Thursday, May 28, 2009

‘जन बल भाषा बल बने’--विश्व हिंदी समाचार

पत्रिका-विश्व हिंदी समाचार, अंक-मार्च.09, स्वरूप-त्रैमासिक, प्रधान संपादक-डाॅ.(श्रीमती)विनोद बाला अरूण, संपादक-डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद मिश्र, संपर्क-विश्व हिंदी सचिवालय, स्विफट लेन, फाॅरेस्ट साइट, माॅरीशस
माॅरीशस से प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका प्रमुख साहित्यिक समाचार पत्रिका है। समीक्षित अंक में विश्व हिंदी समारोह के आयोजन का समाचार प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। माॅरीशस के राष्ट्रीय टेलिविजन नेटवर्क पर दिखाए जाने वाले हिंदी आधारित कार्यक्रम हिंदी परिक्रमा की सराहना की गई है। इस कार्यक्रम में अमेरिका, यूरोप, एशिया, आस्ट्रेलिया तथा अफ्रीका के प्रतिनिधियों को चुना गया था। संपादिका डाॅ. विनोद बाला अरूण ने संपादकीय में कामना की है कि ‘जन बल भाषा बल बने’। वरिष्ठ कथाकार गोविंद मिश्र को साहित्य अकादेमी पुरस्कार का समाचार मार्च .09 अंक में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी दिवस के कार्यक्रम में माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय के कुलपति डाॅ. अच्युतानंद मिश्र के भाषण को पत्रिका ने हिंदी के विकास का उद्घोष माना है। आज हिंदी की स्थिति विश्व में मजबूत है। यह बात अमेरिका यूरोप सहित दुनिया के दूसरे देश भी मान रहे हैं। जापान में आयोजित होने वाले हिंदी कार्यक्रम तथा नाटक वहां हिंदी के प्रचार प्रसार की स्थिति से अवगत कराते हैं। हंगरी के प्रमुख नगर बुदापेश्त आयोजित होने वाले विश्व हिंदी दिवस के समाचार से ज्ञात होता है कि विश्व में हिंदी पर कार्य करने वाले लोगों की कमी नहीं है। विश्व हिंदी समाचार पत्रिका के विश्वव्यापी इस प्रयास को भारत में जन जन तक पहुंचाए जाने की आवश्यकता है।
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Wednesday, May 27, 2009

आम पाठक को रचना जगत की सैर कराती पत्रिका--कृतिका

पत्रिका-कृतिका, अंक-जनवरी-जुलाई.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-वीरेन्द्र सिंह यादव, पृष्ठ-155, मूल्य-60रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-1760, नया रामनगर, उरई जालौन उ.प्र.(भारत)
शोधपरक पत्रिका कृतिका विविधतापूर्ण शोधपरक आलेखों से युक्त है। पत्रिका में आलेखों को उनके विषय के आधार पर सुंदर ढंग से संयोजित किया गया है। भूमण्डलीकरण के अंतर्गत डाॅ. सुनीता शर्मा, डाॅ. मीनाक्षी व्यास तथा डाॅ. लीना चैहान के खोजपरक आलेख हंै। पुरानी यादें नये परिप्रेक्ष्य में आरती कुमारी, डाॅ. प्रतिभा पटैल तथा डाॅ. पुनीत विसारिया प्रभावित करते हैं। आधी दुनिया का स्याह यथार्थ में मधुपर्णा मुखर्जी तथा संजय सक्सेना की रचनाएं हैं। सुशील शर्मा तथा चन्द्रशेखरन नायर स्मृति के झरोखों से मुक्तिबोध को याद करते हैं। डाॅ. अजय सिंह तथा प्रो. पूनम सिंह के सुलगते सवाल समाज से प्रतिप्रश्न करते हैं। डाॅ. श्रीनिवास यादव तथा राकेश शुक्ल के प्रश्न ज्वलंत हैं। डाॅ. ज्योति सिन्हा का संगीत बौद्ध काल तक का सफर कराता है। अरूण कुमार सिंह बच्चों की समस्याओं का मनोवैज्ञानिक समाधान सुझाते हैं। डाॅ. सुधीर कुमार सिंह ने बाल वैश्यावृति पर गंभीर बहस प्रस्तुत की है। इस अंक में प्रस्तुत की गई पत्रिकाओं/संग्रह की समीक्षा भी अपने आप में शोधपरक आलेख हैं। पत्रिका शोधार्थियों के साथ साथ आम पाठक को रचना जगत की सैर कराती है।
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कितना नया है यह परिदृश्य--नया परिदृश्य

