, कमला प्रसाद, रघुवीर चैधरी, नंद किशोर नवल, ए. अरविंदातन, राजेन्द्र कुमार, विमल कुमार, कमेन्द्रु शिशिर एवं राजीव रंजन गिरि के लेख हैं। प्रायः सभी लेखों से यह झलकता है कि जो लेखक उनके करीब हैं, उन्होंने और करीब आने का प्रयास किया है। कुछ लेखकों ने उनके आभामण्डल में आने की जुगाड़ भी इस बहाने की है। स्तंभ ‘पुस्तक के बहाने’ में उनकी कुछ कृतियों पर आलेख लिखे गए हैं। इन्हें भगवान सिंह, पुरूषोत्तम अग्रवाल, प्रो. रामवक्ष, सुधीर रंजन सिंह, राकेश बिहारी, वैभव सिंह एवं वैकटेश कुमार ने लिखा है। कुछ लेख पुस्तकों की समीक्षा जैसे लगते हैं तो वहीं कुछ में लेखक भी स्वयं अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर रचना का विशेषज्ञ बनने की घोषणा करता दिखाई देता है। इस वजह से इन लेखों की सरसता प्रभावित हुई है। हालांकि आलोचनात्मक लेखों में सरसता की अपेक्षा प्रायः नहीं की जाती है। लेकिन आम पाठक के लिए भी कुछ न कुछ स्पेस होना ही चाहिए। उनके शिष्यों भगवान सिंह व तरूण कुमार ने लेखों में अपने व्यक्तिगत संबंध व अनुभवों को ही अधिक विस्तार दिया है। डाॅ. परमानंद श्रीवास्तव का लेख तथा परिचर्चा ‘हमारे समय में नामवर’ पत्रिका की उपलब्धि कही जा सकती है। संस्मरण खण्ड के अंतर्गत राजेन्द्र यादव, गुरूदयाल सिंह, काशीनाथ सिंह, भारत भारद्वाज एवं आलोक गुप्ता सहित अन्य लेखकों ने उनकी अपेक्षा उनसे अपने निजी संबंधों का खुलासा ही अधिक किया है। बकलम खुद के अंतर्गत ‘जीवन क्या जिया’ व ‘रचना और आलोचना के पथ पर’ उनके ऐसे लेख हैं जो साहित्यप्रेमी वर्षो याद रखेंगे। महावीर अग्रवाल, की डायरी में वाया नामवर सिंह जी साहित्य के संबंध मंे संग्रह योग्य जानकारी मिलती है। श्री नामवर सिंह जी की कलम से के अंतर्गत उनके कुछ लेखों का पुुनः प्रकाशन पत्रिका को अधिक व्यापक बनाने की दिशा में किया गया एक अच्छा प्रयास है। ख्यात कथाकार, हंस के संपादक राजेन्द्र यादव व आलोचक समीक्षक विजेन्द्र नारायण सिंह के लेख प्रकाशित कर संपादक ने अच्छी साहसिकता का परिचय दिया है। इस तरह के कुछ गिने चुने लेख ही पत्रिका को अभिनंदन गं्रथ की संज्ञा प्रदान करने से मुक्त करते हैं। अच्छा होता कि यदि पाखी इस आयोजन से दो तीन माह पूर्व पाठकों को भी इसमें शामिल कर उनके विचार भी प्रकाशित करती। प्रश्न प्रकाशित कर उनके उत्तर मंगवाकर पाठकांे को भी सीधे तौर पर इस आयोजन में शामिल करने पर पत्रिका संग्रह योग्य व शोधार्थियों के लिए उपयोगी हो जाती। लेकिन फिर भी पहल, पूर्वग्रह व वसुधा के आयोजन के पश्चात यह प्रयास वैश्विक स्तर पर माक्र्सवाद के अवसान की बेला में स्वागत योग्य है। सफलता के पैमाने पर पत्रिका को दस में से छः अंक दिए जा सकते हैं। इसलिए पत्रिका के संपादक व उनकी टीम बधाई की पात्र है।

