Monday, September 28, 2009

‘भारतीय भाषाओं के संकट व उस पर पड़ने वाले बाज़ारवादी प्रभाव-संदर्भ अक्षरा(संपादकीय)

पत्रिका-अक्षरा, अंक-सितम्बर-अक्टूबर.09, स्वरूप-द्वैमासिक, प्रधान संपादक-कैलाश चंद्र पंत, प्रबंध संपादक-सुुशील कुमार केडिया, संपादक-डाॅ. सुनीता खत्री, पृष्ठ-120, मूल्य-20रू.(वार्षिक120रू.), संपर्क-म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन, श्यामला हिल्स, भोपाल 462002 म.प्र.(भारत), फोन(0755)2661087, 2738612
पत्रिका के समीक्षित अंक की सामग्री देश विदेश के साहित्यिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की सामग्री अपने कलेवर में समेटे हुए है। ख्यात आलोचक रमेश चंद्र शाह ने हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक चेतना पर बहुत ही उपयोगी पठनीय आलेख लिखा है। पत्रिका में प्रकाशित कुछ प्रमुख आलेखों में अंबिकादत्त शर्मा, सूर्यप्रसाद दीक्षित, कैलाश चंद्र जायसवाल, सुरेन्द्र वर्मा, नवीन चतुर्वेदी एवं राजेन्द्र गौतम के आलेख शामिल किए जा सकते हैं। नर्मदा प्रसाद सिसोदिया, विजय कुमार उपाध्याय एवं सरमद ख़्याम ने अपनी रचनाओं में सांस्कृतिक संदर्भ के साथ साथ हमारी सामाजिक मान्यताओं व परंपराओं को भी प्रमुख रूप से स्थान दिया है। सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘वे’ रवानगी युक्त बहुत ही आकर्षक कहानी बन पड़ी है। निरूपम की कहानी ‘कटा हुआ पेड़’ आज की जरूरतों पर विचार करती हुई रचना है। नीरज कुमार, सुरेन्द्र भटनागर, विद्या गुप्ता एवं प्रभा मजूमदार की कविताएं उल्लेखनीय हैं। कुमार रवीन्द्र के गीत व अशोक ‘अंजुम’ के दोहे पत्रिका की पठनीयता में वृद्धि करने में सफल रहे हैं। उर्दू कहानी ‘दूसरी मौत’(मूल लेखकःइफ्तख़ार नसीम) का अनुवाद केवल गोस्वामी द्वारा कुछ जटिल हो गया है जिससे रचना की सरसता में कमी आई है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र स्तंभ आदि भी इसे परिपूर्णता प्रदान करते हैं। ‘भारतीय भाषाओं के संकट व उस पर पड़ने वाले बाज़ारवादी प्रभाव पर कैलाश चंद्र पंत का संपादकीय विचारणीय है तथा गंभीरतापूर्वक सोचने विचारने के लिए मज़बूर करता है। एक और अच्छे अंक के लिए बधाई।

साहित्य की जानकारी से युक्त पत्रिका शुभ तारिका

पत्रिका-शुभ तारिका, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-उर्मि कृष्ण, पृष्ठ-30, मूल्य-12रू.(वार्षिक 120रू.), संपर्क-कृष्णदीप, ए,47, शास्त्री कालोनी, अंबाला छावनी 133001 हरियाणा(भारत), फोन-(0171)2631068, ई मेलः urmi.klm@gmail.com
कहानी लेखन महाविद्यालय अंबाला के इस मुख पत्र में हमेशा की तरह अच्छी रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। लघुकथाओं में राजकमल सक्सेना, प्रमीला गुप्ता, रश्मि बड़थ्वाल, अरूण कुमार जैन, डाॅ. पूरन सिंह एवं नरेश कुमार गौड़ की रचनाएं आज के समय की लघुकथाएं हैं। वीरेन्द्र राणावत, किशोर जैन, धर्मपाल साहिल एवं आशा शैली की कविता में नयापन दिखाई देता है। अरविंद कुवंर की कहानी तथा उमा प्रसाद वर्मा का व्यंग्य ठीक ठाक हैं। अन्य स्थायी स्तंभ, पत्र, समाचार तथा समीक्षाएं भी जानकारीप्रद हैं।

Sunday, September 27, 2009

ग़ज़ल प्रधान पत्रिका-क़ाफ़िया

पत्रिका-क़ाफ़िया, अंक-04, स्वरूप-अनियतकालीन, प्रबंध संपादक-फ़कीरचंद जलंधरी, प्रधान संपादक-मधुसूदन, पृष्ठ-48, मूल्य-अंकित नहीं, संपर्क-5 रमेश कालोनी जलंधर पंजाब
विशुद्ध रूप से ग़ज़लांे पर एकाग्र इस पत्रिका के समीक्षित अंक में नूर मोहम्मद नूर के जीवन व साहित् य पर विशेष सामग्री का समावेश किया गया है। इसके अतिरिक्त रामदरश मिश्र, उदय भानू हंस, राजेन्द्र तिवारी, अशोक रावत, महेन्द्र हुमा, कुमार रवीन्द्र, शिवा कनाटे, अखिलेश तिवारी, शकूर अनवर, आज़ाद कानपुरी, संजीवन मयंक, समलम अंसारी ‘असर’, अजया राजावत ‘प्रीतम’ की कुछ चुनी हुई ग़ज़लें प्रकाशित की गई हैं। पत्रिका ग़ज़ल प्रधान पत्रिका में अपना प्रमुख स्थान रखती है।

