Friday, July 31, 2009

पे्रमचंद साहित्य पर सुन्दर आलेख युक्त पत्रिका अक्षरा

पत्रिका-अक्षरा, अंक-जुलाई-अगस्त.09, स्वरूप-द्वैमासिक, प्रधान संपादक-कैलाश चंद्र पंत, प्रबंध संपादक-सुशील कुमार केड़िया, संपादक-डाॅ. सुनीता खत्री, पृष्ठ-120, मूल्य-रू.20 (वार्षिक रू.120), संपर्क-म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन, श्यामला हिल्स, भोपाल 462.002(भारत)
पत्रिका का अंक 102 आंशिक रूप से प्रेमचंद्र पर एकाग्र है। कमल किशोर गोयनका, सामसिंह यादव, पाण्डेय शशिभूषण शीतांशु, गजानन चव्हाण तथा विद्याभूषण मिश्र के आलेख पे्रमचंद्र के साहित्य पर वर्तमान संदर्भ में पुनर्विचार करते हैं। प्रख्यात आलोचक तथा साहित्यकार रमेश चंद्र शाह ने कवि, कविता तथा कतिता के स्वरूप पर विस्तृत रूप से विचार किया है। निर्मला वर्मा का आलेख, विश्वास पाटिल का निबंध तथा ज्योत्सना मिलन का संस्मरण ऐसी रचनाएं हैं जो आजकल दूसरी साहित्यिक पत्रिकाओं में नहीं पढ़ने में आ रही है। कहानियां विशेष रूप से शुभदा मिश्र की कहानी संजीवनी तथा साबिर हुसैन की कहानी कुसुम दी अधिक प्रभावित करती है। सुनीत जैन व उमेश मेहतो की कविताएं भी आधुनिक संदर्भ तथा प्राचीन मान्यताओं के मध्य सेंतु का कार्य करती प्रतीत होती है। संतोष खरे ‘साहित्य में गुटवाद’(व्यंग्य) की तह तक नहीं पहुंच सके हैं। घनश्याम अग्रवाल, विजय बजाज तथा विकास मानव की लघुकथाएं अच्छी लगी। शेष रचनाएं, समीक्षाएं स्थायी स्तंभ तथा समाचार भी पठनीय व संग्रह योग्य हैं।

Sunday, July 26, 2009

उत्कृष्ट पत्रिका का सार्थक अंक---वागर्थ

पत्रिका-वागर्थ, अंक-जुलाई09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ-138, मूल्य-रू.20 (वार्षिक रू.200)संपर्क-भारतीय भाषा परिषद, 36 ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता 700017(भारत)
डाॅ. विजय बहादुर सिंह के संपादन में वागर्थ ने साहित्य के कुछ नए मानदण्ड स्थापित किए हैं। सबसे प्रमुख यह है कि नए तथा प्रतिभावान साहित्कारों की सार्थक तथा समाजाउपयोगी रचनाओं को पत्रिका में उन्होंने स्थान दिया है। आज भारत में वागर्थ को छोड़कर एक भी ऐसी पत्रिका नहीं है जिसका अपना लेखक वर्ग न हो। लेकिन वागर्थ में यह सब आज कहीं भी दिखाई नहीं देता है। पत्रिका के समीक्षित अंक में ख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर तथा प्रेमचंद के साहित्य पर विस्तृत रूप से विचार किया गया है। कमल किशोर गोयनका तथा रविरंजन ने अपने अपने आलेखांे में अच्छी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। प्रभात त्रिपाठी, राकेश रंजन, चित्रा सिंह, विनोद शर्मा तथा प्रेेमशंकर शुक्ल की कविताएं नएपन लिए हुए है। स्नोवा वार्नाे तथा शुभ्रा उपाध्याय ने अपनी अपनी कहानियों में वर्तमान समय की समस्याओं से जूझते हुए आम आदमी पर अपनी लेखनी के माध्यम से प्रकाश डाला है। साजिद रशीद की कहानी कटे हुए तार पढ़कर प्रेमचंद के प्रारंभिक उर्दू साहित्यिक कहानी की याद आती है। शंकर पुणतांबेकर का व्यंग्य तथा अहम फ़राज ेके आलेख सहेज कर रखने योग्य हैं। वागर्थ की ग़ज़लें सभी स्थायी स्तंभ तथा अन्य रचनाएं पठ्नीय तथा संग्रह योग्य बन पड़ी है। एक सार्थक अंक के लिए कथा चक्र परिवार की शुभकामनाएं।

Saturday, July 25, 2009

साहित्यिक हरियाली का अहसास------संदर्भ परती पलार

पत्रिका-परती पलार, अंक-अप्रैल-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-नमिता सिंह, पृष्ठ-80, संपर्क-आश्रम रोड़, वार्ड नं. 8 अररिया 854311(भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री का समावेश किया गया है। श्री कुमार ठाकुर , डाॅ. गणेश दत्त सारस्वत तथा अशोक झा के आलेख पत्रिका को प्रमुख साहित्यिक पत्रिका का दर्जा प्रदान करते हैं। अंकु श्री , कैलाश पचैरी, डाॅ. पूरन सिंह की कहानियों में नयापन तथा वर्तमान समय की प्रवृत्तियां दिखाई ती है। जर्नादन यादव, रामशंकर चंचल, रामचरण यादव की लघुकथाएं सार्थक प्रस्तुति हैं। गीत ग़ज़ल दोहे के अंतर्गत सत्यदेव आजाद, कृष्ण शंकर सोनाने, मीनाक्षी आर्या, अशोक आलोक तथा साहिल ने विशेष रूप से प्रभावित किया। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं तथा रचनाएं भी स्तरीय तथा संग्र्रह योग्य हैं।

