Saturday, October 31, 2009

साहित्य का अच्छा मुखापत्र

सन्देश, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. प्रमथनाथ मिश्र, पृष्ठ-32, सम्पर्क-हिंदुस्तान पेपर कारपोरेशन लिमिटेड़, 75 सी, पार्क स्ट्रीट, कोलकाता 700016 भारत फोन 22496931
केवल आंतरिक वितरण के लिए
हिंदुस्तान पेपर लिमिटेड़ का यह मुखपत्र है। इसमें संस्थान द्वारा किए गए क्रियाकलापों का विस्तृत विवरण प्रकाशित किया जाता है। पत्रिका का मूल स्वर हिंदी साहित्य है। मातृ भाषा के प्रति, भारत में अंग्रेजी बनाम हिंदी, संविधान में हिंदी एवं हिंदी का बाजार जैसे आलेखों का प्रकाशन किया गया है। ये रचनाएं भारतेन्दु हरिशचंद, मार्क टली, डाॅ. लक्ष्मीमल सिघवी एवं रविभूषण की हैं। अमर सिंह वधान का आलेख भारतीय भाषाओं में आपसी समन्वय जरूरी एक उपयोगी व संग्रह योग्य रचना है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी स्वागत योग्य हैं।

Friday, October 30, 2009

अच्छे साहित्य की अच्छी पत्रिका-प्रगतिशील आकल्प

प्रगतिशील आकल्प, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ.शोभनाथ यादव, पृष्ठ-20, मूल्य-1000रू.(वार्षिक), सम्पर्क-पंकज क्लासेस, पोस्ट आॅफिस बिल्ंिडग, जोगेश्वरी पूर्व मुम्बई
पत्रिका के समीक्षित अंक में ख्यात लेखिका चंद्रकिरण सौनेरेक्सा के जीवन की संघर्ष यात्रा का मार्मिक वर्णन सुधा अरोड़ा ने किया है। कहानियों में बिक्कर सिंह आज़ाद, राधेश्याम यादव प्रभावित करते हैं। शब्बरी हसन एवं रामकुमार अत्रेय की कविताएं पत्रिका का अन्य आकर्षण है। योगेन्द्रनाथ शुक्ल एवं राजेन्द्र परदेसी की लघुकथाएं विशेष रूप से प्रभावित करती है। पत्रिका की अन्य रचनाएं व स्तंभ भी इस उल्लेखनीय बनाते हैं।

ये ‘शब्दशिल्पियों के आसपास है

पत्रिका-आसपास, अंक-अक्टूबर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजुरकर राज, पृष्ठ-32, मूल्य-रू.5(वार्षिक 50रू.), सम्पर्क-एच रु उद्धवदास मेहता परिसर, नेहरू नगर भोपाल म.प्र. फोनः(0755)2712051 ई मेलः shabdashilpi@yahoo.com
मध्यप्रदेश से प्रकाशित होने वाली यह प्रमुख समाचार एवं लेखकों की संवाद पत्रिका है। समीक्षित अंक में दुष्यंत कुमार पर डाक टिकिट , ओम व्यास की कविता पाठयक्रम में शामिल होगी, खुद पर भरोसा करके मिलती है मंजिल(अनुराधा शंकर सिंह को वीरता पुरस्कार पर समाचार) आदि प्रमुख समाचारों को प्रकाशित किया गया है। पत्रिका ने ज्ञानरंजन जी के इस्तीफे की खबर, नटवर गीत सम्मान आदि समाचारों को प्रमुखता से प्रकाशित किया है।

Thursday, October 29, 2009

अंचल नहीं देश भर की पत्रिका अंचल भारती

पत्रिका-अंचल भारती, अंक-जुलाई-सितम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. जयनाथ मणि त्रिपाठी, पृष्ठ-64, मूल्य-रू.15(वार्षिक 60रू.), सम्पर्क-अंचल भारती प्रिंटिग प्रेस परिसर, राजकीय औद्योगिक आस्थान, गोरखपुर मार्ग, देवरिया उ.प्र. मो. 0945320654 ई मेलः anchalbharti_80@rediffmail.com
इस ख्यात पत्रिका का कोई अंक बहुत दिनों के बाद मिला है। इसकी वजह अंचल भारती के संपादक जयनाथ मणि त्रिपाठी का स्वास्थ्य खराब होना है। लेकिन फिर भी पत्रिका निखर कर आई है। अंक में प्रकाशित कविताओं में निशांत, सुरेन्द्र दीप, राकेश चंद्रा, ओम नागर, सुशांत सुप्रिय, विजय कुमार सम्पति एवं डाॅ. रामनिवास मानव विशेष रूप से आकर्षित करते हैं। अक्षय गोजा तथा ऋषिवंश की ग़ज़लें आधुनिक संदर्भ तथा समय का संवाद प्रतीत होती हैं। ख्यात आलोचक डाॅ. परमानंद श्रीवास्तव से डाॅ. रजनी श्रीवास्तव की बातचीत आज हिंदी साहित्य जगत की रिक्तता पर विचार करती दिखाई देती है। राजेन्द्र परदेसी ने गगनांचल के संपादक अजय कुमार गुप्ता से बातचीत करते हुए राष्ट्रभाषा एवं वैज्ञानिकता तथा विशिष्ट पाठक वर्ग की उपलब्धता पर विचार किया है। डाॅ. कन्हैया सिंह, रामनारायण सिंह मधुर, विजयशंकर विकुज, विलास गुप्ते एवं डाॅ. अजीत गुप्ता के आलेख साहित्य के विभिन्न विषयों पर विचार दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। अखिलेश शुक्ल, श्याम सखा श्याम, केशव प्रसाद वर्मा एवं किरन मराली की कहानियां अपनी विविधता एवं विषय वस्तु के माध्यम से विशिष्ट छाप छोड़ती हैं। पत्रिका के अन्य स्तंभ एवं रचनाएं उल्लेखनीय हैं व साहित्य जगत में अवश्य ही अपना स्थान बनाएंगी।

पाठकों की पत्रिका --साहित्य सागर

पत्रिका-साहित्य सागर, अंक-अक्टूबर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ-52, मूल्य-रू.20(वार्षिक 250रू.), सम्पर्क-161बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल 462043 फोनः 0755.4260116 ई मेलः kksaxenasahityasagar@rediffmail.com
पत्रिका का यह अंक डाॅ. रामस्वरूप उपाध्याय ‘सरस’ की रचनाओं को अपने कलेवर में समेटे हुए है। अंक में विश्वेश्वरशरण पंसारी, पं. प्रदीप शर्मा, मधु हातेकर, प्रभुदयाल मिश्र, रेखा कक्कड़, डाॅ. रमेश चंद्र खरे एवं डाॅ. गार्गीशंकर मराल के चिंतन की धारा पाठकों तक पहुंचाता है। सनातन कुमार वाजपेयी, कुलतार कौर, जसवंत सिंह विरदी, डाॅ. श्याम बिहारी श्रीवास्तव की कविताएं उल्लेखनीय हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ व रचनाएं भी इसके प्रत्येक अंक की तरह विविधता लिए हुए हैं।