‘हिंदी की कठिनाई का ढिंढोरा पीटना फैशन हो गया है’- संदर्भ संपादकीय भाषा स्पंदन

पत्रिका-भाषा स्पंदन, अंक-17, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. सरगु कृष्णमूर्ति, संपादक(मानद)-डाॅ. मंगल प्रसाद, पृष्ठ-52, मूल्य-10रू.(वार्षिक 100रू.), संपर्क-कर्नाटक हिंदी अकादमी, विनायका, 127, एमआईजी/केएचबी, 5वां ब्लाक, कोरमंगला, बेंगलूरू, 560095, फोन 9886241853, ईमेलः karnatakahindiacademy@yahoo.com
पत्रिका के समीक्षित अंक मंे हिंदी भाषा की तकनीकि पर कुछ उपयोगी आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- यंत्र अनुवाद की समस्या और संभावना(श्रीनारायण समीर), हिंदी की विपन्नता(जगदीश यादव), राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए(अशोक शेरी) एवं लुप्त होते जा रहे शब्द प्रमुख हैं। सुषमा मुनीन्द्र व अखिलेश शुक्ल की कहानियां समकालीन व प्रभावशाली हैं। भानुदत्त त्रिपाठी ‘मधुरेश’, ज्ञानेन्द्र साज, शैल सक्सेना, प्रदीप कुलकर्णी की कविताएं पाठक पर अच्छा प्रभाव छोड़ती हैं। गीत-ग़ज़लों में निर्मल चंद्र निर्मल, कमल किशोर भावुक, अशोक अंजुम, ईश्वरचन्द्र मिश्र ने अच्छी तरह से विषय का निर्वाहन किया है। जय प्रकाश, आर.के. शर्मा एवं पंकज शर्मा के आलेख वर्तमान विषयों पर अच्छी तरह से प्रकाश डालते हैं। दक्षिण भारत से प्रकाशित पत्रिका भाषा स्पंदन की सामग्री तथा प्रस्तुतिकरण उत्कृष्ट है। अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई।

Friday, September 25, 2009

साहित्य एवं कलाओं पर विशेष सामग्री युक्त पत्रिका पूर्वग्रह

पत्रिका-पूर्वग्रह, अंक-जुलाई-सितम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय, पृष्ठ-126, मूल्य-30रू.(वार्षिक 100रू.), संपर्क-भारत भवन न्यास, जे. स्वामीनाथन मार्ग, श्यामला हिल्स, भोपाल, म.प्र. ph.(0755) 2660239, 2661398
email bharatbhavantrust@yahoo.co.in, bharatbhavantrust@gmail.com
पूर्वग्रह का अंक 126 अपने पूर्ववर्ती अंकों के समान उपयोगी, संग्रहयोग्य सामग्री से परिपूर्ण है। अंक में ख्यात रंगकर्मी तथा भारतीय नाट्यजगत की विशेषताओं से विश्व भर को परिचित कराने वाली विभूति स्व. हबीब तनवीर पर विशिष्ठ आलेख सम्मिलित किए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं- अशोक वाजपेयी जी का आलेख, शाहिद अनवर की निजता का संवाद, विनय उपाध्याय की बातचीत प्रमुख हैं। हिंद स्वराज्य एवं गाॅधीवादी साहित्य पर एकाग्र रचनाओं में नरेश मेहता, धर्मपाल एवं गिरिराज किशोर जी ने अपनी बात रखते हुए आज के संदर्भो पर भी गंभीरतापूर्वक विचार किया है। प्रेमरंजन अनिमेष की प्रकाशित कविताओं में अनानास एवं सपने में कविता विशिष्ट रचनाएं हैं। इनमें वाद-विवाद-प्रतिवाद की अपेक्षा समय से संवाद करने का प्रयास सफलतापूर्वक किया गया है। मंजरी सिन्हा ने गोपाल वेणु जी से बातचीत में नृत्य की बारीकियों की चर्चा के साथ साथ केरल की लुप्त हो रही कलाओं के संरक्षण के लिए किए गए प्रयास पर भी चर्चा की है। विनोद भारद्वाज ने प्रख्यात कलाकार फ्रांसिस न्यूटन सूजा पर अपने आलेख में उनके सृजन के साथ साथ उनकी उदारता एवं स्वभावगत विशेषताओं का उल्लेख किया है। इस आलेख को और भी विस्तारपूर्वक लिखा जाना चाहिए था। इतने भर से एक ख्यात कलाकार का विश्लेषण संभव नहीं है। पीयूष दइया का लोक कलाओं एवं कलाकारों पर आलेख राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को समझने का अवसर प्रदान करता है। इसके अतिरिक्त शंकर शरण का समीक्षालेख ‘साहित्य आलोचना और समाज’, चन्द्रकला त्रिपाठी की कलाडायरी ‘जिंदगी एक बाह हरा रंग’ एवं नवनीता देवसेन का विश्लेषण संग्रह योग्य पठ्नीय आलेख हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ के साथ साथ संपादक डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय जी का संपादकीय भी विचारणीय है तथा विस्तारित पुर्नविश्लेषण की मांग करता है। क्योंकि स्व. विष्णु प्रभाकर ने तो बहुत कुछ लिखा पर उनपर अभी तक बहुत अधिक काम नहीं हुआ है। हबीब तनवीर से तो पाठक भलीभांति परिचित है पर शायद वह बादल सरकार से परिचित न हो। संपादकीय में श्रोत्रिय जी ने उनके परिचय सफलतापूर्वक कराया है। पूर्वग्रह के एक और उपयोगी संग्रह योग्य व पठ्नीय अंक के लिए बधाई।