Thursday, October 28, 2010

‘साहित्य सागर’ का अक्टूबर 2010 अंक

पत्रिका: साहित्य सागर, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ: 54, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग:उपलब्ध नहीं , फोन/मो. 0755.4260116, सम्पर्क: 161 बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया भोपाल म.प्र
साहित्य की सेवा में निरंतर लगी हुई यह पत्रिका हमेशा कुछ नया करने के प्रयास में रहती है। इसी श्रृंखला में पत्रिका ने यह अंक शास्त्री रामगोपाल चतुर्वेदी ‘निश्चल’ को समर्पित कर उनपर एकाग्र किया है। पत्रिका के समीक्षित अंक में सनातन कुमार वाजपेयी, प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र, आशा सक्सेना, मदनप्रसाद सक्सेना, प्रो. शरदनारायण खरे, जगदीश शरण मधुप के जानकारीपरक आलेखोें का प्रकाशन किया गया है। चतुर्वेदी जी पर एकाग्र सभी रचनाएं आकर्षक व जानकारीपरक है। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समाचार व पत्र आदि भी अच्छे व रोचक हैं।

Wednesday, October 27, 2010

वाणी प्रकाशन समाचार

पत्रिका: वाणी प्रकाशन समाचार, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: अरूण माहेश्वरी, पृष्ठ: 20, मूल्य: 5रू.(वार्षिक उपलब्ध नहीं), ई मेल: vaniprakashan@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.vaniprakashan.in/ , फोन: 011.23273167, सम्पर्क: वाणी प्रकाशन, 21 ए, दरियागंज नई दिल्ली 110.002
देश के प्रमुख व ख्यातिप्राप्त साहित्यिक पुस्तक प्रकाशन समूह की यह मासिक समाचार प्रकाशन पत्रिका है। अंक में नवीनतम प्रकाशनों के समाचार प्रकाशित किए गए हैं। कुछ महत्वपूर्ण प्रकाशनों से उपयोगी समाग्री भी पत्रिका अपने अंकों में प्रकाशित करती है। पत्रिका के मुख पृष्ठ पर काव्यशास्त्र के विविध आयाम शीर्षक के पश्चात यूनानी अभिजात्य चिंतन तथा कृष्णलाल शर्मा का आलेख ‘त्रासदी में करूणा-भय और कथार्सिस’ प्रकाशित किया गया है। काव्यशास्त्र पर एकाग्र ख्यात आलोचक व इग्नू की पूर्व प्राध्यापक प्रो. निर्मला जैन की पुस्तक ‘नयी समीक्षा का उदय’ पर लिखा गया लेख इसे पढ़ने के लिए प्रेरित करने में पूर्णतः सक्षम है। शब्दों का उचित प्रयोग(किशोरीदास वाजपेयी), भाषा मानक और परिनिष्ठित(महेन्द्रनाथ दुबे) से संबंधित जानकारी वर्तमान में हिंदी साहित्य के वैश्विक स्वरूप व उसके स्तर की ओर संकेत करती है। नए प्रकाशन के अंतर्गत विवाह की प्रासंगिकता(डाॅ. के.एम. मालती) व अज्ञेय के जन्मशती पर पुस्तक ‘अज्ञेय:कवि और काव्य’(डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद), अज्ञेय की कविता परंपरा और प्रयोग(रमेश ऋषिकल्प) एवं अज्ञेय एक अध्ययन(भोला भाई पटेल) पर लिखे गए आलेख इनके संबंध में संक्षेप में बहुत ही उपयोगी जानकारी देते हैं। अज्ञेय व उनके कथा साहित्य पर गोपाल राय की पुस्तक कहानी में रूचि रखने वाले प्रत्येक पाठक के लिए अनिवार्य प्रतीत होती है। ओम प्रभाकर के संग्रह काले अक्षर भारतीय, एक था शैलेन्द्र(राजेन्द्र यादव) व भरोसे की बहन(श्यौरराज सिंह बैचेन) की पुस्तकंे व उनपर लिखे गई जानकारी यह सिद्ध करती है कि हिंदी अब विश्व की अन्य भाषाओं का मार्गदर्शन करने की स्थिति में आ गई है। ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित ख्यात ग़ज़ल गो शहरयार से बातचीत, भारतीय लेखक को पाकिस्तान का सम्मान समाचार पत्रिका के स्वरूप को और अधिक व्यापकता प्रदान करते हैं।

