Monday, December 28, 2009

साहित्य के लिए कितना नया है- ‘नया ज्ञानोदय’

पत्रिका-नया ज्ञानोदय, अंक-दिसम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-रवीन्द्र कालिया, पृष्ठ-120, मूल्य-30रू.(वार्षिक 300रू.), सम्पर्क-भारतीय ज्ञानपीठ, 16, इन्स्टीट्यूशनल ऐरिया, लोदी रोड़, नई दिल्ली 110.003, फोनः(011)24626467, ईमेलः nayagyanoday@gmail.com , वेबासाईटः http://www.jnapith.net/
भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित नया ज्ञानोदय वास्तव में हिंदी साहित्य ही नहीं भारतीय भाषाओं तथा साहित्य में अपना प्रमुख स्थान रखना है। पत्रिका का स्वरूप विशुद्ध रूप से साहित्यिक है। इसके अंक सहेज कर रखने योग्य होते हैं। समीक्षित अंक में हिंद स्वराज की 101 वीं वर्षगांठ पर महत्वपूर्ण आलेखों को सम्मलित किया गया है। स्मृति खण्ड के अंतर्गत विश्वनाथ त्रिपाठी, विभूतिनारायण राय, भारत भारद्वाज एवं प्रकाश कांत के आलेख क्रमशः श्री प्रभाष जोशी, कंुवरपाल सिंह, हरीश भदानी एवं प्रमोेद उपाध्याय की यादों को सहेज कर रखे हुए हैं। विजय मोहन सिंह ने तुर्गनेव के उपन्यास ‘पहला प्यार’ आज के वातावरण को ध्यान में रखकर विचार किया है। स्व. श्री प्रभाष जोशी जी ने हिंदी स्वराज को मोहनजोदड़ों के काल से जोड़कर उसे अपने विशिष्ठ ढंग से प्रस्तुत किया है। गांधी जी का आलेख स्वराज पर उनके विचारों का महत्वपूर्ण दस्तावेज है। अंक में प्रकाशित कहानियों में मनोज रूपड़ा, ह्दयेश, महेश दर्पण, जया जादवानी, बलराम तथा ज्योति चावला की रचनाएं अपनी अपनी शैली तथा विषय वस्तु के द्वारा वर्तमान समय जांच परख करती हुई प्रतीत होती है। रणजीत शाहा का यात्रा वृतांत, प्रांजल धर का ‘मीडिया हिंदी तकनीक तथा बाजार’ एवं सुरेश सेठ का आलेख ‘जालंधर खोया हुआ शहर’ आम पाठक जिसे साहित्य की समझ अधिक नहीं है अनुपयोगी ही लगेंगे। हरिओम राजोरिया तथा विमल कुमार की कविताएं अपनी पुरानी लीक पर चलती दिखाई देती हैं, इनमें विषय की नवीनता जैसा कुछ नहीं है सिवाए भाषा केे लटकों झटकों के? सुनील गंगोपाध्याय ने उत्पल बनर्जी की कविता का बंग्ला से अनुवाद इतने संुदर ढंग से किया है कि ये हिंदी में लिखी गई लगती हैं।

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