Thursday, September 24, 2009

‘मैं जब खुश होता हूं तो पंजाब मेल हो जाता हूं’--संदर्भ(वागर्थ..विनय दुबे)

पत्रिका-वागर्थ, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. विजय बहादुर सिंह, प्रबंध संपादक-कुसुम खेमानी, पृष्ठ-138, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), संपर्क-भारतीय भाषा परिषद्, 36ए, शेक्सपियर सरणि, कोलकाता 700017 (भारत) फोन(033) 22817476 ई मेल: bbparishad@yahoo.co.in
डाॅ. विजय बहादुर सिंह के संपादन में पत्रिका वागर्थ की सामग्री में भी विविधता आ गई है। यह इसके सितम्बर 09 अंक से जाहिर होता है। अंक मंें आचार्य नंददुलारे वाजपेयी जी का आलोचना लेख प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। आलेख आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना इसके आलोचना त्रैमासिक में प्रकाशन समय सन 1954 में था। अरूण माहेश्वरी ने स्व. प्रभा खेतान पर अपने संस्मरण में उनके साहित्यिक अवदान का विस्तार से उल्लेख किया है। राखी राय हल्धर, कांतिकुमार जैन एवं मैत्रेयी पुष्पा के आलेख पढकर पाठक एक नये हिंदी साहित्यिक संसार में विचरण करता हुआ अनुभव करता है। स्मरण खण्ड़ के अतर्गत नंददुलारे वाजपेयी के पत्र कवि निराला, जयशंकर प्रसाद, रामविलास शर्मा के नाम, वाचस्पति पाठक के पत्रांश कवि प्रसाद के नाम एवं रामविलास शर्मा का आलेख ‘छायावाद के समर्थ आलोचक नंददुलारे वाजपेयी’ ऐसी रचनाएं हैं जिन्हें हर गंभीर पाठक सहेज कर रखना चाहेगा। हरिओम राजौरिया एवं प्रदीप जिलवाने की कविताएं नए संदर्भो से बंधी हुई तथा कलात्मक हैं। पत्रिका के इस अंक का विशेष आकर्षण है आम जन कवि विनय दुबे पर एकाग्र भाग। इस भाग में विनय दुबे की प्रख्यात कविताएं प्रमुखता से प्रकाशित की गईं हैं। उन्हें बड़ी सिद्दत के साथ वरिष्ठ कवि राजेश जोशी,ख्यात आलोचक रमेश चंद्र शाह, संपादक आलोचक कवि डाॅ. विजय बहादुर सिंह ने याद किया है। कर्मेन्दु शिशिर, नरेन्द्र जैन के पत्र के रूप में लिखे गए आलेख उनके जीवन के बहुमूल्य पहलुओं को सामने लाते हैं। राजीव श्रीवास्तव का आलेख, जसवीर चावला की लघुकथाएं, मौलाना हारून ‘अना’ कासिमी की ग़ज़लें, सफलता सरोज की टिप्पणी तथा सुरेश गर्ग की व्यंग्य कथा पत्रिका की विविधता तथा विस्तार का आभास कराती है। अन्य स्थायी स्तंभ, पत्र, साहित्यिक समाचार, समीक्षाएं भी उत्कृष्ट व ज्ञानवर्धक हैं। एक ओर अच्छे अंक के लिए बधाई।

Wednesday, September 23, 2009

कथाकार संजीव जी पर बेजोड़ साहित्यिक सामग्री--संदर्भ ‘पाखी’