आज के ‘आज के ‘समय के साखी’

पत्रिका-समय के साखी, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. आरती, पृष्ठ-60, मूल्य-रू.20(वार्षिक 220रू.), सम्पर्क-बी-308, सोनिया गांधी काम्प्लेक्स, हजेला हाॅस्पिटल के पास, भोपाल म.प्र. 462003 मो. 9713035330 ई मेलः samaysakhi@gmail.com
पत्रिका के समीक्षित अंक में कुछ उपयोगी व संग्रह योग्य आलेखों का प्रकाशन किया गया है। जिनमें प्रमुख हैं-- डाॅ. दीपक प्रकाश त्यागी(हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का साहित्यिक चिंतन), राजेन्द्र परदेसी(साहित्य के सामाजिक सरोकार) एवं हरमहेंद्र सिंह बेदी(पंजाब का हिंदी साहित्यः पहचान और परख) इन आलेखों केे सामाजिक संदर्भ तथा विषय वस्तु पाठकों को अवश्य ही आकर्षित करेगी। कवितओं में ज्योति पटेल, सुभाष प्रसाद प्रजापति एवं नीरज कुमार गुप्ता की कविताएं शामिल हैं। मैत्रेयी पुष्पा की कहानी ‘फैसला’ एवं गरीब का ईमान(कृष्ण कुमार राय) कहानी मानव जीवन के उत्थान की कहानियां हैं। ग़ज़लों में अशोक अंजुम, जहीर कुरेशी, विनय मिश्रा एवं कृपाशंकर शर्मा अचूक तथा संजय कुमार चतुर्वेदी की लघुकथाएं पत्रिका के स्तर में वृद्धि करती हैं। अन्य आलेख सामयिकी तथा रचनाएं भी आज के संदर्भो केा समेटे हुए है। पत्रिका साज सज्जा व आकर्षक मुद्रण प्रभावित करता है।

Tuesday, October 27, 2009

नज़रिया? आखिर कितने अंको तक? और क्यों?

पत्रिका-हंस, अंक-अक्टूबर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजेन्द्र यादव, पृष्ठ-96, मूल्य-रू.25(वार्षिक 250रू.), सम्पर्क-अक्षर प्रकाशन प्रा.लि., 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110002(भारत) फोनः (011)23270377
कथा प्रधान इस मासिक में कुछ बहुत ही अच्छी कहानियों का समावेश किया गया है। हुस्नबानु का आठवां सवाल(शरद सिंह), पार्टनर(नीरज वर्मा), स्थानापन्न(प्रतिभा), बलुवा हुजूम(मिथिलेश प्रियदर्शनी) एवं दा लास्ट अफेयर्स(घनश्याम कुमार देवांश) शामिल हैं। कविताओं मेें कला सुरैया, नरेश मेहन एवं सुशांत सुप्रिय की कविताएं चर्चा के योग्य हैं। प्रमुख आलेखों में हिंदु मानसिकता के पहलू(कृष्ण बिहारी), जिन्ना के कलपते मंडल(विकास कुमार झा) एवं सच का सामना बनाव सत्य के प्रयोग(दयाशंकर शुक्ल सागर) उल्लेखनीय हैं। वीरेन्द्र कुमार वरनवाल का आलेख वो बात उनकी बहुत नागवार गुजरी पढ़ने व विचार करने योग्य है। इस बार भारत भारद्वाज के स्तंभ में वह बात, वह पैनापन दिखाई नहीं दिया जो हर बार पढ़ने में आता है। पत्रि?का में बार बार नजरिया प्रकाशित कर अनावश्यक रूप से पेज भरने की आवश्यकता समझ से परे है। जबकि इस तरह के विचारों से एक आम पाठक को कोई लेना देना नहीं है क्योंकि सृजन का सबका एक अलग व अपना ढंग होता है, इस क्षेत्र में अनुकरण प्रायः बहुत कारगर सिद्ध नहीं होते।

Sunday, October 25, 2009

कोई भी मीडिया साहित्य को खत्म नहीं कर सकता है(परमानंद श्रीवास्तव)-समापवर्तन

पत्रिका-समावर्तन, अंक-अक्टूबर.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-रमेश दवे, संपादक-निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ-96, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), सम्पर्क-‘माधवी’ 129, दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र. (भारत), फोनः(0734)2524457, ई मेलः samavartan@yahoo.com
पत्रिका का समीक्षित अंक आंशिक रूप से ख्यात आलोचक एवं साहित्यकार श्री परमानंद श्रीवास्तव पर एकाग्र है। उनकी कविताओं एवं आलेख के साथ साथ अष्टभुजा शुक्ल का संस्मरण प्रकाशित किया गया है। दीपक प्रकाश त्यागी से बातचीत में उन्होंने उनके समय में साहित्य पर कुछ उपयोगी व पाठकों के लिए आवश्यक विचार प्रगट किए हैं। वक्रोक्ति के अंतर्गत ख्यात कवि एवं व्यंग्यकार सरोज कुमार के व्यक्तित्व व कृतित्व पर उपयोगी सामग्री पाठक का ध्यान सहज ही आकर्षित करती है। सूर्यकांत नागर से उनकी लम्बी बातचीत तथा आपातकाल पर लिखी गई कविताएं आज भी पठ्नीयता से भरपूर हैं। जवाहर चैधरी का व्यंग्य, कुंदन सिंह परिहार का आलेख एवं शांतिलाल जैन का महाकवि कालीदास पर लिखा गया स्मृति शेष एकाअनेक बार पढ़ने के योग्य है। हरिशचंद्र शुक्ल के कार्टून, आत्मकथ्य व उनसे बातचीत इस कलाकार की संघर्ष यात्रा से रूबरू कराती है। मालती जोशी की कहानी ऊसर में बीज तथा श्रीराम दवे का आलेख ‘रूक तो सही’ व निशा भोंसले, सुदेजा खान की लघुकथाएं भी उल्लेखनीय हैं। कविवर सुदीप बनर्जी पर लिखा गया आलेख ‘सुदीप बनर्जीः कैसे कहें स्वर्गीय’ उन्हें सच्ची श्रृद्धांजलि देता है। हर बार की तरह एक और अच्छे अंक के लिए बधाई।

