Tuesday, November 3, 2009

एक ‘कथन’ उजास भरा--

पत्रिका-कथन, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर.09, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-संज्ञा उपाध्याय, पृष्ठ-98, मूल्य-25(वार्षिक 100रू.), सम्पर्क-107, साक्षरा अपार्टमेंट, ए-3 पश्चिम विहार, नयी दिल्ली 110063 भारत फोनः(011)25268341, ईमेलः kathanpatrika@hotmail.com
पत्रिका के समीक्षित अंक की तीनों कहानियां बहुत ही अच्छी हैं। टिप्पल(कामेश्वर पाण्डेय), जो बिकता है(जितेन ठाकुर) तथा घर चले गंगाजी(प्रियदर्शन) आज के समाज व उससे जुड़े संदर्भो को विश्लेषित करती चलती है। कविताओं में विजेंद्र, राजेंद्र नामदेव, राकेश रंजन तथा सुरेश सेन ने कुछ नए विषय उठाकर उनपर नए ढंग से विचार किया है। लीलाधर मंडलोई की कविताओं पर राजेश जोशी का आलेख मंडलोई जी की कविताओं पर विस्तृत टिप्पणी देता है। संतोष चैबे ने अपनी कहानी ‘महान कलाकार’ के माध्यम से ख्यात रंगकर्मी हबीब तनवीर को याद किया है। अफगान की वर्तमान परिस्थितियों पर यादवेंद्र जी का आलेख और भी विस्तृत रूप से वहां के हालातों को बयान करता तो अधिक अच्छा होता और यह आलेख पाठकों के लिए संग्रह योग्य हो जाता। लेकिन फिर भी इसकी उपयोगिता तथा पठनीयता पर किसी तरह का संदेह नहीं किया जा सकता। साहित्य और सामाजिक आंदोलन(रमेश उपाध्याय) तथा साहित्यिक आंदोलन का भविष्य(शंभुनाथ) साहित्य के गंभीर पाठकों की भूख शांत करने में सक्षम हैं। पत्रिका की अन्य रचनाएं, पर तथा समीक्षा भी बांधे रखने में पूरी तरह सफल रही है। एक और अच्छे अंक के लिए पत्रिका की संपादक बधाई की पात्र है।

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