पत्रिका-पाखी, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-अपूर्व जोशी, पृष्ठ-188, मूल्य-40रू.(वार्षिक 240रू.), संपर्क-इंडीपेन्डेंट मीड़िया इििशएटिव सोसायटी, बी-107, सेक्टर 63, नोएडा 201303 उ.प्र.(भारत) फोन (0120)4070300, 4070398 ई मेल: pakhi@pakhi.in, pakhi@thesundaupost.in
पाखी का समीक्षित अंक वरिष्ठ कथाकार संजीव पर एकाग्र है। अंक में उनसे संबंधित बहुत ही उपयोगी व संग्रह योग्य सामग्री प्रकाशित की गई है। पत्रिका में प्रकाशति कहानियों में सभी कहानियां संजीव जी की प्रतिनिधि रचनाएं हैं। कहानी अपराध, आरोहण व मानपत्र तो हिंदी ही भारतीय भाषाओं में अब तक प्रकाशित कहानियों में सर्वश्रेष्ठ है। पत्रिका के पाठक कथाकार-उपन्यासकार संजीव के कवि रूप से रूबरू होगें। उनकी कविताओं में शहीदों के नाम, गाडीवान व रेगिस्तान पठ्नीय व विचारणीय है। पत्र एवं संस्मरण खण्ड में राजेन्द्र यादव, स्वयंप्रकाश, शिवमूर्ति, संजय, प्रेमपाल शर्मा, भोला सिंह, शिवकुमार यादव एवं रामप्यारे प्र्रजापति के स्मृति चित्र संजीव को नजदीक से जानने का अवसर प्रदान करते हैं। जब वरिष्ठ आलोचक साहित्यकार डाॅ. नामवर सिंह कहते हैं कि, ‘मेरी राय में संजीव का मूल्यांकन करना भारी काम है।’ तब संजीव की साहित्यिक गंभीरता का पता चलता है। संजीव जी के सृजन तथा लेखन यात्रा पर डाॅ. नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, विश्वनाथ त्रिपाठी, रोहिणी अग्रवाल, गोपेश्वर सिंह, सुरेन्द्र स्निग्ध, दीनबंधु तिवारी, भालचंद्र जोशी, सत्यकाम, रामविनय शर्मा, रविशंकर सिंह, राकेश बिहारी, रमेश प्रजापति एवं अशोक मिश्र ने आलेख लिखे हैं। राकेश श्रीवास्तव, पे्रम भारद्वाज एवं गुंजन कुमार ने संजीव की साहित्यिक यात्रा के साथ साथ एक सामान्य शासकीय कर्मचारी की हैसियत से भी देखा है तथा उस साधारण में छिपे असाधारण कथाकार को ढूंढने का सफल प्रयास किया है। पाखी के संपादक अपूर्व जोशी से साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकार किया है, ‘लेखक को अपनी सीमा पता होनी चाहिए।’ यह कथन एक कथाकार के महान होने का संकेत देता है। मेरे ख्याल से संजीव से भी अधिक उर्जावान, क्षमतावान कथाकार उनकी पत्नी श्रीमती प्रभावती देवी है जिन्होंने जीवन के यथार्थ को बड़ी ही बेबाकी से अपने साक्षात्कार में स्पष्ट किया है। पत्रिका पाखी के इस अंक को प्रत्येक उस साहित्यकार को पढ़ना चाहिए जो कथा लेखन करना चाहता है। उत्कृष्ट, साफ सुथरी साज सज्जा युक्त अंक के लिए संपादक व उनकी टीम बधाई की पात्र है।

Tuesday, September 22, 2009

हिंदी साहित्य की प्रमुख पत्रिका--समावर्तन

पत्रिका-समावर्तन, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-रमेश दवे, संपादक-निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ-96, मूल्य-20रू.(वार्षिक 200रू.), संपर्क-माधवी, 129 दशहरा मैदान, उज्जैन म.प्र.(भारत) फोन (0734)2524457, 2520263 ई मेल: samavartan@yahoo.com
समावर्तन ने जिस शीघ्रता से साहित्यिक पत्रिकाओं के शिखर पर अपने आप को स्थापित किया है वह स्वागत योग्य है। यह सब प्रधान संपादक रमेश दवे व उनके सहयोगियों के बिना संभव नहीं था। पत्रिका अंतर्राष्ट्रीय मानकों व मानदण्ड़ों के अनुरूप व स्तरीय है। समीक्षित अंक में ख्यात कवि कंुवर नारायण पर महत्वपूर्ण आलेख के साथ साथ जानकारी दी गई है। प्रताप सिंह सोढ़ी, सुरंजन एवं विजय की रचनाएं पठनीय व संग्रह के योग्य है। वरिष्ठ साहित्यकार व संपादक कन्हैया लाल नंदन पर विशेष सामग्री इस पत्रिका का दूसरा प्रमुा आकर्षण है। डाॅ. प्रभात कुमार भट्टाचार्य, कृष्णदत्त पालीवाल एवं कमल कुमार ने अपने आलेखों में विशेषज्ञता का परिचय दिया है। मोहम्मद रफीक खान, विष्णुदत्त नागर, जयकुमार जलज, मधुसूदन शाहा एवं सरोज कुमार की रचनाएं उल्लेखनीय बन पड़ी हैं। हमेशा की तरह श्रीराम दवे ने पत्रिकाओं की समीक्षा के माध्यम से आम जन को इन पत्रिकाओं से अपनी विशिष्ठ शैली में परिचय कराया है।

