Saturday, April 25, 2009

‘भाषा पांडित्य नहीं प्रेम मांगती है’-भाषा स्पंदन

पत्रिका-भाषा स्पंदन, अंक-16, स्वरूप-मासिक, संपादक-डाॅ. मंगल प्रसाद, पृष्ठ-48, मूल्य-10रू.,वार्षिक100 रू., संपर्क- कर्नाटक हिंदी अकादमी, विनायका, 127, एम.आई.जी./के.एच.बी., 5वां ब्लाॅक, कोरमंगला, बेंगलूर, कनार्टक (भारत)
दक्षिण भारत से प्रकाशित होने वाली भाषा स्पंदन आज हिंदी साहित्य की धड़कन बन गई है। पत्रिका में साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचनाओं के दर्शन होते हैं। समीक्षित अंक में यंत्र अनुवाद की समस्या पर श्रीनारायण समीर का उपयोगी आलेख कम्प्यूटर द्वारा अनुवाद की समस्याओं पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालता ैहै। राजेन्द्र परदेसी ने अपने आलेख साहित्य के सामाजिक सरोकार में साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है इस तथ्य की ओर संकेत किया है। डाॅ. सत्यकाम पहाडिया ने विश्व पटल पर हिंदी के बढ़ते कदम पर विचार किया है। पुष्पा रघु की कहानी एक मुट्ठी धूप पठनीय व आज के सदंर्भ में उपयोगी रचना है। सजीवन मयंक, मोहन उपाध्याय, डाॅ. मोहन तिवारी ‘आनंद’ तथा अशोक अंजुम विशेष रूप से प्रभावित करते हैं।Looking for someone special? Register at Shaadi.com Matrimonials इस संुदर अंक के लिए बधाई।

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