Thursday, September 24, 2009

‘मैं जब खुश होता हूं तो पंजाब मेल हो जाता हूं’--संदर्भ(वागर्थ..विनय दुबे)

पत्रिका-वागर्थ, अंक-सितम्बर.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. विजय बहादुर सिंह, प्रबंध संपादक-कुसुम खेमानी, पृष्ठ-138, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), संपर्क-भारतीय भाषा परिषद्, 36ए, शेक्सपियर सरणि, कोलकाता 700017 (भारत) फोन(033) 22817476 ई मेल: bbparishad@yahoo.co.in
डाॅ. विजय बहादुर सिंह के संपादन में पत्रिका वागर्थ की सामग्री में भी विविधता आ गई है। यह इसके सितम्बर 09 अंक से जाहिर होता है। अंक मंें आचार्य नंददुलारे वाजपेयी जी का आलोचना लेख प्रमुखता से प्रकाशित किया गया है। आलेख आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना इसके आलोचना त्रैमासिक में प्रकाशन समय सन 1954 में था। अरूण माहेश्वरी ने स्व. प्रभा खेतान पर अपने संस्मरण में उनके साहित्यिक अवदान का विस्तार से उल्लेख किया है। राखी राय हल्धर, कांतिकुमार जैन एवं मैत्रेयी पुष्पा के आलेख पढकर पाठक एक नये हिंदी साहित्यिक संसार में विचरण करता हुआ अनुभव करता है। स्मरण खण्ड़ के अतर्गत नंददुलारे वाजपेयी के पत्र कवि निराला, जयशंकर प्रसाद, रामविलास शर्मा के नाम, वाचस्पति पाठक के पत्रांश कवि प्रसाद के नाम एवं रामविलास शर्मा का आलेख ‘छायावाद के समर्थ आलोचक नंददुलारे वाजपेयी’ ऐसी रचनाएं हैं जिन्हें हर गंभीर पाठक सहेज कर रखना चाहेगा। हरिओम राजौरिया एवं प्रदीप जिलवाने की कविताएं नए संदर्भो से बंधी हुई तथा कलात्मक हैं। पत्रिका के इस अंक का विशेष आकर्षण है आम जन कवि विनय दुबे पर एकाग्र भाग। इस भाग में विनय दुबे की प्रख्यात कविताएं प्रमुखता से प्रकाशित की गईं हैं। उन्हें बड़ी सिद्दत के साथ वरिष्ठ कवि राजेश जोशी,ख्यात आलोचक रमेश चंद्र शाह, संपादक आलोचक कवि डाॅ. विजय बहादुर सिंह ने याद किया है। कर्मेन्दु शिशिर, नरेन्द्र जैन के पत्र के रूप में लिखे गए आलेख उनके जीवन के बहुमूल्य पहलुओं को सामने लाते हैं। राजीव श्रीवास्तव का आलेख, जसवीर चावला की लघुकथाएं, मौलाना हारून ‘अना’ कासिमी की ग़ज़लें, सफलता सरोज की टिप्पणी तथा सुरेश गर्ग की व्यंग्य कथा पत्रिका की विविधता तथा विस्तार का आभास कराती है। अन्य स्थायी स्तंभ, पत्र, साहित्यिक समाचार, समीक्षाएं भी उत्कृष्ट व ज्ञानवर्धक हैं। एक ओर अच्छे अंक के लिए बधाई।

1 comment:

  1. फ़िर से एक अच्छी जानकारी दी आप ने धन्यवाद

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