Monday, September 21, 2009

आम जन की सहज सुलभ पत्रिका--परती पलार

पत्रिका-परती पलार, अंक-जुलाई-सितम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-नमिता सिंह, पृष्ठ-80, मूल्य-20रू.(वार्षिक 80रू.), संपर्क-परती पलार, आश्रम रोड़, वार्ड़ नं. 04, अररिया 854311 फोन(06455)222610
साहित्यिक शोधपरक त्रैमासिकी परती पलार का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण रचनाओं से युक्त है। इसमें जसवंत सिंह विरदी, सुशांत सुप्रिय, राजेन्द्र परदेसी, व डाॅ. सुरेन्द्र मंथन की प्रभावशाली कहानियां प्रकाशित की गई हैं। प्रमुख आलेखों में - आत्मानुशासन का पर्व(राम बहादुर व्यथित), प्रेमचंद्र की भाषा(डाॅ. शिवनंदन कपूर), मुंशी प्रेमचंद्र का जीवन दर्शन(जे.के.एन. नाथनू) हैं। डाॅ. अर्चना नायक की ओड़िया कहानी ‘चमत्कार’ का हिंदी अनुवाद बहुत ही सरस व सरल है। लघुकथाओं में भावना वर्मा, सुलोचना शर्मा ‘लोचन’, आनंद दीवान, श्याम सखा श्याम प्रभावित करते हैं। विलेश चतुर्वेदी, डाू. राम बहादुर व्यथित, अंकुश्री, सुधीर कुशवाह, राजीव जैन, रामचरण यादव, हरिकिशोर चतुर्वेदी, भगवान दास जैन, प्रवीण काम्बोज, डाॅ. अनिल कुमार, अनिरूद्ध सिन्हा, ओमप्रकाश कादयान एवं नलिनीकांत की कविताएं पत्रिका के स्तर के अनुरूप हैं। पुस्तक समीक्षा, यात्रा विवरण, पत्र, साहित्यिक समाचार आदि भी पठ्नीय व हिंदी साहित्य को आम ज न तक पहुुंचाने मंे सफल रहे हैं।

Sunday, September 20, 2009

आलेख प्रधान पत्रिका-हिमप्रस्थ

पत्रिका-हिमप्रस्थ, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ-56, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.), संपर्क-हि.प्र. प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला 5(भारत) ई मेल: himprasthahp@gmail.com
आलेख प्रधान इस पत्रिका के समीक्षित अंक में बहुत ही उपयोगी व संग्रह योग्य आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख है- राष्ट्रकवि मैथिली शरण गुप्त(डाॅ. अनिल कुमार), लोकगीतों का अमर साहित्यकार देवेन्द्र सत्यार्थी(शशिभूषण शलभ), आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की निबंध शैली(डाॅ. ओमप्रकाश सारस्वत) एवं लोकमान्य होने का अर्थ(प्रो. चमनलाल गुप्त) विजय रानी बंसल की कहानी ‘आखिर कब तक’ एक अच्छी व विचारणीय कहानी है। लघुकथाओं में पंकज शर्मा व शबनम शर्मा प्रभावित करते हैं। डाॅ.प्रदीप शर्मा, जयचंद, आदर्श एवं डाॅ. प्यार चंद्र की कविताएं अच्छी रचनाएं हैं। डाॅ. वंदना वीथिका का व्यंग्य कुछ अधिक अनावश्यक विस्तार पा गया है। अन्य स्थायी स्तंभ व समीक्षाएं पत्र आदि पत्रिका की सार्थकता को बढ़ाते हैं।
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Friday, September 18, 2009

एक सुंदर संतुलित अंक- संदर्भ सृजन पथ 07

पत्रिका-सृजन पथ, अंक-07 वर्ष.09, स्वरूप-अनियतकालीन, संपादक-रंजना श्रीवास्तव, पृष्ठ-74, मूल्य-25रू.(वार्षिक 100रू.), संपर्क-श्री पल्ली लेन नं. 02, पो. आॅ. सिलीगुड़ी बाजार, सिलीगुड़ी(प. बंगाल) मो. 09933946886 ई मेलः ranjananishant@yahoo.co.in

