Thursday, July 23, 2009

पंख होते तो उड़ आती रे......संदर्भ हंस

पत्रिका-हंस, अंक-जुलाई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-राजेन्द्र यादव, पृष्ठ-96, संपर्क-अक्षर प्रकाशन प्रा.लि. 2/36, अंसारी रोड़, दरियागंज,नई दिल्ली 110002(भारत)
हंस का जुलाइ 2009 अंक बेजोड़ कहानियों का अंक है। पत्रिका की कहानियों में विशेष रूप से तुम खुश रहो हमारा ओके है(सुषमा मुनीन्द्र), वेनिला आइसक्रीम और चाकलेट सांस(अचला बंसल), कोई बात नहीं पापा(मनीषा तनेजा) अनूठी तथा पठ्नीय रचनाएं है। इन कहानियों में पत्रिका का जनचेतनात्मक स्वरूप उभरकर सामने आता है। हबीब तनवीर के समग्र पर रामशरण जोशी का स्मरण आलेख लेखक की निजता तथा सम्पर्क न होकर नाटकोें के प्रति उनका(हबीब तनवीर) जज्बा तथा नजरिया सामने आता है। इस बार की कविताओं में अरूणा राय तथा चंदन कुमार के अतिरिक्त अन्य कविताएं अप्रभावशाली हैं। पता नहीं क्यों हंस कविता के मामले में कहानियों जैसी छानबीन नहीं करता। ख्यात आलोचक तथा साहित्य मर्मज्ञ डाॅ. नामवर सिंह ग़ज़लों पर लिखा गया आलेख पढ़कर अचरज हुआ कि नामवर जी ग़ज़लों का विश्लेषण भी उतनी ही कुशलता से कर सकते हैं जितना वे कविता कहानी के आपरेशन में माहिर हैं। मुकेश कुमार ने एक बार फिर मीड़िया तथा उसकी भूमिका पर नए सिरे से विचार किया है। पत्रिका में भारत भारद्वाज जी का आलेख महादेवी सृजन पीठ तथा उससे जुड़े विवादों पर समग्र दृष्टिपात कर उससे जुड़े लोगों की भूमिका का सारगर्भित विश्लेषण करता है। पत्रिका की समीक्षाएं तथा अन्य स्थायी स्तंभ पढ़कर यही कहा जा सकता है कि ‘पंख होते तो उड़ आती रे............।’

1 comment:

  1. दरअसल नामवरजी आलोक श्रीवास्तव जी की गज़लों पर बात कर रहे थे जिन्होंने दुष्यंत की परम्परा को आगे बढाने में बडा योगदान क्या है।

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