सामाजिक सरोकारों की कथा का देश--कथादेश

पत्रिका-कथादेश, अंक-अक्टूबर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हरिनारायण, पृष्ठ-98, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), सम्पर्क-सहयात्रा प्रकाशन प्रा. लि. सी.52, जेड़.3, दिलशाद गार्डन, दिल्ली 110095(भारत) फोनः (011)22570252, ई मेलः kathadeshyatra@hotmail.com, kathadesh@gmail.com
पत्रिका के समीक्षित अंक मंे विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री का समावेश किया गया है। अंक में रचनाओं की विविधता ही पत्रिका की विशेषता है। अंक अक्टूबर.09 की मुख्य कहानी राजेन्द्र श्रीवास्तव रंजन की रचना ‘जन्म दिन की पार्टी’ है। कहानी का ताना बान कुछ इस तरह से बुना गया है कि वह आज के महानगरीय संस्कारों व उसकी कुसंस्कृति पर प्रहार करता हैै। जेब में 100 रू. भी न होना व ताज जैसे फाइव स्टार होटल में दिन गुजारने की चाहत हर किसी की हो सकती है ठीक कहानी के प्रमुख पात्रों की तरह। जिसे लेखक ने बाखूबी उजागर किया है। आशुतोष भारद्वाज की कहानी ‘बेविकल्प भी एक यादगार कहानी बन सकती थी यदि इसे लेखक ने समाप्त करने की जल्दी न की होती। इसके अतिरिक्त ‘कुछ टोटल कुछ जमा’(रोमेश जोशी) व अनुदित कहानियां पात्रिका के स्तर के अनुरूप हैं। पत्रिका का प्रमुख आकर्षण ओम भारती व प्रभात की कविताएं हैं। यहां ओम भारती जी की कविता ‘घिसते हुए भी वे’ आम आदमी में जीवन संघर्ष को महसूस किया जा सकता है। नंद किशोर जी ने ‘गाॅधी जी के हे राम’ को नए संदर्भो के साथ पाठकों के समक्ष रखा है। ओमा शर्मा का रिपोतार्ज ‘जादू टोनों के देश में’ तथा मदन सोनी का कृष्ण वलदेव वैद पर लिखा गया आलेख हर पाठक, हिंदी साहित्य के मर्मज्ञ के लिए आवश्यक प्रतीत होता है। दलित प्रश्न के अंतर्गत नमिता दास के पत्र ने विशेष रूप से प्रभावित किया है। भले ही इसमें साहित्यिक रस न हो पर जीवन संघर्ष की अनुगूंज अवश्य ही सुनाई देती है। देवेन्द्र रात अंकुर व ह्षीकेश सुलभ के रंगमंच को लेकर लिखे गए आलेख विविधता के साथ साथ रंगमंच के आंतरिक पक्षों को विश्लेषित करते दिखाई देते हैं। अनिल चमड़िया ने ‘मजदूरों से बात करने का साहस चाहिए’ मीडिया विमर्श में नव पत्रकारों को उनके लेखन में सार तत्व की तरफ विशेष ध्यान देने का आग्रह किया है। अविनाश का इंटरनेट का मोहल्ला व अनूप सेठी ‘साहित्य का वर्तमान’ में विशेष वस्तु ही जटिल हो गई है। जिसकी वजह से से केवल उसी पाठक को रस प्राप्त होगा जो विशुद्ध रूप से साहित्य व इंटरनेट की गहन जानकारी रखता है। इसके अतिरिक्त निरंजन श्रोत्रिय , सिद्धार्थ शंकर, रवीन्द्र त्रिपाठी, सत्यनारायण, विश्वनाथ त्रिपाठी व अर्चना शर्मा की रचनाएं भी वर्तमान सरोकारों व सामाजिक संदर्भ पर दृष्टिपात करती हैं। कथादेश के प्रत्येक अंक पठनीयता से भरपूर होते हैं। लेकिन पत्रिका के मीडिया विशेषांक के आगे लगता हैै हर अंक फीका ही होगा।

आम पाठक के लिए उपयोगी पत्रिका-शुभ तारिका

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-अक्टूबर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-श्रीमती उर्मिकृष्ण, पृष्ठ-34, मूल्य-रू.12(वार्षिक 120रू.), सम्पर्क-कृष्णदीप ए-47, शास्त्री कालोनी, अम्बाला छावनी 133001 फोनः 0171-2610483 (भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में पुरस्कृत कहानियों का प्रकाशन किया गया है। कहानी प्रतियोगिता का आयोजन गोवा निवासी साहित्यकार श्रीमती जयश्री राय ने किया था। तीनों कहानियां विशेष महत्व रखती हैं। गंगा सागर(माला वर्मा), मेरी जिंदगी अपनी है(गीता जैन) एवं वह लड़की(पंकज शर्मा) अपनी विषय वस्तु के साथ् ा न्याय करती हुई दिखाई देती हैं। इन कहानियों में आज के सदर्भ भी कहीं न कहीं जुडे़ हुए हैं। लघुकथाओं में डाॅ. शमीम देवबन्दी, किशन लाल शर्मा, नीलम राकेश, चन्द्रभानु, गिरिजा कुलश्रेष्ठ व आलोक भारती की लघुकथाएं अच्छी व पठ्नीय हैं। डाॅ. महाराज कृष्ण जैन का पत्रकारिता पर लिखा गया आलेख पत्रिका की प्रमुख रचना है। कविताओं में केदारनाथ सविता, बालकवि बैरागी, अपर्णा चतुर्वेदी एवं रमेश मनोहरा प्रस्तुतीकरण के दृष्टिकोण से प्रभावित करती हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं व समीक्षाएं तथा पत्र आदि भी इसे आम पाठक के लिए उपयोगी बनाते हैं।