Tuesday, October 26, 2010

नारी चेतना की प्रगतिशील पत्रिका-‘नारी अस्मिता’

पत्रिका: नारी अस्मिता, अंक: जून-नबम्बर 2010, स्वरूप: त्रैमासिक, संपादक: डाॅ. रचना निगम, पृष्ठ: 56, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 100 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: 15, गोयागेट सोसायटी, शक्ति अपार्टमेंट, बी-ब्लाक, द्वितीय तल, एस/3, प्रतापनगर वडोदरा 390.004 गुजरात
देश भर में नारी चेतना जाग्रत करने के लिए प्रयासरत पत्रिका का समीक्षित अंक अनेक पठनीय आलेखों से युक्त है। अंक में रूखसाना सिद्दकी, श्रीमती रेनू सक्सेना, डाॅ. शकुन्तला कालरा, मोहिनी राजदान, पूनम गुजराती व अनीता पारीख के लेख नारी सशक्तिकरण के विचार को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। सभी कहानियां आज के समाज व उसमें महिला की लगातार बदलती भूमिका पर गंभीरतापूर्वक प्रकाश डालती है। इसे कहानियों शुरूआत(संतोष श्रीवास्तव), तुम्हारा अमि(अनुभव शर्मा ऐनी), जब जागो तभी सवेरा(नीलिमा टिक्कू) व हादसे के बाद(मुन्नूलाल) में महसूस किया जा सकता है। वीणापांणी जोशी, सूर्यकांत पाण्डेय, जयश्री राय की कविताएं नयापन लिए हुए हैं। लघुकथाओं में कुछ भी नया नहीं है। विचारमंच के अंतर्गत आयोजित चर्चा में आत्महत्या विषय पर विचार किया गया है। इस पर पत्रिका द्वारा आयोजित परिचर्चा में कुछ अच्छे विचार सामने आते हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्तंभ व समाचार आदि भी प्रभावित करते हैं।

Sunday, October 24, 2010

‘वागर्थ’ का अक्टूबर 2010 अंक

पत्रिका: वागर्थ, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ: 120, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 200 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.bhartiyabhasaparishad.com/ , फोन/मो. 033.329306, सम्पर्क: भारतीय भाषा परिषद, 36 ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता
हिंदी साहित्य की अग्रणी पत्रिका के अक्टूबर अंक में विचार योग्य व अच्छी विश्लेषण सामग्री का प्रकाशन किया गया है। समीक्षित अंक में उदयप्रकाश जी अपने ब्लाॅग पर मेघा पाटकर की कविता ‘अंतर’ और ‘उत्तर पाठिकता’ को विशेष रूप से स्थान दिया है। कृष्ण कुमार रत्तू का लेख लौटेगा क्या कभी डोलना का चेहरा पठनीय व जानकारीप्रद है। गांधी और हिंद स्वराज पर वीरेन्द्र कुमार वरनवाल तथा हितेन्द्र पटैल के लेख स्वराज पर नए सिरे से विचार करते दिखाई पड़ते हैं। लोक विमर्श के अंतर्गत लेख पर्यावरण एवं विकास(सुभाष शर्मा) व बड़े लोग बड़ा भ्रष्टाचार(गिरीश मिश्र) विमर्श के माध्यम से आम पाठक को भारतीय समाज की बुराईयों व उसके दुष्परिणामों के प्रति आगाह भी करते हैं। मुद्राराक्षस का लेख ‘क्या सारे बड़े कवि एक ही बड़ी कविता लिख रहे है’ तथा कृपाशंकर सिंह ‘कविता का तिलिस्म’ आलेख में कवि एवं कविता पर आज के संदर्भ में विचार करते हैं। दिलीप शाक्य की लम्बी कविता तथा ज्ञानेन्द्रपति, सुनीता जोशी व मिथलेश कुमार की कविताएं ै बाज़ारवाद के दुष्परिणामों को पहचान चुकी हैं। यही कविता का एक प्रमुख उद्देश्य भी है कि वह तत्कालीन समाज को सचेत करता रहे। कहानियों में जिंदगी अफसाना नहीं(समाल बिन रजाक), तस्मैं श्री गुरूवै नमः(दामोदर दत्त दीक्षित), अर्जन्या(हरि मृदुल) एवं अर्जन्या(प्रमोद भार्गव) में भी आशावादी समाज के लिए संदेश दिया गया है। पत्रिका धर्मयुग पर पद्मा सचदेव को लेख व चित्रा मुदगल का आलेख कहानियां लिखतीं कहानियां प्रत्येक नव रचनाकार का मार्गदर्शन करती हैं। अकील अहमद अकील की उर्दू ग़ज़ल के साथ साथ जहीर कुरेशी, भारत यायावर, विनय मिश्र व महेश कटारे सुगम की ग़ज़लें प्रभावित करती हैं। कवि गोपाल सिंह नेपाली पर राजीव श्रीवास्तव के लेख में विवरण की अपेक्षा विस्तार अधिक आ गया है जिससे लेख बिखर सा गया है। अन्य अंकों की तरह पत्रिका का संपादकीय विचार व विश्लेषण युक्त है।