समीक्षित पत्रिका सृजनपथ का अंक कविता अंक है। पत्रिका की रचनाएं प्रभावशाली व पठ्नीयता से भरपूर है। गुलज़ार की खुबसूरत नज़्में मन को छू लेती है। मैत्रेयी के लेखन पर रंजना श्रीवास्तव का आलेख उनके लेखन की परिपूर्णता को उजागर करता है। इमरोज का रचना विमर्श तथा डाॅ. परमानंद श्रीवास्तव का आलेख पत्रिका की गंभीर व विचारणीय रचनाएं हैं। लोक साहित्य के अंतर्गत जिस बेबाकी से विद्या सिन्हा ने अपने आलेख ‘अंगिका लोक गीत मंे व्यक्त किया है वह पढ़ने योग्य है। नरेन्द्र पुण्डरीक तथा योगेन्द्र कृष्णा के आलेख भी सहेज कर रखने योग्य हैं। अनामिका, कमलेश्वर साहू, नीलोत्पल, मोहन कुमार डहेरिया, रमेश प्रजापति तथा प्रत्यक्षा की कविताएं समकालीन विचारों को व्यक्त करती हैं। जया जादवानी का आत्म कथ्य किसी कथा से कम नहीं है। कंचन शर्मा, मुनव्वर राणा, इन्दु श्रीवास्तव, अशफ़ाक अहमद सिद्दकी किसी परिचय के मोहताज नहीं है। पत्रिका के संुदर संतुलित तथा उपयोगी अंक के लिए बधाई।

कुछ नया करने की आवश्यकता--संदर्भ कथाबिंब

पत्रिका-कथा बिंब, अंक-अप्रैल-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. माधव सक्सेना, मंजुश्री पृष्ठ-48, मूल्य-15रू.(वार्षिक 50रू.), संपर्क-ए-10 बसेरा आॅफ दिन क्वारी रोड़, देवनार, मंुबई 400088महाराष्ट्र(भारत), e mail kathabimb@yahoo.com, website http://www.kathabimb.com/
पत्रिका के समीक्षित अंक में समसामयिक विषयों पर सारगर्भित कहानियां प्रकाशित की गई है। इनमें प्रमुख हैै- कैफ़ियत(नूर मोहम्मद ‘नूर’), इच्छा मृत्यु(डाॅ. प्रदीप अग्रवाल) एवं स्लम डाॅग(पी.डी. वाजपेयी) पत्रिका लघुकथाओं का प्रकाशन भी प्रमुखता से करती है। दो बूढ़े(कुशेश्वर) एवं देशभक्षी(ज्योति जैन) की लघुकथाएं अच्छा संदेश देती हैं। कविताओं ग़ज़लों में बेहोशी(डाॅ. तिलकराज गोस्वामी), कोशिश(डाॅ.के.बी.श्रीवास्तव) एवं कृष्ण सुकुमार तथा हस्तीमल हस्ती की ग़ज़लें कुछ कमियों के बावजूद पठ्नीय हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभों की सामग्री भी पाठकों के लिए उपयोगी है। लेकिन पत्रिका को परंपरागत कलेवर से हटकर कुछ नया करना चाहए। जिसकी आज के समय में अत्यधिक आवश्यकता हैै।

Thursday, September 17, 2009

सत् साहित्यिक शोध-मासिकी - साहित्य सागर

पत्रिका-साहित्य सागर, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ-52, मूल्य-20रू.(वार्षिक 2500रू.), संपर्क-161-बी, शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल 462043 म.प्र.(भारत) फोन 0755 4260116
पत्रिका का समीक्षित अंक ख्यात रचनाकार श्री काशीनाथ जोशी पर एकाग्र है। उन पर प्रकाश वैश्य, धृतिवर्धन गुप्त, मधुसूदन गर्ग एवं संपादक कमलकांत सक्सेना ने आलेख लिखे हैं। जोशी जी की साहित्यिक यात्रा कंटक पूर्ण व संघर्षपूण रही है जिसे उन्होंने अपने आत्मकथ्य में प्रगट किया है। पत्रिका की अन्य रचनाओं में शरद नारायण खरे, गणेशदत्त सारस्वत एवं प्रदीप कुमार मिश्र ने प्रभावित किया। अन्य स्थायी स्तंभ व रचनाएं एवं समीक्षाएं भी आकर्षक हैं।

Wednesday, September 16, 2009

दक्षिण से प्रकाशित एक महत्वपूर्ण पत्रिका

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. बि. रामसंजीवैया, पृष्ठ-48, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.), संपर्क-मैसरू हिंदी प्रचार परिषद, 58, वेस्ट आॅफ कोर्ट रोड़, राजानी नगर, बेंगलूर 560-010 फैक्स (080) 23404892 email-- brsmhpp@yahoo.co.in