Thursday, July 23, 2009

पंख होते तो उड़ आती रे......संदर्भ हंस

पत्रिका-हंस, अंक-जुलाई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजेन्द्र यादव, पृष्ठ-96, संपर्क-अक्षर प्रकाशन प्रा.लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज,नई दिल्ली 110002(भारत)
हंस का जुलाइ 2009 अंक बेजोड़ कहानियों का अंक है। पत्रिका की कहानियों में विशेष रूप से तुम खुश रहो हमारा ओके है(सुषमा मुनीन्द्र), वेनिला आइसक्रीम और चाकलेट सांस(अचला बंसल), कोई बात नहीं पापा(मनीषा तनेजा) अनूठी तथा पठ्नीय रचनाएं है। इन कहानियों में पत्रिका का जनचेतनात्मक स्वरूप उभरकर सामने आता है। हबीब तनवीर के समग्र पर रामशरण जोशी का स्मरण आलेख लेखक की निजता तथा सम्पर्क न होकर नाटकोें के प्रति उनका(हबीब तनवीर) जज्बा तथा नजरिया सामने आता है। इस बार की कविताओं में अरूणा राय तथा चंदन कुमार के अतिरिक्त अन्य कविताएं अप्रभावशाली हैं। पता नहीं क्यों हंस कविता के मामले में कहानियों जैसी छानबीन नहीं करता। ख्यात आलोचक तथा साहित्य मर्मज्ञ डाॅ. नामवर सिंह ग़ज़लों पर लिखा गया आलेख पढ़कर अचरज हुआ कि नामवर जी ग़ज़लों का विश्लेषण भी उतनी ही कुशलता से कर सकते हैं जितना वे कविता कहानी के आपरेशन में माहिर हैं। मुकेश कुमार ने एक बार फिर मीड़िया तथा उसकी भूमिका पर नए सिरे से विचार किया है। पत्रिका में भारत भारद्वाज जी का आलेख महादेवी सृजन पीठ तथा उससे जुड़े विवादों पर समग्र दृष्टिपात कर उससे जुड़े लोगों की भूमिका का सारगर्भित विश्लेषण करता है। पत्रिका की समीक्षाएं तथा अन्य स्थायी स्तंभ पढ़कर यही कहा जा सकता है कि ‘पंख होते तो उड़ आती रे............।’

Tuesday, July 14, 2009

भारतीय संस्कृति, कला एवं साहित्य की चेतना-- हिंदी चेतना

पत्रिका-हिंदी चेतना, अंक-अप्रैल.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रमुख संपादक-श्याम त्रिपाठी, सह संपादक-सुधा ओम ढींगरा, निर्मला आदेश, पृष्ठ-72, संपर्क- 6 Larksmere Court , Markham, Ontario, L3R 3R1
email hindichetna@yahoo.ca For reading magazine on line please visit http://www.vibhom.com/
हिंदी प्रचारिणी सभा कैनेड़ा द्वारा विगत 11 वर्ष से निरंतर प्रकाशित यह पत्रिका हिंदी की किसी भी स्थापित पत्रिका से पाठ्य सामग्री व प्रस्तुतिकरण में कम नहीं है। समीक्षित अंक में विविधतापूर्ण रचनाओं का समावेश किया गया है। महावीर शर्मा, सतपाल ख्याल, रचना श्रीवास्तव, साहिल लखनवी तथा रेणुका भटनागर की कविताएं तथा ग़ज़लंे आम भारतीय की पीड़ा व्यक्त करती हैं। महाकवि प्रो. हरिशंकर आदेश ने छब्बीस नवम्बर 2008 मुम्बई काण्ड पर बहुत ही मार्मिक उदगार व्यक्त किए हैं। पंकज जैन ने अपनी कविता में भारत की मिट्टी को याद किया है। ख्यात साहित्यकार सुभाष नीरव से सुधा ओम ढींगरा की बातचीत लेखन और साहित्य की गहराई तक जाती है। प्रेम जनमेजय के व्यंग्य ‘ज्यों ज्यों बढ़े श्याम रंग’ में वे अपनी पैनी लेखनी के माध्यम से स्पष्ट करते है कि आज उजला होन महत्वपूर्ण नहीं है उजला दिखना महत्वपूर्ण है। यह जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देता है। रूपसिहं चंदेल व ऊषा देव के संस्मरण में अंतरंगता को साहित्य से जोड़कर व्यक्त किया गया है। दिव्या माथुर तथा अखिलेश शुक्ल की कहानियां पाठकों को अवश्य ही पसंद आएंगी। इन्द्रा (धीर) वडेहरा का आलेख तथा गुलशन माथुर व डाॅ. योगेश चैधरी की समीक्षाएं बहुत ही सटीक टिप्पणी हैं। पत्रिका के साहित्यिक समाचार, पाठकों के पत्र व अन्य सूचनाएं यह सिद्ध करती हैं कि हिंदी सही मायने में अंतर्राष्ट्रीय भाषा है जिसे विश्व की प्रथम सर्वाधिक लोकप्रिय भाषा बनाने की आवश्यकता है। पत्रिका के इस सुंदर अंक के लिए संपादक तथा उनकी टीम बधाई की पात्र है।