पत्रिका-नया परिदृश्य, अंक-फरवरी.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-ओमप्रकाश पाण्डेय, पृष्ठ-144, मूल्य-30रू.(वार्षिक100रू.), संपर्क-गेट बाजार, न्यूजलपाई गुड़ी, पो. भक्ति नगर, सिलीगुड़ी, प. बंगाल (भारत)
त्रैमासिक पत्रिका नया परिदृश्य का समीक्षित अंक प्रवेशांक है। पत्रिका का प्रकाशन बंगाल से हो रहा है यह हिंदी साहित्य की सर्वजन स्वीकार्यता को प्रदर्शित करता है। अंक में प्रकाशित कविताओं में रामकुमार कृषक, स्वदेश भारती, रामशंकर चंचल, विभारानी, मधुरेश जी, कैलाश पचैरी, रोहिताश्व आस्थाना, कमल सिंह चैहान तथा डाॅ. सुनील अग्रवाल की रचनाएं प्रभावशाली हैं। रमेश श्रीवास्तव, श्रीकांश व्यास तथा सुधा जैन की लघुकथाओं में कुछ नया पन दिखाई देता है। अजय श्रीवास्तव, मुन्नालाल प्रसाद, रामदेव शुक्ल तथा राजेन्द्र द ानी की कहानियां अच्छे परिवेश से निकली हुई हैं। आलेखों में रमणिका गुप्ता, निर्मला जोशी, मीनाक्षी श्रीवास्तव, तारा परमार, तथा जयप्रकाश मानस के आलेख अच्छे विषयों को उल्लेखनीय ढंग से प्रस्तुत करती हैं। पत्रिका की समीक्षाएं व अन्य रचनाएं भी प्रभावशाली हैं। भविष्य में भले ही पत्रिका में पृष्ठ कम हों पर सामग्री का प्रस्तुतिकरण और भी अच्छा होने की आशा की जाती है।
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Tuesday, May 26, 2009

रू. 5 में साहित्य का इतना कुछ-- संदर्भ हिमप्रस्थ

पत्रिका-हिमप्रस्थ, अंक-अप्रैल.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रणजीत सिंह राणा, पृष्ठ-56, मूल्य-5रू.(वार्षिक50रू.), संपर्क-हिमाचल प्रदेश प्रिटिंग प्रेस परिसर, घोड़ा चैकी, शिमला-5, हिमाचल प्रदेश (भारत) पत्रिका हमेशा से ही हिंदी साहित्य पर महत्वपूर्ण आलेखों का प्रकाशन करती रही है। समीक्षित अंक में हर चील हो रही है नीलाम(दुर्गाशंकर त्रिवेदी), उपेक्षित मानवता के प्रवक्ता डाॅ. अम्बेड़कर(रामसिंह यादव), जनसंचार माध्यम स्वरूप एवं भूमिका(भवानी सिंह) अलग हटकर लिखे गए हैं। इन आलेखों में साहित्य के साथ साथ वर्तमान जीवन के संदर्भ भी दिखाई देते हैं। कहानियों में बिगड़ा हुआ आदमी(रतिलाल साहीन), अज्ञातवास(विनोद ध्रव्याल राही) नयापन लिए हुए है। अशोक दर्द तथा रामकुमार सांभरिया की लघुकथाएं अधिक व्यापकता की मांग करती हैं। कविताओं में भाग्यफल(डाॅ. दिनेश चमोला), अभिसार(रूपान्तर संतोष साहनी), कहां गए वे दिन(प्रदीप शर्मा) तथा जिंदगी की राह पर(जयपाल ठाकुुर) उल्लेखनीय हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ यात्रा वृतांत तथा व्यंग्य रोचक तथा पठनीय हैं। रू. 5 में इतनी उपयोगी तथा संग्रह योग्य सामग्री तारीफे काबिल है। Arrange your own love marriage? Register at Shaadi.com Matrimonials