Saturday, October 23, 2010

‘शुभ तारिका’ का अक्टूबर 2010 अंक

पत्रिका:शुभ तारिका, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: उर्मि कृष्ण, पृष्ठ: 34, मूल्य: 12रू.(वार्षिक 120 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0171.2610483, सम्पर्क: कृष्ण दीप ए 47, शास्त्री कालोनी, अंबाला छावनी 133.001 हरियाणा
विगत 38 वर्ष से लगातार साहित्य की सेवा कर रही पत्रिका शुभ तारिका के इस अंक में अच्छी व विविधतापूर्ण रचनाओं को स्थान दिया गया है। अंक में महावीर उत्तरांचली, चंद्र भानु आर्य, पवन चैधरी मनमौजी, चेतन आर्य, किशनलाल शर्मा व लेखराम शर्मा की लघुकथाएं प्रकाशित की गई हैं। पत्रिका में इस बार लेखक परिशिष्ट के अंतर्गत दिलीप भाटिया को स्थान दिया गया है। हितेश शर्मा, कुलभूषण कालड़ा, अशोक सिंह व खत्री कुमार की कविताएं प्रभावित करती हैं। गुलनाज की कहानी बसेरा का कथ्य व शिल्प आज की समस्याओं पर विस्तार से प्रकाश डालता है। अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व समाचार आदि भी पठनीय हंै।

Friday, October 22, 2010

वर्तमान साहित्य में ‘समय के साखी’

पत्रिका:समय के साखी, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. आरती, पृष्ठ: 60, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 220 रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: , फोन/मो. 09713035330, सम्पर्क: बी 308, सोनिया गांधी काम्पलेक्स, हजेला हाॅस्पिटल के पास, भोपाल 462003 म.प्र.
समय के साखी के समीक्षित अंक में कुछ अच्छी सार्थक रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। पत्रिका का स्वर तो प्रगतिवादी है लेकिन पत्रिका बाज़ारवाद को पूरी तरह से खारिज भी नहीं करती है। यह इस पत्रिका के इस समीक्षित अंक में महसूस किया जा सकता है। अंक में सुधीर विद्यार्थी व अर्चना द्विवेदी के आलेख भी इसी बात की पुष्टि करते हैं। प्रेमशंकर रघुवंशी, कैलाश पचैरी, नरेन्द्र गौड़, जितेन्द्र धीर व राहुल आदित्य राय अब भूमंडलीकरण में प्रगति का स्वर ढूंढ रहे हैं। चित्रा मुदगल की कहानी ‘अपनी वापसी’ पुनः पढ़कर अच्छा लगा। अमलेन्द्रु उपाध्याय, कृष्ण कुमार यादव के लेख भी पत्रिका का स्वर प्रखर करते हंैं। अन्य रचनाएं,समीक्षाएं भी ठीक ठाक हैं।

