Monday, September 28, 2009

‘भारतीय भाषाओं के संकट व उस पर पड़ने वाले बाज़ारवादी प्रभाव-संदर्भ अक्षरा(संपादकीय)

पत्रिका-अक्षरा, अंक-सितम्बर-अक्टूबर.09, स्वरूप-द्वैमासिक, प्रधान संपादक-कैलाश चंद्र पंत, प्रबंध संपादक-सुुशील कुमार केडिया, संपादक-डाॅ. सुनीता खत्री, पृष्ठ-120, मूल्य-20रू.(वार्षिक120रू.), संपर्क-म.प्र. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिंदी भवन, श्यामला हिल्स, भोपाल 462002 म.प्र.(भारत), फोन(0755)2661087, 2738612
पत्रिका के समीक्षित अंक की सामग्री देश विदेश के साहित्यिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की सामग्री अपने कलेवर में समेटे हुए है। ख्यात आलोचक रमेश चंद्र शाह ने हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक चेतना पर बहुत ही उपयोगी पठनीय आलेख लिखा है। पत्रिका में प्रकाशित कुछ प्रमुख आलेखों में अंबिकादत्त शर्मा, सूर्यप्रसाद दीक्षित, कैलाश चंद्र जायसवाल, सुरेन्द्र वर्मा, नवीन चतुर्वेदी एवं राजेन्द्र गौतम के आलेख शामिल किए जा सकते हैं। नर्मदा प्रसाद सिसोदिया, विजय कुमार उपाध्याय एवं सरमद ख़्याम ने अपनी रचनाओं में सांस्कृतिक संदर्भ के साथ साथ हमारी सामाजिक मान्यताओं व परंपराओं को भी प्रमुख रूप से स्थान दिया है। सुशांत सुप्रिय की कहानी ‘वे’ रवानगी युक्त बहुत ही आकर्षक कहानी बन पड़ी है। निरूपम की कहानी ‘कटा हुआ पेड़’ आज की जरूरतों पर विचार करती हुई रचना है। नीरज कुमार, सुरेन्द्र भटनागर, विद्या गुप्ता एवं प्रभा मजूमदार की कविताएं उल्लेखनीय हैं। कुमार रवीन्द्र के गीत व अशोक ‘अंजुम’ के दोहे पत्रिका की पठनीयता में वृद्धि करने में सफल रहे हैं। उर्दू कहानी ‘दूसरी मौत’(मूल लेखकःइफ्तख़ार नसीम) का अनुवाद केवल गोस्वामी द्वारा कुछ जटिल हो गया है जिससे रचना की सरसता में कमी आई है। पत्रिका की अन्य रचनाएं, समीक्षाएं व पत्र स्तंभ आदि भी इसे परिपूर्णता प्रदान करते हैं। ‘भारतीय भाषाओं के संकट व उस पर पड़ने वाले बाज़ारवादी प्रभाव पर कैलाश चंद्र पंत का संपादकीय विचारणीय है तथा गंभीरतापूर्वक सोचने विचारने के लिए मज़बूर करता है। एक और अच्छे अंक के लिए बधाई।

3 comments:

  1. कैलाशचंद पंत जी को नमस्‍कार,
    कृपया अंक की प्रति भेज सकें तो अच्‍छा होगा
    शकील, मुंबई

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