कर्नाटक (भारत) पत्रिका का समीक्षित अंक पठ्नीय साहित्यिक सामग्री से भरपूर है। इसमें दक्षिण एवं उत्तर का सुंदर साहित्यिक समन्वय दिखाई देता है। प्रकाशित प्रमुख आलेखों में ‘हिंदी का बढ़ता प्रभाव एवं हमारा दायित्व’(आचार्य भगवत दुबे), ‘हिंदी भाषा का वर्तमान परिदृष्य’(डाॅ. अमर सिंह बधान), भारतीय भाषाओं के प्रति महात्मा गाॅधी के विचार(प्रभुलाल चैधरी) एवं ‘एस. भारती पत्रकार के रूप में’(डाॅ. एम. शेषन) प्रमुख हैं। हबीव तनवीर एवं श्रवण कुमार की कहानियों पर क्रमशः सत्यम बारेट एवं एस.पी. केवल के आलेख में नया पन दिखाई देता है। डाॅ. मेहता नगेन्द्र, टी. जी. प्रभाशंकर ‘पे्रमी’, डाॅ. मोहन आनंद एवं अशोक कुमार शेरी की पद्य रचनाएं समयानुकूल हैं। दक्षिण से हिंदी साहित्य पर प्रकाशित इस महत्वपूर्ण पत्रिका के भविष्य के लिए ढेरों शुभकामनाएं।

Tuesday, September 15, 2009

नयी नज़र का नया नज़रिया.2-संदर्भ हंस पत्रिका

पत्रिका-हंस, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजेन्द्र यादव, पृष्ठ-96, मूल्य-25रू.(वार्षिक250रू.), संपर्क-अक्षर प्रकाशन प्रा. लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110002(भारत), फोन-(011)23270377ए 41050047, email editorhans@gmail.com
पत्रिका हंस का समीक्षित अंक आज के ख्यात रचनाकारों के नज़रिये को जाहिर करता है। अंक मंे कहानीकारों, मीड़िया कत्र्ताओं, प्रकाशकों, संपादकों आदि के विचार पूछे गये प्रश्नों के उत्तर के माध्यम से प्रकाशित किए गए हैं। शैलेन्द्र सागर, अर्चना वर्मा, ओमप्रकाश वाल्मीकि, रवीन्द्र वर्मा, अनामिका, संजीव जी के नज़रिये को प्रकाशित किया गया है। इन्होंने उपन्यास लेखन को आज की उपेक्षित विधा के रूप में दर्शाया हैं। जितने भी ख्यात कथाकार हुए हैं वे अच्छे स्थापित नाविल निग़ार भी रहे हैं। ब्लाॅग के पाठक मेरे विचारों से अवश्य ही सहमत होंगे। गोविंद सिंह एवं मधुसूदन आनंद जैसे संपादकों ने विशाल पाठक वर्ग, समकालीन साहित्य एवं राजनीति तथा समाज को लेकर उपयोगी विचार रखे हैं। अप्रवासी भारतीयों मंे उषा प्रियंवदा, तेजेन्द्र शर्मा, इला प्रसाद एवं सुनील दीपक के विचार विदेशों में हिंदी साहित्य की स्थिति पर गंभीरतापूर्वक विचार प्रगट करते हैं। अप्रवासी भारतीयों से परंपरागत एवं भारतीय साहित्य की राजनीति से हटकर कुछ ऐसे प्रश्नों का समावेश किया जाना चाहिए था जो भारत में हो रहे हिंदी साहित्य के विकास से संबंधित होते। प्रकाशकों में अशोक माहेश्वरी, अरूण माहेश्वरी, सत्यव्रत एवं महेश भारद्वाज के विचार उल्लेखनीय हैं। लेकिन पता नहीं क्यों पत्रिका इस क्षेत्र में दिल्ली से बाहर निकल नहीं सकी है। आज देश भर में हिंदी साहित्य के प्रकाशकों की संख्या हजारों मंे है। कम से कम बीस प्रकाशकों (देश भर के विभिन्न स्थानों से) से उनके विचार प्रकाशित किया जाना चाहिए था। कहानीकारों में आशुतोष भारद्वाज, तरूण भटनागर, वंदना राग, पंकज मित्र, विपिन चैधरी, अंजली काजल, प्रभात रंजन, कविता एवं मनोज कुमार पाण्डेय के विचारों को ही देश भर के कहानीकारों के विचार मान लिया गया है। वस्तुतः उपरोक्त सभी कहानीकार ‘हंस’ के होम स्टोरी राइटर ही हैं। पत्रिका में प्रकाशित कहानियों में पुष्पक विमान(अल्पना मिश्र), जड़-जमीन(अरूण यादव) तथा पता(डाॅ. स्वप्निल सुधाकर अजबे) को छोड़कर अन्य अप्रभावी व पत्रिका के स्तर के आसपास की नहीं हैं। पत्रिका का पढ़ने योग्य आलेख अतिथि संपादक अजय नावरिया का बहुत ही संतुलित तथा विचारात्मक संपादकीय है जो आज के संदर्भ व अतीत के मध्य सेतु का कार्य करता है। शीबा असलम फहमी, अजित राय एवं भारत भारद्वाज के आलेख भी पठ्नीय व पत्रिका की गरिमा के अनुरूप हैं। मेरे विचार से संपादकीय का लेखन किसी साहित्यकार को उत्तर देने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। संपादकीय तो पत्रिका प्रिज्म होता है जो पाठक की नज़र के प्रकाश को इंद्रधनुषी बना देता है। फिर भी एक अच्छे नजरिये, विचारोत्तेजक परिचर्चा के लिए बधाई।