माक्र्स की क्रांतिगंध बनाम गांधी की शान्ति गंध(संपादकीय)-‘‘समावर्तन’’

पत्रिका:समावर्तन, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रमेश दवे, मुकेश वर्मा, पृष्ठ: 90, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 250 रू.), ई मेल: samavartan@yahoo.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 0734.2524457, सम्पर्क: माधवी 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.
साहित्य एवं नाटकों के लिए समर्पित पत्रिका के इस अंक में ख्यात कवि राजेश जोशी व प्रसिद्ध चित्रकार विष्णु चिंचालकर पर एकाग्र है। अंक में कवि राजेश जोशी के समग्र व्यक्तित्व व उनके जीवन संघर्ष पर गंभीर लेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें संपादक रमेश दवे, केदार नाथ सिंह, सुधीर रंजन सिंह के लेख प्रमुख ध्यान देने योग्य हैं। उर्मिला शिरीष व विजय कुमार से उनकी बातचीत साहित्य का गहन गंभीर विश्लेषण करती है। निरंजन श्रोत्रिय की कवि अमित मनोज की कुछ चुनी हुई कविताएं, सत्यमोहन शर्मा, सदाशिव कौतुक, व कुमार सुरेश की कविताएं अच्छी है। सतीश श्रोत्रिय व सुरेश शर्मा की लघुकथाएं प्रभावित करती हैं। चंद्रभान राही की कहानी ‘बेटा’ का शिल्प व कनक तिवारी का आलेख प्रभावित करते हंै। विष्णु चिंचालकर पर सूर्यकांत नागर, प्रभु जोशी, दिलीप विष्णुपंत, शाहिद मिर्जा के लेख विष्णु जी की कला का संतुलित व संश्लेषित विश्लेषण करते हैं। पिलकेन्द्र अरोड़ा, राग तेलंग, प्रेम शशांक व रमेश खत्री के लेख व विनय उपाध्याय का सतंीा अन्य पठनीय रचनाएं हैं।

Thursday, October 21, 2010

समय का सृजनात्मक संवाद-‘‘मानसरोवर’’

पत्रिका: मानसरोवर, अंक: पावस अंक 2010, स्वरूप: अनियतकालीन, संपादक: विनोद कुशवाहा, देवेन्द्र सोनी, पृष्ठ: 38, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 80रू.), ई मेल: , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 9425043026, 9827624219, सम्पर्क: मानसरोवर साहित्य समिति, पर्व एल.आई.जी. 85, न्यास कालोनी, इटारसी म.प्र.
मध्यप्रदेश की रेलनगरी इटारसी से प्रकाशित पत्रिका मानसरोवर संभवतः एक ऐसी पत्रिका है जो ऋतुओं के आधार पर प्रकाशित की जाती है। पत्रिका के समीक्षित अंक मंे सावित्री शुक्ल, ब्रजमोहन सिं ठाकुर, विनय दुबे, श्रीराम निवारिया व कमलेश चैधरी की कविताएं प्रकाशित की गई हैं। अजय कुलश्रेष्ठ का लेख, कमलेश् ा बख्शी, मालती कुशवाहा व नीति अग्रिहोत्री की कहानियां पत्रिका को व्यापक बनाती है। ब्रजकिशोर पटेल व अखिलेश शुक्ल की लघुकथाएं तथा अजय गंगराडे की रचना पत्रिका का अन्य आकर्षण है।

Wednesday, October 20, 2010

चिंतन की मासिक पत्रिका-‘‘प्रगति वार्ता’’

