Thursday, August 20, 2009

हिंदी साहित्य का विशिष्ट अर्थ--वागर्थ

पत्रिका-वागर्थ, अंक-अगस्त.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ-138, मूल्य-रू.20(वार्षिक 200रू.), संपर्क-भारतीय भाषा परिषद्, 36 ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता 700.017(भारत)
वागर्थ के समीक्षित अंक मंे साहित्य की उन विषयों को शामिल किया गया है जो आने वाले कुछ वर्ष मंे भारतीय साहित्य जगत का हिस्सा बनेंगे। संपादक श्री विजय बहादुर सिंह ने बहुत सटीक लिखा है कि ‘कवि या लेखक का सच्चा सृजन-विवेक यही है कि वह अपन और अपनी कविता/साहित्य की राजनीति को समझे। यही उकसी गतिशीलता होगी, उन तमाम मानसिक जड़ता के विरूद्ध जो उसके काव्य बोध को घेर कर खड़ी है। यही प्रगतिशीलता भी।’ पत्रिका में कृष्ण प्रताप सिंह तथा प्रदीप सक्सेना अपने अपने आलेखों में आम जनता तक अपनी बात पहंुचाने के लिए जिस मार्ग का चयन करते हैं वह अपने आप में परिपूर्ण है। विमर्श के अतंर्गत रंजना जायसवाल वर्तमान स्त्री विमर्श का सच उजाकर करती हुई प्रतीत होती है। विद्यासागर नौटियाल का संस्मरण पाठक को अपने पठ्न जाल में बांध-सा लेता है। हमेशा की तरह गुलज़ार की कविताएं आम जन की कविताएं ही प्रतीत होती हंै। ख्यात लेखक श्री मनोज श्रीवास्तव ने तुलसी साहित्य पर नए तरीके से विमर्श प्रस्तुत किया है। इसमें सुंदरकाण्ड पर आधुनिक बोध के माध्यम से विचार करते हुए दिखाई देते हैं। हनुमान जी के चरित्र के सकारात्मक पहलू को जिस ढंग से उन्होंने स्पष्ट किया है वह पठ्नीय तथा संग्रह के योग्य है। उर्मिला खारपुसे तथा आकृति पाण्डे की कविताएं चमत्कार से कोसों दूर रहकर वास्तविकता के धरातल पर विमर्श प्रस्तुत करती हैं। ख्यात आलोचक, लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जी के स्मरण खण्ड़ के अंतर्गत बलराज साहनी, शिवानी, डाॅ. नामवर सिंह तथा नवल जी के विचार जानकर द्विवेदी जी की साहित्यिक प्रतिब्धता के प्रति बहुत कुछ जाना जा सकता है। धु्रव गुप्त की ग़ज़लें हिंदी ग़ज़ल को नया रूप देने का सफल प्रयास है। कहानी खण्ड़ के अंतर्गत तीनों कहानियां उल्लेखनीय बन पड़ी हैं। जयशंकर की कहानी मंजरी, हसन जमाल की कहानी नामुराद तथा रमेश दवे की कहानी विज्ञापन को एक साथ पढ़ा जाए तो इन कहानियों के बीच से आज के आम आदमी के जीवन में रोशनी देने वाले रास्ते को खोजा जा सकता है। पत्रिका की अन्य कविताएं, समीक्षाएं स्थायी स्तंभ, पत्र आदि भी उपयोगी तथा पठ्नीय बनातेे है। ईश्वर से कामना है कि वह इसे डाॅ. विजय बहादुर सिंह के मार्गदर्शन में विश्व साहित्य के शिखर तक ले जाए।

2 comments:

  1. अखिलेश भाई यह तो बढ़िया काम कर रहे है आप । कथादेश के मीडिया अंक पर भी लिखिये विशेश कर धूलिया जी के लेख पर ब्लॉगिंग पर उनके विचार पठनीय हैं ।

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  2. बहुत अच्छे अखिलेश जी

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