Friday, October 9, 2009

इसमें है व्यंग्यों का खजाना--संदर्भ साहित्य अमृत

पत्रिका-साहित्य अमृत, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-त्रिलोकी नाथ चतुर्वेदी, पृष्ठ-178, मूल्य-50रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-4/19, आसिफ अली रोड़, नई दिल्ली 110002, फोन (011)23289777 ई मेलः prabhat1@vsnl.com
पत्रिका का समीक्षित अंक व्यंग्य विशेषांक है। इसमें साहित्य अमृत द्वारा आयोजित युवा हिंदी व्यंग्य प्रतियोगिता की पुरस्कृत रचनाओं का प्रकाशन किया गया है। प्रमुख रचनाओं में मोटेराम जी शास्त्री(प्रेमचंद), नौकरी(श्रीरामायण चतुर्वेदी), अंधी जनता और लंगड़ा जनतंत्र(विद्यानिवास मिश्र), वकील(बालकृष्ण भट्ट), वसीयतनामा(पं.सूर्यनारायण व्यास), बेवकूफ कौन बना(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना), आप भी ओ हैं(जी.पी. श्रीवास्तव), मोर्चा अंग्रजी से(पं. गोपाल प्रसाद व्यास), किरूं लयवल हय हिंदी साहित्य(मनोहर श्याम जोशी), हिंदी साहित्य पर शोध कुछ सुझाव(रवीन्द्र नाथ त्यागी), घास छीलने का पाठ्यक्रम(शरद जोशी) मैं लेखक से प्रकाशक क्यों बना(पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’) व बनारस में पिगसन(बेढव बनारसी) की एकानेक बार पढ़ने योग्य व्यंग्यों को स्थान दिया गया है। हिंदी व्यंग्य लेखन पुरस्कार के अंतर्गत महत्वपूर्ण रचनाएं है-- कोट में टंगा आदमी(अजय अनुरागी), ‘धक्का ही है शास्वत सत्य(आशीष दशोतर), वो आए थे/दंगा उत्सव(ओम द्विवेदी), कहते हैं मुझको हवा हवाई(घनश्याम कुमार देवांश), काम की तलाश(मिथलेश कुमार राय), पत्रिका के इस संग्रह योग्य अंक में प्रकाशित प्रमुख व्यंग्यों में --जनक का धनुष(कनक टण्डन), टोटकों वाली आत्मनिर्भरता(ज्ञान चतुर्वेदी), इस हमाम में(सूर्यबाला), पौला मौसी(नरेन्द्र कोहली), खास बनाम आम(जैमिनी हरियाणवी), अर्थरस की निष्पत्ति के व्यवधान(अशोक चक्रधर), ओम गंदगीआय नमः(पे्रम जनमेजय), घर से निकलते ही(पूरन शर्मा), सपनों के डिजाइनर(हरीश नवल), सस्ती सब्जी की तलाश में सुपरमैन(आलोक पुराणिक) एवं कबीर का स्वर्ग से निकाला जाना(विनोद शंकर शुक्ल) उल्लेखनीय हैं। हिंदी साहित्य के साथ साथ अन्य भारतीय भाषा के व्यंग्यों के अनुवाद भी पढ़ने में रूचिकर लगते हैं व आम जन के शीघ्र ही समझ आने योग्य हैं। पत्रिका के अन्य स्थायी स्तंभ भी इसके अन्य अंक के समान गरिमामय व अपनी प्रस्तुतिकरण शैली के कारण आकर्षित करते हैं। एक अच्छे सार्थक व उपयोगी अंक के लिए बधाई। आश्चर्य है कि इतने अच्छे प्रकाशन का हिंदी साहित्य जगत में उस तरह से स्वागत नहीं हुआ जिस तरह से होना चाहिए था।

1 comment:

  1. साहित्य अम्रत का भी व्यंग्य विशेषांक निकला है यह जानकर प्रसन्नता हुई ।

    ReplyDelete