पत्रिका: प्रगति वार्ता, अंक: अगस्त 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: सच्चिदानंद, पृष्ठ: 60, मूल्य: 20रू.(वार्षिक 240 रू.), ई मेल: pragativarta@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 06436.222467, सम्पर्क: प्रगति भवन, चैती दुर्गा स्थान, साहिबगंज 816.109 झारखण्ड
साहित्य चिंतन की प्रमुख पत्रिका प्रगति वार्ता का समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- गंगा और बनारस(अरविंद कुमार सिंह), लोक संस्कृति की लय है कजरी(कृष्ण कुमार यादव), आस्था-अनास्था(प्रभात दुबे) एवं सामाजिक चेतना के प्रबुद्ध(प्रो. यशवंत कुमार लक्ष्मण) शामिल हैं। व्यक्तित्व के अंतर्गत रामनिहाल गंुजन का लेख सर्वाधिक सुरूचिपूर्ण व पठनीय है। राम अधीर व देवेन्द्र कुमार देवेश की कविताएं अच्छी व समसामयिक हैं। यू.एस. तिवारी का संस्मरण मेरे गुरू हरिशंकर परसाई संस्मरण जैसा कहीं से नहीं लगता है। आज बहुत से लेखक व्यंग्य लिख रहे हैं। लेकिन पता नहीं उनके अनुसार व्यंग्य वे किसे मानते हैं? समझ से परे है। प्रगति वार्ता में भी जो व्यंग्य प्रकाशित किए गए हैं वे उस कोटि के व्यंग्य नहीं हैं जिन्हें अब तक पाठक पढ़ता रहा है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं आदि भी ठीक ठाक हैं।

‘‘मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका’’ का नया अंक

पत्रिका: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक: सितम्बर2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: डाॅ. बी. रामसंजीवैया, गौरव संपादक: डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ: 52, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल: brsmhpp@yahoo.co.in , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. 080.23404892, सम्पर्क: मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर 560010 कर्नाटक
कर्नाटक में हिंदी के प्रति आम जन में रूची जाग्रत कर रही यह पत्रिका अब हिंदी साहित्य जगत की एक अग्रगामी पत्रिका बन गई है। इसका त्रुटिविहीन व साफ सुथरा मुद्रण आकर्षित करता है। समीक्षित अंक में आलेख - हिंदी राष्ट्र की भाषासेतु है(प्रभुलाल चैधरी), राष्ट्रभाषा का स्वाधीनता से संबंध(मित्रेश कुमार गुप्त), शताब्दी के आइने में हिंद स्वराज(गणेश गुप्त), भारत और वैश्विक सांस्कृतिक समीकरण(डाॅ. अमर सिंह वधान), महान हिंदी सेवीःभारतेन्द्रु हरीशचंद्र(विनोद कुमार पाण्डेय) तथा साहित्यकार स्मृतिशेष कैसे बनते हैं?(प्रो. बी.वै. ललिताम्बा) पठनीय व शोध छात्रों के लिए उपयोगी हैं। जसविंदर शर्मा की कहानी, बी. गोविंद शैनाय की लघुकथाओं में ताजगी है। श्याम गुप्त एवं लालता प्रसाद मिश्र की कविताओं को अच्छी कविताओं मंे शामिल किया जा सकता है।

Tuesday, October 19, 2010

क्या आप पढ़ना चाहेंगे केवल 5 रू. में ‘‘हिमप्रस्थ’’