Sunday, May 24, 2009

हिमगिरि क्या पत्थर है केवल?--साहित्य सागर

पत्रिका-साहित्य सागर, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-कमलकांत सक्सेना, पृष्ठ-52, मूल्य-20रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-161बी. शिक्षक कांग्रेस नगर, बाग मुगलिया, भोपाल म.प्र.
पत्रिका के ग्रीष्म अंक में ग्रीष्म की कुछ अच्छी कविताओं का समावेश किया गया है। अक्षय ओझा, राम स्नेही लाल शर्मा, हरिप्रकाश जैन, की कविताएं ग्रीष्म में भी आनंदित करती हैं। मां शीर्षक कविताओं में(विशेष आयोजन के अंतर्गत) रमेश सोबती, जयजय राम आनंद, घनश्याम योगी तथा अरूण अपेक्षित की कविताओं में सारगर्भित सामग्री का समावेश किया गया है। प्रख्यात साहित्यकार नर्मदेश भावसार पर एकाग्र लेखों में कालूराम पाक्षिक, गोवर्धन दास मेहता, कैलाश ‘आदमी’ तथा गोविंद प्रसाद चतुर्वेदी के आलेख नए अंदाज में भावसार जी पर प्रकाश डालते हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ तथा सामग्री भी उपयोगी तथा पठनीय है।

Saturday, May 23, 2009

अच्छे साहित्य की प्रस्तुति का सफल प्रयास--समावर्तन

पत्रिका-समावर्तन, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ-98, मूल्य-20रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-माधवी, 129 दशहरा मैदान, उज्जैन (म.प्र.)
पत्रिका का समीक्षित अंक विजय कुमार के साहित्य सृजन पर एकाग्र है। सुनीता जैन, मनोहर वर्मा एवं देवेन्द्र राज ठाकुर ने समग्र रूप से अपने विचार व्यक्त किए हैं। संतोष सुपेकर, श्रीराम त्रिपाठी तथा कमल कुमार के आलेख अच्छे बन पड़े हैं। रमेश दवे ने आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी के रचनाकर्म पर विस्तृत रूप से विचार किया है। निरंजन श्रोत्रिय का ख्यात कवि नईम पर लिखा गया आलेख पत्रिका की प्रमुख रचना है। समावर्तन अब एक प्रमुख मासिक पत्रिका का दर्जा प्राप्त कर चुकी है अतः इसके अधिक विस्तार की आवश्यकता है। पत्रिका को चाहिए कि अन्य नवोदित तथा प्रतिभासम्पन्न रचनाकारों को जोड़े।

Friday, May 22, 2009

साहित्य को नए रूप में समझने का प्रयास-संदर्भ कथादेश

पत्रिका-कथादेश, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हरिनारायण जी, पृष्ठ-96, मूल्य-20रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि. सी-52, जेड-2, दिलशाद गार्डन, दिल्ली(भारत)
कथादेश के समीक्षित अंक में चार बहुत ही महत्वपूर्ण कहानियां सम्मलित की गई हैं। इनमें वर्तमान समय का युवा, समाज, संस्कृति तथा आधुनिकता के साथ साथ प्राचीन सामाजिक परंपराओं को पढ़ा जा सकता है। कहानियों में रणेन्द(छप्पन छुरी बहत्तर पेंच), नरेन्द्र नागदेव(पेड़ खाली नहीं है), हरीश पाठक(अंतिम किस्त) तथा नीला प्रसाद(आखिरी मुलाकात के इंतजार में), रमेश सेनी(चीकू का पेड़) में आज का समाज देखा जा सकता है। गांधीवादी साहित्यकार स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर पर पंकज विष्ट का आलेख तथा प्रकाश कांत की नईम पर रचन ा उल्लेखनीय हैं। बजरंग बिहारी तिवारी ने गुजराती दलित लेखन का गहन विश्लेषण किया है। लेकिन इसमें कहीं कहीं राजनीतिक पुट का अनावश्यक समावेश हो गया है। आशुतोष भारद्वाज तथा अर्चना वर्मा के आलेख में मुझे नया कुछ पढ़ने में नहीं आया। आखिर कब तक हम उन्हीं विषयों को अलग अलग रूपों में प्रस्तुत करते रहेंगे? जयशंकर की डायरी अश्लील कमरे, आत्मीय कमरे कुछ नया कहने का साहस कर सके हैं यह दिल को सुकुन देने वाला है। निर्मला गर्ग तथा अविनाश मिश्र की कविताएं समस्या पूर्ति ही अधिक लगती है। इस बार अविनाश जी प्रकाश झा को आखिर क्यों बधाई देते दिखाई दिये जबकि एक से एक बढ़कर ब्लाॅग इंटरनेट पर उपलब्ध है जिनके सामने प्रकश झा का ब्लाॅग पिद्दी सा मालुम होता है। पत्रिका में संतोष की बात यह है कि चुने हुए लेखकों की जमात के बावजूद भी नया कुछ देने का प्रयास किया गया है जिसे स्वीकार किया जाना चाहिए।