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Saturday, October 24, 2009

एक और उपयोगी अंक--संदर्भ वागर्थ

पत्रिका-वागर्थ, अंक-171, अक्टूबर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ-146, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), सम्पर्क-भारतीय भाषा परिषद, 36-ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता 700017 भारत फोनः (033)22817476, ई मेलः bbparishad@yahoo.co.in
पत्रिका का समीक्षित अंक साहित्यकारों के साथ साथ आम पाठकों के लिए पठनीय व संग्रह योग्य रचनाओं को संजोये हुए है। अंक में ख्यात विचारक किशन पटनायक का विचारपूर्ण आलेख गुलाम दिमाग का छेद गहन व विशद अध्ययन की मांग करता है। राममनोहर लोहिया जी का आलेख हिंदु बनाम हिंदु तथा शब्बीर हुसैन और जमुना प्रसाद की कविताएं आज के संदर्भ में भी उतनी ही उपयोगी हैं जितनी वे कई बर्ष पूर्व थीं। मनोज कुमार झा व सुधीर सक्सेना की कविताएं बिलकुल नए संदर्भ तथा तानेबाने के साथ अपनी बात रखती हुई दिखाई देती हैं। सूर्यनारायण रणसुभे, श्रीभगवान सिंह एवं विजय कांत के आलेख इन लेखकों के गहन अध्ययन का सुखद परिणाम है। सिद्वेश व अमित मनोज की कहानी तथा ख़ालिद जावेद की कथाओं के रूपांतर सरसता लिए हुए हैं। सुदर्शन वशिष्ठ व रामकुमार आत्रेय की कविताएं तथा रत्नेश कुमार की लघुकथा वागर्थ के हर इंटरनेट पाठक को अवश्य ही पसंद आएंगी। पत्रिका की अन्य रचनाएं ग़ज़ल व स्थायी स्तंभ भी इसे उपयोगी व संग्रह योग्य बनाते हैं। पत्रिका के इस 171 वे पडाव के लिए बधाई।

Friday, October 23, 2009

समकालीन रचनाएं व सृजनगाथा

पत्रिका-सृजन गाथा, अंक-38 जुलाई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-जयप्रकाश मानस, पृष्ठ-ई पत्रिका(इंटरनेट पर उपलब्ध), मूल्य-फ्री पढ़ने के लिए उपलब्ध, बेव यूआरएल-- http://www.srijangatha.com/
इंटरनेट पर उपलब्ध ई पत्रिका सृजन गाथा का समीक्षित अंक इस वर्ष का 04 अंक है। हमेशा की तरह पत्रिका का स्तर अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं से कमतर नहीं है। अंक में मुक्तिबोध तथा चन्द्रकांत देवताल जी को उनकी कुछ प्रमुख कविताओं के माध्यम से पुर्नप्रस्तुत किया गया है। अंक में प्रकाशित प्रमुख कवियों में --नवल किशोर कुमार, गिरीश पंकज, अष्टभुजा शुक्ल एवं नंदकिशोर आचार्य शामिल हैं। ‘माह के कवि’ स्तंभ के अंतर्गत नीरज दईया की कुछ सार्थक व पठ्नीय कविताओं को प्रकाशित किया गया है। सुदर्शन प्रियदर्शनी(प्रवासी कविता) की कविता पढ़कर विदेशों में रह रहे भारतीयों की भारत के प्रति चिंता व उसके विकास की मंशा का पता बखूबी चलता है। उडिया कहानी दुःख अपरिमित(डाॅ. सरोजिनी नायडू) एक अच्छी कहानी है जो आज के मनुष्य के आसपास बुनी रची गई है। समकालीन कहानी के अंतर्गत डर(डाॅ. सरजू प्रसाद) एवं प्रवासी कहानी स्तंभ के अंतर्गत एक पाती(प्रतिष्ठा शर्मा) की कहानियां नई सदी की कहानियां हैं जहां प्रस्तुतिकरण व विषय वस्तु सब कुछ नया प्रतीत होता है। सुनील गज्जानी व मुकेश पोपली की लघुकथाएं पत्रिका की ख्याति के अनुरूप हैं। डाॅ. शोभाकांत झा का ललित निबंध ‘भोग और शक्ति’ ख्यात हिंदी साहित्यकार व निबंधकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के निबंधों की याद ताज़ा कर देता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं व प्रस्तुति इंटरनेट के पाठक को बांधे रखने में सफल हैं। इस अच्छे अंक व उसके उत्कृष्ट संपादकीय के लिए संपादक व उनकी टीम बधाई की पात्र है।

गीता पर विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री की पत्रिका--गीता स्वाध्याय

पत्रिका-गीता स्वाध्याय, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. श्रीलाल, पृष्ठ-16, मूल्य-10रू.(वार्षिक-रू.100), संपर्क-गीता स्वाध्याय मण्डल, नयापुरा, सोजत नगर फोनः 02960.222404 ई मेलः Geeta_swadhyay@yahoo.com
पत्रिका में गीता पर उल्लेखनीय सामग्री का प्रकाशन किया जाता है। समीक्षित अंक में गीता के अध्याय सात में ज्ञान-विज्ञान-योग व नवमावतार-भगवान गौतम बुद्ध पठनीय व जीवन में उतारने योग्य आलेख हैं। पीपल पर भी संक्षेप में उसकी महत्ता बताते हुए पौराणिक महत्व के साथ साथ आज के संदर्भ में उपयोगिता का उल्लेख किया गया है। दण्डकारणय में दस वर्ष तथा राजकुमार उत्तर भारतीय संस्कृति की विश्व में उपयोगिता व उसके महत्व को रेखांकित करते हैं। पत्रिका का प्रयास सामाजिक सांस्कृतिक चेतना जाग्रत कर लोगों के जीवन स्तर को सुधारना है।

Thursday, October 22, 2009

विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री की पत्रिका--साहित्यांचल

पत्रिका-साहित्यांचल, अंक-जनवरी-मार्च.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-सत्यनारायण व्यास ‘मधुप’, पृष्ठ-56, मूल्य-25रू.(वार्षिक-रू.100), संपर्क-रूकमणि निवास, 16 ए, 14, बापूनगर, भीलवाड़ा 311011 राजस्थान, मो. 09460202938 ई मेलः sahityanchalbhilwara@yahoo.com
पत्रिका का स्वरूप विविधता पूर्ण व साहित्य की विभिन्न विधाओं पर आधारित है। अंक में प्रकाशित महत्वपूर्ण आलेखों में शंकरलाल काबरा, काशीलाल शर्मा, प्रभुलाल चैधरी व राजेश गोयल उल्लेखनीय है। कुछ प्रमुख कहानियां पाठक के मन पर विशेष प्रभाव डालती हैं। जिनमें प्रमुख हैं-- डाॅ. प्रमोद कुमार श्रोत्रिय, डाॅ. तारासिंह एवं इंदु गुप्ता। कविताएं भी आज के सामाजिक संदर्भो की व्याख्या करने में पूर्णतः सफल रही हैं। डाॅ. कैलाश पारिख, कमलकिशोर शर्मा, कैलाश चंद्र बोहरा एवं विजय कुलश्रेष्ठ की कविताओं में इसे महसूस किया जा सकता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं भी पठ्नीय व अनुकरणीय हैं। अच्छे अंक के लिए बधाई।