Monday, September 7, 2009

नाट्य समाचार की पत्रिका इप्टा वार्ता

पत्रिका-इप्टा वार्ता, अंक-जनवरी.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हिमांशु राय, पृष्ठ-08, मूल्य-5रू.(वार्षिक30रू.), संपर्क-पी.ड़ी. 4 परफेक्ट एन्क्लेव, स्नेह नगर, जबलपुर 02,(भारत)
इप्टा वार्ता के इस समीक्षित अंक में संगीत नाटक अकादमी युवा पुरस्कार से सम्मानित आसिफ अली लिखित निदेशित नाटक 59 मिनिट 60 सेकेण्ड़ नाटक का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। पत्रिका के तीसरे पृष्ठ पर मंजीत बावा को याद किया गया है। अजित राय ने 11 वें रंग उत्सव का समाचार विस्तृत रूप से लिखा है जिसकी प्रस्तुति आकर्षक बन पड़ी है। राष्ट्रीय नाट्य समाचार समारोह 08 जबलपुर की गतिविधियों का समाचार इस कार्यक्रम से पाठकों को अवगत कराता है। पत्रिका समाचारों के साथ साथ देश भर में रंगकर्मियों की आवाज भी है जो निरंतर अपने प्रयास के माध्यम से अनूठी जानकारी प्रदान कर रही है। अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई।

Thursday, September 3, 2009

आप भी जुडे़ विश्व हिंदी समाचारों से

पत्रिका-विश्व हिंदी समाचार-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. (श्रीमती) विनोद बाला अरूण, संपादक-डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र, पृष्ठ-12, मूल्य-पत्रिका पर पिं्रट नहीं है। सम्पर्क- World Hindi Secretariat, Swift Lane, Forest side, Mauritius email whsmauritius@intnet.mu
माॅरिशस से प्रकाशित हिंदी की यह समाचार पत्रिका विगत 2 वर्ष से निरंतर प्रकाशित हो रही है। पत्रिका के मुखपृष्ठ पर ‘विश्व हिंदी सचिवालय’ शासी परिषद् के नए सदस्य माननीय श्री एम.एम. कृष्णा(विदेश मंत्री)एवं माननीय श्री कपिल सिब्बल(मानव संसाधन एवं विकास मत्री) का स्वागत किया गया है। इसी पृष्ठ पर डाॅ. सुधेश के रंगीन छायाचित्र के साथ विश्व के लगभग 125 देशों में हिंदी पढ़ाए जाने में सहयोग देने की अपील की गई है। पत्रिका ने बहुत ही संुदर ढंग से ख्यात कथाकार, लेखक स्व.श्री विष्णु प्रभाकर के जीवन वृत्त पर प्रकाश डाला है। पत्रिका की प्रधान संपादक डाॅ. अरूण ने भी अपने संपादकीय में प्रभाकर जी के हिंदी साहित्य में योगदान की चर्चा समग्र रूप से की है। डाॅ. मिश्र ने अपने संपादकीय में हिंदी की लघु पत्रिकाओं के योगदान पर विस्तृत रूप से विचार व्यक्त किए हैं। विश्व हिंदी समाचार के समीक्षित अंक में हिंदी संगठन पोर्ट लुईस में वलवंत सिंह नौबत सिंह की पुस्तक ‘रामबिरिछ’ व टोरंटो से प्रकाशित हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘सौभाग्य’ के लोकापर्ण को विशेष रूप से स्थान दिया गया है। पत्रिका में इनके समाचारों से प्रत्येक हिंदी प्रेमी को यह आभास होता है कि विश्व स्तर पर भी हिंदी के लिए बहुत कुछ किया जा रहा है। यह अप्रवासी भारतीयों के हिंदी प्रेम को दर्शाता है। प्रवासी हिंदी साहित्य पर लंदन के नेहरू केन्द्र में आयोजित संगोष्ठी तथा प्रख्यात कथाकार सूर्यबाला को वाग्मणि सम्मान का समाचार भी पत्रिका ने प्रकाशित किया है। पुस्तक समीक्षा खण्ड के अंतर्गत ‘अनुवाद विज्ञान की भूमिका’ पर प्रकाशित पुस्तक की समीक्षा इस पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करती है। ‘हिंद का विश्व परिदृश्य’ के अंतर्गत प्रकाशित समाचारों में विश्व हिंदी सचिवालय की महासचिव डाॅ. विनोद बाला अरूण के सम्मान में आयोजित गोष्ठी का समाचार पत्रिका के भारत प्रेम को दर्शाता है। ख्यात वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र यादव को जयजयवंती सम्मान तथा देवनागरी लेखन में एकरूपता की आवश्यकता एवं देवनागरी लिपि और सूचना प्रोद्योगिकी आलेख भी ज्ञानवर्धक तथा सूचनापरक हैं। पत्रिका के साफ संुदर आकर्षक साज-सज्जा युक्त अंक के लिए बधाई।