Sunday, May 17, 2009

संपादकीय का दूसरा भाग विस्तृत लेखन की मांग करता है-(संदर्भ हंस संपादकीय)

पत्रिका-हंस, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजेन्द्र यादव, पृष्ठ-96, मूल्य-25रू.(वार्षिक250रू.), संपर्क-अक्षर प्रकाशन प्रा.लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज, नई दिल्ली 110.002(भारत)Looking for someone special? Register at Shaadi.com Matrimonials
समीक्षा- प्रथम भाग
पत्रिका के मई अंक में प्रकाशित प्रमुख कहानियों में शहर में घूमता एक फौजी सिपाही(मनमोहन बाबा), बर्बादी.काम(सुभाष शर्मा), क्यूटीपाई(सोनाली सिंह) तथा दौड़(श्याम कुमार पोकरा) प्रमुख है। संजीव का आलेख पुरानी किताबों की पुरानी पड़ती दुनिया पत्रिका का प्रमुख आलेख है। हमेशा की तरह सीबा असलम फहमी ने संविधान और कबिला में एक नया विषय उठाया है। डाॅ. धर्मचन्द्र विद्यालंकार, सोनी सिंह तथा पुण्य प्रसून वाजपेयी के आलेख समसमयिक हैं। अभय कुमार दुबे ने राजनीति तथा गठजोड़ को साहित्य के नजरिये से देखने का प्रयास किया है।
डाॅ. ओम प्रभाकर व दिनेश कुशवाह की ग़ज़लें नए संदर्भो को छूती हुई दिखाई देती हैं। पत्रिका में भारत भारद्वाज के आलेख सहित सभी स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं आदि पत्रिका की प्रतिष्ठा के अनुरूप हैं। शीबा जी को लिखे गए पत्र के रूप में संपादकीय पठनीय रचना बन गई है। विष्णु प्रभाकर को याद करते हुए उनसे संबंधित संस्मरण के रूप में संपादकीय का दूसरा भाग और भी विस्तृत लेखन की मांग करता है।
(पत्रिका की विस्तृत समीक्षा अगले अंक में)

Friday, May 15, 2009

समकालीन अभिव्यक्ति---------वर्तमान का साहित्य व उसका विश्लेषण

पत्रिका-समकालीन अभिव्यक्ति, अंक-जन.मार्च.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-उपेन्द्र कुमार मिश्र, पृष्ठ-64, मूल्य-15रू.(वार्षिक50रू.), संपर्क-क्वार्टन नं. 5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरौली, नई दिल्ली-30(भारत)
पत्रिका का समीक्षित अंक एक सार्थक व उपयोगी प्रस्तुति है। अंक मंे चार कहानियां संकलित हैं जिनमें- फलवाला(ओम उपाध्याय), बेटा(विनोद कुमार शौख), एक भरोसेदार पागल(कुंवर पे्रमिल) तथा मन है जात अजौं वहीं(आशारानी लाल) हैं। परती परिकथा पर डाॅ. चम्पासिंह का आलेख इस उपन्यास को एक नये दृष्टिकोण से देखने का प्रयास है। अरविंद कुमार उपाध्याय ने मेत्रैयी पुष्पा के साहित्य को विश्लेषणात्मक ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। Free advertising
व्यंग्य में डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव का व्यंग्य ‘भागकर पे्रम और विवाह’ एक गुदगुदाने वाली रचना है। राज किशोर राजन, विजय उपाध्याय मेरठी, बी.पी. दुबे, गोपाल कृष्ण सक्सेना, पूनम गुजरानी, केवल गोस्वामी, डाॅ. बेकस की कविताएं अच्छी हैं। पत्रिका के अन्य स्तंभ व समीक्षाएं प्रभावित करती हैं। अच्छे अंक के लिए संपादक बधाई के पात्र हैं।