ग़ज़ल विधा पर एकाग्र एकमात्र पत्रिका--ग़ज़ल के बहाने

पत्रिका-ग़ज़ल के बहाने, अंक-तीन(जुलाई09), स्वरूप-अंकित नहीं, संपादक-डाॅ.‘दरवेश’ भारती, पृष्ठ-40, मूल्य-अंकित नहीं, संपर्क-5452, शिव मार्केट, गली नं. 06, न्यू चंद्रावल दिल्ली 110007 फोनः (011)65352060 ई मेलः ghazalkebahane.darveshbharti@gmail.com
पत्रिका ग़ज़ल के बहाने हिंदी ग़ल़लांे को विशुद्ध रूप में प्रकाशित करने के लिए प्रतिबद्ध है। इसकी रचनाओं का स्तर उर्दू साहित्य में प्रकाशित ग़ज़लों के स्तर से किसी भी तरह कम नहीं है। कुछ प्रमुख ग़ज़ल गो हैं--ज़हीर कुरेशी, विनय मिश्र, श्याम नंदन सरस्वती, चंद्रसेन विराट, आनंद परमानंद, माधव कौशिक, देवी नागरानी, द्विजेन्द्र द्विज, महेन्द्र नेह, उमाशंकर ‘अश्क’, नूर मोहम्मद नूर, घमंडीलाल अग्रवाल, चांद शर्मा व महेश अग्रवाल आदि। ग़ज़लों की प्रस्तुति व उनका संयोजन पत्रिका को उल्लेखनीय बनाता है।

Tuesday, October 20, 2009

हिंदी के विद्वान कामिल बुल्के पर अद्वितीय सामग्री--हिंदी चेतना

पत्रिका-हिंदी चेतना, अंक-जुलाई-अगस्त.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रमुख संपादक-श्याम त्रिपाठी, उप संपादक-डाॅ. सुधा ओम ढीगरा(अमरीका), डाॅ .निर्मला आदेश(कनाड़ा), पृष्ठ-60, संपर्क- hindi chetna, 6 Larksmere Court, Markhem, Ontario, L3R 3R1
फोनः (905)4757165, ई मेलः hindichetna@yahoo.ca For reading magazine online please visit--http://www.vibhom.com/ (On home page--Publication) or read also http://hindi-chetna.blogspot.com/
पत्रिका हिंदी चेतना का समीक्षित अंक डाॅ. कामिल बुल्के विशेषांक है। इस अंक की जितनी भी तारीफ की जाए कम है। क्योंकि जो कार्य भारत से प्रकाशित हिंदी साहित्य की पत्रिकाएं नहीं कर सकीं वह इस पत्रिका ने कर दिखाया है। पत्रिका की रचनाएं किसी भी तरह से कमतर नहीं है। साथ ही पत्रिका का कलेवर तथा साज सज्जा आकर्षक व सादगीपूर्ण है। यही पत्रिका की विशेषता भी है। इस अंक में डाॅ. कामिल बुल्के पर बहुत ही उपयोगी व शोधपरक सामग्री का प्रकाशन किया गया है। हिंदी व संस्कृत के ज्ञाता व कला व संस्कृति के अद्वितीय विद्वान पर डाॅ. दिनेश्वर प्रसाद का आलेख विस्तार से प्रकाश डालता है। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचिरत मानस की रचना कर भारतीय जनमानस को स्पंदित किया था। ठीक वही कार्य डाॅ. कामिल बुल्के ने रामकथा व साहित्य पर कर विदेशी जन मानस को हिंदी साहित्य से जोड़ने का सफल प्रयास किया है। डाॅ. पूर्णिमा केड़िया ने अपने आलेख में डाॅ. कामिल बुल्के की अन्य खूबियों को उद्घाटित किया है। श्रीनाथ प्रसाद द्विवेदी जी का आलेख ‘मानस मानस में जिनके राम’ विदेशों में रामकथा साहित्य पर किए गए कार्य पर प्रकाश डालता है। फलेमिश कवि गजे़ले की कविताओं का अनुवाद पढकर यह सहज ही समझा जा सकता है कि कामिल बुल्के क्यों साहित्य की ओर प्रवृत्त हुए होंगे। प्रो. हरिशंकर आदेश ने उन्हें ‘एक महान ंिहंदी प्रेमी’ के रूप में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया है। डाॅ.कामिल बुल्के का आलेख ‘एक ईसाई की आस्था-प्रेम और तुलसी भक्ति’ हर हिंदी साहित्य प्रेमी के पढ़ कर सहेजने योग्य है। हिंदी के प्रति हिंदीभाषियों के कर्तव्य की उनकी दृष्टि आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी आज से पच्चीस तीस वर्ष पूर्व थी। ‘भारतीय साहित्य और हिंदी’ आलेख उनका हिंदी के प्रति लगाव व स्नेह दर्शाता है। धर्मपाल महेन्द्र जैन का संस्मरण उनके जीवन की विशेषताओं को उजागर करने में पूर्णतः सफल रहा है। आत्माराम ने उन्हें आज के युग का तुलसीदास की संज्ञा दी है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता। डाॅ. मृदुला प्रसाद ने फादर कामिल बुल्के के रामकथा संबंधी शोध आलेख में उनके रामकथा व साहित्य पर विचार को प्रधानता दी है। डाॅ. प्यारेलाल शुक्ल का आलेख ‘डाॅ. कामिल बुल्के-विश्व हिंदी सम्मेलन नागपुर में’ पठनीय व संग्रह योग्य है। पत्रिका की अन्य रचनाएं व समाचार तथा पत्र आकर्षक व सहेज कर रखने योग्य हैं। पत्रिका के संपादक श्री श्याम त्रिपाठी का कथन, ‘यह अंक विश्व के लिए एक अद्भुत उपहार होगा, विशेषकर उन हिंदी साहित्यकारों के लिए जो भारत से सुदूर विदेशों की धरती पर बसे हुए हैं।’ डाॅ. कामिल बुल्के के प्रति उनकी अगाध श्रृद्धा को दर्शाता है। एक अच्छे साफ सुथरे अंक के लिए हार्दिक बधाई।