पत्रिका: हिमप्रस्थ, अंक: सितम्बर2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ: 56, मूल्य: 5रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल: himprasthahp@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: उपलब्ध नहीं, फोन/मो. उपलब्ध नहीं, सम्पर्क: हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घौड़ा चैकी, शिमला 5 हिमाचल प्रदेश
हिमाचल प्रदेश की खुबसूरत वादियों से निकली साहित्य की बयार को देश भर में महसूस करा रही यह पत्रिका केवल 5 रू. में उपलब्ध है। आज महंगाई के समय में इतनी कम कीमत में उत्कृष्ट साहित्य उपलब्ध कराना साहसिक कदम है। फिर भले ही वह हिमप्रस्थ जैसी शासकीय पत्रिका ही क्यों न हो। समीक्षित अंक में विष्णु प्रभाकर का उपन्यास अर्द्धनारीश्वर(राम निहाल गुंजन), चम्बा की रानी सुनयना और ढोलक गायन(ब्रहमदत्त शर्मा), सुनीता जैन की कहानियों में नारी स्वरूप(योगिता चैहान) एवं जगदीश चन्द्र के उपन्यासों में दलित वर्ग का स्वरूप आलेख प्रभावित करते हैं। पवन चैहान की कहानी ‘इंतजार’ ठीक ठाक है। योगेन्द्र शर्मा की कहानी ‘मास्टर जी’ में कहीं कहीं अनावश्यक विस्तार हो गया है जो कथारस लेने मंे बाधा बनता है। पंकज शर्मा व जोगेश्वरी संधीर की लघुकथाएं अच्छी व समयानुकूल हैं। अरविंद ठाकुर, स्नेहलता, रामचंद्र सोलंकी व पियूष गुलेरी की कविताएं उल्लेखनी हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पठनीय व विचार योग्य हैं।

Monday, October 18, 2010

साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ का अक्टूबर 2010 अंक

पत्रिका: हंस, अंक: अक्टूबर 2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: राजेन्द्र यादव, पृष्ठ: 96, मूल्य: 25रू.(वार्षिक 250 रू.), ई मेल: editorhans@gmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://www.hansmonthly.in/ , फोन/मो. 011.41050647, सम्पर्क: अक्षर प्रकाशन प्रा. लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज नई दिल्ली 02
कथा प्रधान मासिक हंस के समीक्षित अंक में प्रकाशित कहानियों में से कुछ आज के वातावरण व युवा पीढ़ी की सोच पर सटीक बैठती हैं। रेडियो(रामधारी सिंह दिवाकर), बस एक कदम(जकीय जुबेरी), मुक्ति(नीलेन्दु सेन), फटी हुई बनियान(भवानी सिंह), उपकथा(दीपक शर्मा) तथा पहाड़े पहाड़े प्रेम के पत्थर(प्रमोद सिंह) की कहानियों में यह सोच दिखाई देती है। भोलानाथ कुशवाहा, सुहेल अख्तर, उपेन्द्र कुमार की कविताएं सार्थक रचनाएं हैं। शमशेर जी पर आलेख पढ़कर लगा कि लेखक ने केवल शमशेर बहादुर के समग्र का सतही तौर पर अध्ययन कर लेख लिख डाला है। अशोक अंजुम तथा डाॅ. ओम प्रभाकर की ग़ज़लें प्रभावशाली हैं। बहुत दिनों बाद हंस में अच्छा गीत (मदन केवलिया का गीत) पढ़ने में आया है। गंगा शरण शर्मा के हाइकू गीत भी ठीक ठाक हैं। पत्रिका की सबसे बेकार व प्रभावहीन रचना ‘‘कालम जिन्होंने मुझे बिगाड़ा’’ के अतंर्गत प्रकाशित की गई है। मंजरी श्रीवास्तव(मैं पैदाईशी बिगडैल हूं) पढ़कर लगता हैै कि हम सत्यकथा या मनोहर कहानियां पढ़ रहे हैं। हंस का अपना एक स्तर है, आज इस पत्रिका को विश्व स्तर पर हिंदी साहित्य की प्रमुख पत्रिका माना जाता है। इसमें इस तरह के तर्कहीन, गैर साहित्यिक लेख प्रकाशित करने का कोई मतलब नहीं है। वहीं दूसरी ओर अब साहित्यिक पत्रिकाएं इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। इस स्थिति में दुनिया भर के लोग हिंदी साहित्य ये जुड़ रहे हैं। जब वे हंस में इस तरह की रचनाएं पढ़ेंगे तो हिंदी साहित्य के बारे मंे किस तरह की धारणाएं बनायेंगे यह सोचने वाली बात है। शीबा असलम फहमी ने बहुत दिन बाद विवादों से परे हटकर अपनी बात कहने के लिए एक गंभीर व सार्थक विषय चुना है इसके लिए वे बधाई की पात्र है। बीच बहस में के अंतर्गत प्रकाशित लेखों में केवल ‘‘मुझे इन प्रेतों से बचाओ’’’(विश्वनाथ) ही अच्छा व सारगर्भित है। हमेशा की तरह भारत भारद्वाज ने अपने स्तंभ के साथ पूरा पूरा न्याय किया है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, स्तंभ, समाचार आदि समयानुकूल व पठनीय हैं।