Thursday, May 14, 2009

हिंदुस्तानी ज़बान-----शोधपरक त्रैमासिक पत्रिका

पत्रिका-हिंदुस्तानी जबान, अंक-अपै्रल-जून.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. सुशीला गुप्ता, पृष्ठ-60, मूल्य-10रू.(वार्षिक 40रू.) संपर्क-महात्मा गाॅधी मेमोरियल रिसर्च सेन्टर और लाइब्रेरी, महात्मा गाॅधी बिल्ंिडग, नेताजी सुभाष रोड़, मुम्बई 400002 (भारत)
हिंदुस्तानी जबान हिंदी व उर्दू में प्रकाशित होने वाली प्रमुख गाॅधी साहित्यवादी पत्रिका है। समीक्षित अंक में भारत केन्द्रित विश्व दृष्टि(डाॅ. सिद्धेश्वर प्रसाद), साहित्य और विश्व शांति(डाॅ. अमर सिंह वधान), कवि भूषण का काव्य वैभव(डाॅ. राममूर्ति त्रिपाठी), कृष्ण काव्य में मनुष्य की प्रतिष्ठा(डाॅ. त्रिभुवन राय) तथा शब्द ब्रम्ह्य की उपेक्षा क्यों?(डाॅ. अचलानंद अखमोल) प्रमुख हैं। पत्रिका गाॅधीवादी साहित्य के साथ साथ वर्तमान संदर्भो में भारतीय साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों पर आधारित आलेख प्रमुखता से प्रकाशित करती है। ये आलेख विश्लेषणात्मक होने के साथ साथ शोधपरक भी होते हैं। समीक्षित अंक की पुस्तक समीक्षा, साहित्यिक गतिविधियां तथा पाठकों के पत्र पठनीय तथा संग्रह योग्य हैं। संपादक डाॅ. सुशीला गुप्ता का समकालीन साहित्य पर लिखा गया संपादकीय कुछ नए प्रश्नों को उठाता है जिन पर आज विचार किए जाने की आवश्यकता है।

Sunday, May 10, 2009

वियाबान में साहित्य की लहलहाती फसल-परती पलार

पत्रिका-परती पलार, अंक-जन.-मार्च2009, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-नमिता सिंह, पृष्ठ-130, मूल्य-30रू.,(वार्षिक120रू), संपर्क-आश्रम रोड़, वार्ड नं. 8, अररिया, 854311
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पत्रिका का समीक्षित अंक हास्य व्यंग्य विशेषांक है। रचनाओं को संपादक ने बहुत ही सुंदर ढंग से संजोया है। व्यंग्य एवं हास्य पर लिखे गए प्रमुख आलेखों में महेश चंद्र शर्मा, कृष्ण कुमार यादव, स्नेह किरण तथा डाॅ. चम्पा सिंह की रचनाएं नवीनता लिए हुए है। हास्य व्यंग्य में श्याम सुुंदर घोष, ओम प्रकाश मंजुल, ध्रुव ताती, हितेष कुमार शर्मा, संतोष खरे, प्रेम विज, राजा राघव तथा आलोक दत्त प्रभावित करते हैं। आनंद दीवान, ओम प्रकाश कादयान, ओम प्रकाश बजाज तथा आजाद राजीव रंजन की लघुकथाएं लघु होते हुए भी कथात्मकता लिए हुए हैं। अरविंद विद्रोही, पारसनाथ, रीता हजेला आराधना, राधेलाल विजघावने तथा डाॅ. नवल किशोर दास की क्षणिकाएं पत्रिका की मूल भावना के अनुरूप हैं। पत्रिका के अन्य स्थयी स्तंभ तथा साहित्यिक सामग्री भी उत्तम पठनीय तथा संग्रह योग्य हैं। वर्तमान में छोटे स्थानों से जो साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हो रहीं हैं उन्होंने उन साहित्यकारों को प्रकाश में लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है जिसकी बहुत अधिक आवश्यकता थी।