Friday, October 16, 2009

विविधतापूर्ण साहित्य की परिक्रमा

पत्रिका-साहित्य परिक्रमा, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रबंध संपादक-जीतसिंह जीत, संपादक-मुरारीलाल गुप्त ‘गीतेश’, पृष्ठ-64, मूल्य-15रू.(वार्षिक-60रू.), संपर्क-अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास, राष्ट्रोत्थान भवन, माधव महाविद्यालय के सामने, नई सड़क ग्वालियर म.प्र., फोनः(0751) 2422942
साहित्य परिक्रम के समीक्षित अंक 35 की रचनाएं देश के विभिन्न भागों से भिन्न संस्कृति को अपने आप में समेटे हुए है। चिंतनधारा के अंतर्गत प्रकाशित आलेख आत्मशुद्धि(श्री स्वामी सत्यमित्रनंद जी) प्रत्येक व्यक्ति को पढ़कर जीवन में उतारने योग्य सामग्री प्रस्तुत करता है। मानव जीवन में आध्यात्मिक चेतना(कैलाश त्रिपाठी) एवं हिंदी ग़ज़ल की भाषा(उदयभानु हंस) विषयवस्तु के विस्तार में जाकर अमूल्य जानकारी प्रदान करते हैं। आलेख ‘साहित्य में बाज़ारवाद’(अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव) नव साहित्यकारों के साथ साथ साहित्य के जानकारों के लिए भी संग्रह योग्य है। लक्ष्मीपुत्र भामाशाह की राष्ट्रभक्ति(लक्ष्मण सिंह सेनी) विशेष रूप से आकर्षित करता है। बेसगरहल्ली रामण्णा का आलेख आओ प्रभा करूणामयी तथा लीला वान्दिवडेकर का यात्रा वृतांत गोवा की समाज संस्कृति और प्राकृतिक छटा पाठक को आदि से अंत तक बांधे रखता है। कहानियों में सलाम आजाद, प्रवीण आर्य, द्वारिकालाल गुप्त, कुमुद कुमार एवं राकेश सिंह सिसौदिया कथ्य के साथ अच्छी विषयवस्तु प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। अशोक गौतम का व्यंग्य अंधेर नगरी के पार्ट वन की कहानी को सच्चे अर्थो में विस्तार दे पाया है। राद्यवेन्द्र तिवारी, अनुपमा चैहान, कमल किशोर, कीर्तिवर्धन, कुमार शर्मा ‘अनिल’, सूर्यकुमार पाण्डेय, कृष्ण बिहारी सहल, डाॅ. मृगेन्द्र राय, रोहित शुक्ल, कान्ता शर्मा एवं डाॅ. रमाकांत शर्मा की कविताएं पत्रिका को पूर्णता प्रदान करती है। अच्छे अंक की प्रस्तुति व विविधता के लिए श्रीधर पराड़कर जी व उनके सहयोगी के साथ साथ डाॅ. बलवंत जानी एवं श्री रामनारायण त्रिपाठी बधाई के पात्र हैं।

Thursday, October 15, 2009

हिंदी साहित्य के विकास में उल्लेखनीय योगदान

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. बि. रामसंजीवैया, गौरव संपादक-डाॅ. मनोहर भारती, पृष्ठ-48, मूल्य-5रू.(वार्षिक-50रू.), संपर्क-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद, 58 वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, राजाजी नगर, बेंगलूर, कर्नाटक, फोनः(080)23404892, ई मेलः brsmhpp@yahoo.co.in
पत्रिका के समीक्षित अंक में प्रकाशित आलेखों में अशोक कुमार शैरी, प्रो. एच.एस. नागराजस्वामी, मित्रेश कुमार गुप्त, जयरामसिंह जय, चैधरी गणपत भाई आर, धीरजभाई वणकर तथा बी. जी. पटेल ने विषय के साथ नवीनता तथा खोजपरक ढंग से उसका निष्पादन किया है। राजेन्द्र गोवर, नरेश हामिलपुरकर, वर्षा पुनवटकर तथा सविता चड्डा की कविताएं आज के संदर्भ को अपने आप में समेटे हुए हैं। अन्य रचनाओं में दिलीप भाटिया की समय प्रबंधन, देवेन्द्र कुमार मिश्रा की कहानी कच्चा प्रेम में नवीनता है। पत्रिका का हिंदी साहित्य के विकास में योगदान उल्लेखनीय है। इस पुनीत कार्य के लिए पत्रिका बधाई की पात्र है।

Wednesday, October 14, 2009

इसमें पढ़ने के लिए बहुत कुछ है

पत्रिका-समन्वय, अंक-अप्रैल.09, स्वरूप-अर्द्धवार्षिक, संपादक-सदानंद प्रसाद गुप्त, पृष्ठ-205, मूल्य-70रू.(आजीवन रू.1000), संपर्क-पारिजात 65 आई, जंगल शालिगराम, गोरखपुर 273014 उ.प्र. फोनः(0551)2284114
पत्रिका का प्रकाशन अखिल भारतीय साहित्य परिषद गोरखपुर से किया जाता है। समीक्षित अंक में कुछ महत्वपूर्ण आलेखों को प्रकाशित किया गया है। इनमे लेखकों में शामिल हैं--श्री रमेश चंद्र शाह, शत्रुध्न प्रसाद, कल्पना शाह, हरीश शर्मा, दिलशाद जीलानी, माधव प्रसाद पाण्डेय तथा सूर्यकांत प्रसाद। नित्यानंद श्रीवास्तव का विमर्श ‘ग़ज़ल की जमीन तो हिंदी ने तैयार की है’ संजोकर रखने योग्य है। देवेन्द्र आर्य, श्याम विद्यार्थी, विनय मिश्र, रामशंकर चंचल तथा जसवंत ंिसंह विरदी की कविताएं पत्रिका के कलेवर का विस्तार करती हैं। भाषांतर के अंतर्गत विपिन पवार का आलेख ‘गुजराती साहित्य और गांधी जी’ कुछ नए प्रश्न व उनके उत्तर सामने लाता है। पत्रिका की अन्य रचनाएं व समीक्षाएं नए प्रकाशनों की विस्तार से जानकारी देने में सफल रही हैं।

Tuesday, October 13, 2009

फणीश्वरनाथ रेणु और मैला आंचल--संदर्भ ‘प्रगति वार्ता’

पत्रिका-प्रगति वार्ता, अंक-जुलाई.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. रामजन्म मिश्र, संपादक-सच्चिदानंद, पृष्ठ-52, मूल्य-20रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-प्रगति भवन चैती दुर्गा स्थान, साहिबगंज, झारखण्ड फोनः(06436)222467, ई मेलः pragativarta@yahoo.co.inclick here
पत्रिका का समीक्षित अंक मैला आंचल जैसे विश्व प्रसिद्ध उपन्यास के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु जी पर एकाग्र है। पत्रिका के आलेख रेणु जी के साहित्यिक जीवन व उनके सघर्ष व तप की दास्तान बयान करते हैं। डाॅ. श्रीरंजन सूरिदेव, डाॅ. सिद्धेश्वर कश्यप, डाॅ. ओमप्रकाश सिन्हा, डाॅ. चन्द्रशेखर तिवारी, डाॅ. रामजन्म मिश्र व डाॅ. प्रभा दीक्षित के आलेख प्रमुख हैं। भोला पण्डित ‘प्रणयी’ का संस्मरण ‘क्या रेणु का व्यक्तित्व असामाजिक था?’ एक बहुत ही गंभीर अध्ययन की मांग करने वाली रचना है। अन्य रचनाओं में मंगल रामचन्द्र की कहानी ‘जीवनदान’ व डाॅ. आशा पाण्डेय की कविताएं अच्छी हंै। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं, पत्र आदि उपयोगी व पठ्नीय हैं। फणीश्वरनाथ रेणु जी पर और भी अधिक सामग्री जुटाकर उसे विस्तार से प्रकाशित किया जाता तो पाठकों के अधिक हित में होता फिर भी सराहनीय प्रयास के लिए बधाई।