Sunday, October 17, 2010

चुप्पी तोड़ो - "समकालीन अभिव्यक्ति"

पत्रिका : समकालीन अभिव्यक्ति, अंक : अप्रैलसितम्बर 2010, स्वरूप : त्रैमासिक, संपादक : उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ : 64, मूल्य : 15रू.(वार्षिक 50 रू.), ई मेल : , वेबसाईट/ब्लॉग : , फोन/मो. 011.26645001, सम्पर्क : फ्लैट नं. 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली 30
पत्रिका समकालीन अभिव्यक्ति का समीक्षित अंक में कई पाठकोपयोगी रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। अंक में प्रकाशित कहानियों में मेमना से मेमना सिंह(कुंवर पे्रमिल), डोली(अखिलेश निगम) तथा उससे उस तक(संतोष माझी) प्रमुख हैं। प्रो. वंशीधर त्रिपाठी, कैलाश चंद्र भाटिया व आकांक्षा यादव के लेख नवीनता लिए हुए हैं। डॉ. गंगाप्रसार वरसैया का व्यंग्य, अनिल डबराल का आलेख प्रस्तर पर बिखरा सौन्दर्य तथा बुद्धिप्रकाश कोटनाला का यात्रा वृतांत अच्छी रचनाएं कही जा सकती हैं। राग तेलंग, अशोक अंजुम तथा तेजराम शर्मा की कविताओं को छोड़कर अन्य कविताएं प्रभावहीन हैं। रामशांकर चंचल की लघुकथा ॔आदमी की नियत’ को छोड़कर अन्य लघुकथाएं महज चुटकुलेबाजी ही लगती हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ भी अपनी उपयोगिता सिद्ध करने में काफी हद तक सफल रहे हैं।

Saturday, October 16, 2010

असली मित्रता को परिभाषित करता है ‘मित्र’-इप्टा वार्ता

पत्रिका: इप्टा वार्ता, अंक: अप्रैल2010, स्वरूप: मासिक, संपादक: हिमांशु राय, पृष्ठ: 08, मूल्य: उपलब्ध नहीं , ई मेल: iptavarta@rediffmail.com , वेबसाईट/ब्लाॅग: http://iptavarta.blogspot.com/ , फोन/मो. 0761.2417711, सम्पर्क: पी.डी. 4, परफेक्ट एन्क्लेव, स्नेह नगर जबलपुर 02, म.प्र.
मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाली यह कला जगत की महत्वपूर्ण समाचार पत्रिका है। समीक्षित अंक में मुख पृष्ठ पर समाचार ‘असली चिंता को परिभाषित करता है मित्र’ समाचार ‘मित्र’ नाटक की गहन व्याख्या करता है। अगले समाचार के रूप मंे ख्यात रंगकर्मी रेखा जी द्वारा बच्चों के बीच गुजारे गए समय का समाचार उनके मिलनसारिता व सहृदयता से परिचय कराता है। संपादक हिमांशु राय का लेख इप्टा का शुरूआती साथी चला गया इप्टा संस्था की गतिविधियों व उसके परिवार से परिचय कराता है। रेखा जैन से उषा आठवले की बातचीत कला जगत में उनके योगदान के बारे में अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां प्रदान करती है। अन्य समाचारों में ‘इप्टा में रहकर सीखा अनुशासन, लगन और डिवोशन’ तथा ‘रंगआधारः भोपाल का ग्यारहवां नाट्य समारोह’ पठनीय व जानकारी परक हैं।