Tuesday, May 5, 2009

हिंदी राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार की जा रही है

पत्रिका-मैसूर हिंदी प्रचार परिषद पत्रिका, अंक-अपै्रल.09, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. बि. रामसंजीवैया, पृष्ठ-48, मूल्य-5रू.(वार्षिक 50रू.) संपर्क-58, वेस्ट आॅफ कार्ड रोड़, रजाजी नगर, बेंगलूर कर्नाटक (भारत)
पत्रिका का समीक्षित अंक विविधतापूर्ण साहित्यिक सामग्री लिए हुए है। रंजना अरगड़े ने स्वाधीनता और साहित्य के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं की ओर संकेत किया है। निर्मल वर्मा के उपन्यासों में नारी चेतना पर डाॅ. नमस्या ने पुरजोर तरीके से समझाने का प्रयास किया है कि निर्मल वर्मा के साहित्य में नारी ‘कमजोर तो नहीं है पर वह अकेलेपन की नियति को ढोने के लिए मजबूर है’। एस. मुत्तुकुमार ‘विष्णु प्रभाकर के साहित्य में चित्रित अंधविश्वास’ को उनके समाधान के रूप में देखा है। गणेश गुप्त ‘सूर साहित्य में सांस्कृतिक चेतना’ के लिए मूल स्त्रोत वैष्णव धर्म को मानते हैं। प्रो. ललिताम्बा ‘भाषा कहीं पंगु हो गई तो’ आलेख में भाषा के संबंध में भावनात्मक ढंग से विचार करते हैं। पत्रिका के अन्य आलेख भी उपयोगी तथा संग्रह योग्य हैं। सत्यनारायण पण्डा, मनमोहन सिंह, केशव शरण तथा सुभाष सोनी कविताओं में विशेष रूप से प्रभावित करते हैं। पत्रिका के शोधपरक अन्य आलेख कर्नाटक में हिंदी के प्रचार प्रसार की एक झलक दिखलाते हैं। यह सुखद है कि आज हिंदी राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार की जा रही है।

Saturday, May 2, 2009

साहित्य में व्यक्ति और समाज का परिचायक- प्रगतिशील आकल्प

पत्रिका-प्रगतिशील आकल्प, अंक-अप्रैल-सितम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-डाॅ. शोभनाथ यादव, पृष्ठ-20(टैब्लाइड आकार), मूल्य-आजीवन रू.1000(प्रति अंक, वार्षिक मूल्य उपलब्ध नहीं), संपर्क-पंकज क्लासेस, पोस्ट आॅफिस बिल्ंिडग, जोगेश्वरी पूर्व मुम्बई, महाराष्ट्र(भारत)
पत्रिका का समीक्षित अंक ‘जागो भारत जागो......’ विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया है। अंक में ख्यात रचनाकारों के विचारों से परिचित कराया गया है। इनमें प्रमुख हैं- नंद कुमार मनोचा ‘वारिज’, डाॅ. अब्दुल कलाम, एल.एम. हरदेनिया, डाॅ. सोहन शर्मा, मनमोहन सरल, रामदेव शुक्ल, डाॅ. उषा यादव, राजेन्द्र परदेसी, संतोष श्रीवास्तव, डाॅ. सुरेश उजाला, मधु राज मधु, डाॅ. सुशीला गुप्ता, डाॅ. विनय, रामअवतार यादव प्रमुख हैं। डाॅ. वीरेन्द्र सिंह यादव का आलेख ‘संयुक्त राष्ट्रसंघ में हिंदी आवश्यक’ वर्तमान संदर्भो में वैश्विक स्तर पर हिंदी की अनिवार्यता को दर्शाता है। भारतीयता के लिए जो कुछ किया गया है उसे सामूहिक जिम्मेदारी के साथ बढाए जाने की आवश्यकता है।
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Friday, May 1, 2009

‘नाटक ही नाटक......प्लीज’

पत्रिका-इप्टा वार्ता, अंक-27, स्वरूप-मासिक, संपादक-हिमांशु राय, पृष्ठ-8, संपर्क-पी.डी.4 परफेक्ट एन्क्लेव, स्नेह नगर, जबलपुर म.प्र. (भारत)
पत्रिका के समीक्षित अंक में नाटक के पर्याय बादल सरकार के 83 वर्ष की आयु पूर्ण करने पर उनसे संबंधित जीवन परिचय तथा व्यक्तित्व व कृतित्व को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। देवेन्द्र राज अंकुर ने अपने आलेख ‘नाटक के भीतर नाटक’ में नाट्य शास्त्र में पात्रों, दृश्य संयोजन तथा दर्शक की भूमिका आदि पर विचार किया है। रंग समाचार स्तंभ के अतर्गत मंचन से संबंधित समाचारों में पांच बाल नाटक, आविष्कार जूते का, द्रौपदी, कठगुलाब की नाट्य प्रस्तुति, आंख मिचैली आदि के मंचन का समाचार प्रकाशित किया गया है। रमेश राजहंस ने अपने आलेख ‘नाट्यकला क्या है’ में विश्लेषणात्मक ढंग से इसे स्पष्ट किया है।Need a friend? Indian Dating at Fropper.com
पत्रिका देश भर से प्रकाशित होने वाली प्रमुख नाट्य समाचार पत्रिका में शुमार की जाती है।