Monday, October 12, 2009

साहित्यकारों के लिए ‘प्रेरणा-अंशु’

पत्रिका-प्रेरणा अंशु, अंक-अगस्त।09, स्वरूप-मासिक, संपादक-प्रताप सिंह, प्रबंध संपादक-कौशल पंत, पृष्ठ-34, मूल्य-10रू।(वार्षिक100रू।), संपर्क-समाजोत्थान संस्थान, वार्ड नं।3, दिनेशपुर जनपद ऊधमसिंह नगर (उत्तराखण्ड) मो. 9719957008 ई मेलः prernaanshu@gmail.com
पत्रिका के समीक्षित अंक में कुछ महत्वपूर्ण व पठ्नीय रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- स्वतंत्रता प्राप्ति के 62 साल बाद(ए.पी. भारती), उत्तराखण्ड की जनआकांक्षाओं के विपरीत(कु. अनुराधा), शिक्षा का अधिकार छीनने में लगी है सरकार(प्रदीप रावत स्वामी) एवं अन्य आलेख। भारतीय नारी दशा और दिशा आलेख में डाॅ. संजय सिंह ने इसे समाप्त करने में शीघ्रता की है आलेख को और अधिक विस्तार दिया जाना चाहिए था। कहानी में खिलौना(रमेश मनोहरा) छोटी होते हुए भी लाचार वेवश स्त्री की व्यथा व्यक्त करने में सफल रही है। सोनिका मिश्र, कमलेश जोशी ‘कमल’, कैलाश चंदौला व बी.पी. दुबे की कविताएं अच्छी व विचारने योग्य है। पत्रिका नवोदित साहित्यकारों के लिए अपने नाम के अनुरूप प्रेरणा देने का कार्य करती दिखाई देती है।

Sunday, October 11, 2009

मनुष्य की नवविचारवादी सोच और समय के साखी

पत्रिका-समय के साखी, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. आरती, पृष्ठ-56, मूल्य-20(वार्षिक-220रू.), संपर्क-बी 308, सोनिया गाॅधी काम्पलेक्स, हजेला हास्पिटल के पास, भोपाल म.प्र. फोनः 9713035330
ई मेलः samaysakhi@gmail.com
साहित्य की समस्त साहित्यिक विधा के लिए समर्पित पत्रिका समय के साखी के समीक्षित अंक में तुलसीदास पर महत्वपूर्ण आलेख डाॅ. हरिप्रसाद दुबे ने लिखा है। इसमें नए प्रतिमानों के आधार पर तुलसी साहित्य का विश्लेषण किया गया है। बाबुल(लता अग्रवाल), पहाड़ जैसी लडकी(कुसुम भट्ट) एवं परिवर्तन(अखिलेश शुक्ल) कहानियां आधुनिक परिवेश का प्राचीन संस्कृति संबंध स्थापित करती दिखाई देती है। डाॅ. सुरेश उजाला एवं कृष्ण कुमार यादव की कविताएं मनुष्य की नव विचारवादी सोच का परिचय देती है। अशोक पोरवाल, अशो क भाटिया की लघुकथाएं व डाॅ. श्रीनिवास शुक्ल का लोक साहित्य पर लिखा गया आलेख बघेली लोक साहित्य में मानवीय मूल्य शोध ़छात्रों के लिए उपयोगी व संग्रह योग्य रचनाएं हैं। अच्छी पत्रिका के सार्थक अंक के लिए बधाई।

Friday, October 9, 2009

इसमें है व्यंग्यों का खजाना--संदर्भ साहित्य अमृत

पत्रिका-साहित्य अमृत, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी, पृष्ठ-178, मूल्य-50रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-4/19, आसिफ अली रोड़, नई दिल्ली 110002, फोन (011)23289777 ई मेलः prabhat1@vsnl.com
पत्रिका का समीक्षित अंक व्यंग्य विशेषांक है। इसमें साहित्य अमृत द्वारा आयोजित युवा हिंदी व्यंग्य प्रतियोगिता की पुरस्कृत रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। प्रमुख रचनाओं में मोटेराम जी शास्त्री(प्रेमचंद), नौकरी(श्रीरामायण चतुर्वेदी), अंधी जनता और लंगड़ा जनतंत्र(विद्यानिवास मिश्र), वकील(बालकृष्ण भट्ट), वसीयतनामा(पं.सूर्यनारायण व्यास), बेवकूफ कौन बना(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना), आप भी ओ हैं(जी.पी. श्रीवास्तव), मोर्चा अंग्रजी से(पं. गोपाल प्रसाद व्यास), किरूं लयवल हय हिंदी साहित्य(मनोहर श्याम जोशी), हिंदी साहित्य पर शोध कुछ सुझाव(रवीन्द्र नाथ त्यागी), घास छीलने का पाठ्यक्रम(शरद जोशी) मैं लेखक से प्रकाशक क्यों बना(पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’) व बनारस में पिगसन(बेढव बनारसी) की एकानेक बार पढ़ने योग्य व्यंग्यों को स्थान दिया गया है। हिंदी व्यंग्य लेखन पुरस्कार के अंतर्गत महत्वपूर्ण रचनाएं है-- कोट में टंगा आदमी(अजय अनुरागी), ‘धक्का ही है शास्वत सत्य(आशीष दशोतर), वो आए थे/दंगा उत्सव(ओम द्विवेदी), कहते हैं मुझको हवा हवाई(घनश्याम कुमार देवांश), काम की तलाश(मिथलेश कुमार राय), पत्रिका के इस संग्रह योग्य अंक में प्रकाशित प्रमुख व्यंग्यों में --जनक का धनुष(कनक टण्डन), टोटकों वाली आत्मनिर्भरता(ज्ञान चतुर्वेदी), इस हमाम में(सूर्यबाला), पौला मौसी(नरेन्द्र कोहली), खास बनाम आम(जैमिनी हरियाणवी), अर्थरस की निष्पत्ति के व्यवधान(अशोक चक्रधर), ओम गंदगीआय नमः(पे्रम जनमेजय), घर से निकलते ही(पूरन शर्मा), सपनों के डिजाइनर(हरीश नवल), सस्ती सब्जी की तलाश में सुपरमैन(आलोक पुराणिक) एवं कबीर का स्वर्ग से निकाला जाना(विनोद शंकर शुक्ल) उल्लेखनीय हैं। हिंदी साहित्य के साथ साथ अन्य भारतीय भाषा के व्यंग्यों के अनुवाद भी पढ़ने में रूचिकर लगते हैं व आम जन के शीघ्र ही समझ आने योग्य हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ भी इसके अन्य अंक के समान गरिमामय व अपनी प्रस्तुतिकरण शैली के कारण आकर्षित करते हैं। एक अच्छे सार्थक व उपयोगी अंक के लिए बधाई। आश्चर्य है कि इतने अच्छे प्रकाशन का हिंदी साहित्य जगत में उस तरह से स्वागत नहीं हुआ जिस तरह से होना चाहिए था।

