Sunday, September 27, 2009

‘हिंदी की कठिनाई का ढिंढोरा पीटना फैशन हो गया है’- संदर्भ संपादकीय भाषा स्पंदन

पत्रिका-भाषा स्पंदन, अंक-17, स्वरूप-मासिक, प्रधान संपादक-डाॅ. सरगु कृष्णमूर्ति, संपादक(मानद)-डाॅ. मंगल प्रसाद, पृष्ठ-52, मूल्य-10रू.(वार्षिक 100रू.), संपर्क-कर्नाटक हिंदी अकादमी, विनायका, 127, एमआईजी/केएचबी, 5वां ब्लाक, कोरमंगला, बेंगलूरू, 560095, फोन 9886241853, ईमेलः karnatakahindiacademy@yahoo.com
पत्रिका के समीक्षित अंक मंे हिंदी भाषा की तकनीकि पर कुछ उपयोगी आलेखों का प्रकाशन किया गया है। इनमें प्रमुख हैं- यंत्र अनुवाद की समस्या और संभावना(श्रीनारायण समीर), हिंदी की विपन्नता(जगदीश यादव), राष्ट्रभाषा हिंदी के लिए(अशोक शेरी) एवं लुप्त होते जा रहे शब्द प्रमुख हैं। सुषमा मुनीन्द्र व अखिलेश शुक्ल की कहानियां समकालीन व प्रभावशाली हैं। भानुदत्त त्रिपाठी ‘मधुरेश’, ज्ञानेन्द्र साज, शैल सक्सेना, प्रदीप कुलकर्णी की कविताएं पाठक पर अच्छा प्रभाव छोड़ती हैं। गीत-ग़ज़लों में निर्मल चंद्र निर्मल, कमल किशोर भावुक, अशोक अंजुम, ईश्वरचन्द्र मिश्र ने अच्छी तरह से विषय का निर्वाहन किया है। जय प्रकाश, आर.के. शर्मा एवं पंकज शर्मा के आलेख वर्तमान विषयों पर अच्छी तरह से प्रकाश डालते हैं। दक्षिण भारत से प्रकाशित पत्रिका भाषा स्पंदन की सामग्री तथा प्रस्तुतिकरण उत्कृष्ट है। अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई।

2 comments:

  1. कथा-चक्र से नई-नई पत्रिकाओं की जानकारी मिलती है!

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