Friday, May 22, 2009

साहित्य को नए रूप में समझने का प्रयास-संदर्भ कथादेश

पत्रिका-कथादेश, अंक-मई.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-हरिनारायण जी, पृष्ठ-96, मूल्य-20रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-सहयात्रा प्रकाशन प्रा.लि. सी-52, जेड-2, दिलशाद गार्डन, दिल्ली(भारत)
कथादेश के समीक्षित अंक में चार बहुत ही महत्वपूर्ण कहानियां सम्मलित की गई हैं। इनमें वर्तमान समय का युवा, समाज, संस्कृति तथा आधुनिकता के साथ साथ प्राचीन सामाजिक परंपराओं को पढ़ा जा सकता है। कहानियों में रणेन्द(छप्पन छुरी बहत्तर पेंच), नरेन्द्र नागदेव(पेड़ खाली नहीं है), हरीश पाठक(अंतिम किस्त) तथा नीला प्रसाद(आखिरी मुलाकात के इंतजार में), रमेश सेनी(चीकू का पेड़) में आज का समाज देखा जा सकता है। गांधीवादी साहित्यकार स्वर्गीय विष्णु प्रभाकर पर पंकज विष्ट का आलेख तथा प्रकाश कांत की नईम पर रचन ा उल्लेखनीय हैं। बजरंग बिहारी तिवारी ने गुजराती दलित लेखन का गहन विश्लेषण किया है। लेकिन इसमें कहीं कहीं राजनीतिक पुट का अनावश्यक समावेश हो गया है। आशुतोष भारद्वाज तथा अर्चना वर्मा के आलेख में मुझे नया कुछ पढ़ने में नहीं आया। आखिर कब तक हम उन्हीं विषयों को अलग अलग रूपों में प्रस्तुत करते रहेंगे? जयशंकर की डायरी अश्लील कमरे, आत्मीय कमरे कुछ नया कहने का साहस कर सके हैं यह दिल को सुकुन देने वाला है। निर्मला गर्ग तथा अविनाश मिश्र की कविताएं समस्या पूर्ति ही अधिक लगती है। इस बार अविनाश जी प्रकाश झा को आखिर क्यों बधाई देते दिखाई दिये जबकि एक से एक बढ़कर ब्लाॅग इंटरनेट पर उपलब्ध है जिनके सामने प्रकश झा का ब्लाॅग पिद्दी सा मालुम होता है। पत्रिका में संतोष की बात यह है कि चुने हुए लेखकों की जमात के बावजूद भी नया कुछ देने का प्रयास किया गया है जिसे स्वीकार किया जाना चाहिए।

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