Sunday, October 4, 2009

समकालीन साहित्य और आज का समाज-समकालीन अभिव्यक्ति

पत्रिका-समकालीन अभिव्यक्ति, अंक-30.31, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ-64, मूल्य-15(वार्षिक-50रू.), संपर्क-फलेट नं. 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं.07, महरौली नई दिल्ली 30(भारत) फोनः (011)26645001,
ई मेलः samkaleen999@gmail.com
पत्रिका के समीक्षित अंक में आज के सामाजिक संदर्भ से जुड़ी रचनाओं को शामिल किया गया हैै। प्रकाशित प्रमुख आलेखों में राहुल सांस्कृतायन आजमगढ़ के(गुंजेश्वरी प्रसाद), दिनकर की कविता में वैचारिक क्रांति(डी. सत्यलता) एवं क्या वृद्धावस्था अभिशाप है(विश्वमोहन तिवारी) प्रमुख हंै। कहानियों में दर्द के रिश्ते(डाॅ. महावीर सिंह), हार-जीत(अखिलेश निगम ‘अखिल’) मजबूर(डाॅ. पूरन सिंह) एवं सुबह की रोशनी(हरीश चन्दर सेठ) आज की समस्याओं को पाठक के सामने जाहिर करने में पूर्णतः सफल रही है। पत्रिका में प्रकाशित अनिल डबराल का आलेख ‘नरवर चढ़े न बेड़नी’ ने सबसे अधिक प्रभावित किया। कविताओं में इस बार वह विशेषता नहीं आ पाई जो इस पत्रिका की विशेषता है। फिर भी केवल गोस्वामी की कविताएं अच्छी बन पड़ी हैं। विवेकी राय का ललित निबंध एवं हरिशंकर राढ़ी का यात्रा वृतांत जानकारी प्रद हैं । पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ व रचनाएं भी स्तरीय व संग्रह योग्य हैं।

Saturday, October 3, 2009

आपातकाल पर एकाग्र संग्रहयोग्य अंक--साक्षात्कार

पत्रिका-साक्षात्कार, अंक-जून-जुलाई.09, स्वरूप-मासिक,सलाहकार-मनोज श्रीवास्तव, श्रीराम तिवारी, प्रधान संपादक-देवेन्द्र दीपक, संपादक-हरि भटनागर, पृष्ठ-240, मूल्य-50रू.(वार्षिक150रू.), संपर्क-साहित्य अकादेमी,मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, बाण गंगा, भोपाल 03, फोनः(0755)2554782ए 2760486, ई मेलः sahitya_academy@yahoo.com
पत्रिका का समीक्षित अंक आपातकाल पर एकाग्र है। अंक में विभिन्न साहित्यकारों, संस्कृतिविज्ञों, विद्वानों के आपातकाल में अनुभव को संग्रहित किया गया है। यह एक ऐसी घटना थी जिसने भारतीय समाज पर दूरगामी प्रभाव डाला है। इस प्रभाव को विद्वानों ने अपने अपने आलेखों में प्रगट किया है। अंक में प्रकाशित कविताओं में भी आपातकाल व उसके प्रभाव के दर्शन होते हैं। फणीश्वरनाथ रेणु, पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी जी, हंसराज रहबर, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, राजेन्द्र अनुरागी, श्रीराम वर्मा एवं रामदरश मिश्र की कविताओं में परिवर्तन की लहर का स्वर सुनाई देता है। ज्योत्सना मिलन, राॅबिन शाॅ पुष्प, बलदेव वंशी, प्रकाश वैश्य, बलवीर सिंह ‘करूण’, प्रेमशंकर रघुवंशी, राजेन्द्र मिश्र एवं सूर्यभानु गुप्त की कविताएं विषय से हटकर होते हुए भी देश के सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन व उसके दूरगामी प्रभाव को व्यक्त करती है। रमानाथ अवस्थी, श्रीकांत जोशी, रमानाथ त्रिपाठी, आशा रानी वोहरा की कविताएं पुरानी व नवीन पीढ़ी के मध्य सेतु का कार्य करती हुई दिखाई देती है। डाॅ. धनंजय वर्मा, विष्णु पण्डया, कन्हैया सिंह, शिव बरूआ, जगन सिंह आपातकाल को याद करते हुए उससे जुड़े अनुभव पाठकों के साथ बांटते हैं। पत्रिका का प्रमुख आकर्षण मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री माननीय श्री शिवराज सिंह चैहान व कप्तान सिंह सोलंकी के आलेख हैं। इन दोनों आलेखों में देश के अंदर परिवर्तन की तड़प व उसकी पीड़ा दिखाई देती है। श्री रामभुवन सिंह कुशवाह, घनश्याम सक्सेना, संतोष कुमार वर्मा के संस्मरण आलेखों में एक नई आज़़ादी का स्वर सुनाई पड़ता है। अरूण कुमार भगत, उदयप्रताप सिंह, प्रियंवद एवं कृष्णदत्त पालीवाल के आलेख सामाजिक चेतना के प्रश्नों को बड़ी सिद्दत के साथ उठाते हुए प्रतीत होते हैं। वल्लभ सिद्धार्थ एवं रमेश शिवप्रसाद की कहानियों में भी शिल्प का बुनाव आपातकाल के ईर्दगिर्द किया गया है। शैवाल सत्यार्थी का महाकवि हरिवंश राय बच्चन से पत्राचार पाठक को आपातकाल के बारे में बच्चन जी की सोच व उनके वैचारिक दृष्टिकोण से अवगत कराता है। पत्रिका का आपातकाल पर एकाग्र अंक संग्रह योग्य व जानकारीप्रद है।