Wednesday, April 22, 2009

भाषा को बचाने से ही साहित्य बचेगा-प्रभाकर श्रोत्रिय: संदर्भ समार्वतन

पत्रिका-समावर्तन, अंक-अप्रैल.09, स्वरूप-मासिक, संपादक-निरंजन श्रोत्रिय, पृष्ठ-96, मूल्य-20रू.,वार्षिक200 रू., संपर्क- माधवी 129 दशहरा मैदान उज्जैन म.प्र. (भारत)
राष्ट्रीय स्तर की ख्यातिप्राप्त पत्रिका समार्वतन के समीक्षित अंक में रमेश दवे का आलेख गांधी अतीत, वर्तमान और भविष्य एक विचारणीय तथा पढ़ने योग्य आलेख है। पत्रिका का दूसरा खण्ड ख्यात आलोचक, निबंधकार, संपादक तथा लेखक डाॅ. प्रभाकर श्रोत्रिय के रचनाकर्म पर केन्द्रित है। इस खण्ड में उनकी कविताएं, साक्षात्कार आदि को विस्तार से स्थान दिया गया है। जीवन विवेक की एक मोमबत्ती ऊंची में कुछ गूढ़ गंभीर चिंतन प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। प्रो. कमला प्रसाद का आलेख डाॅ. ओमप्रकाश वालमिकी के उपन्यास जूठन पर गंभीरतापूर्वक विचार करता है। प्रतिष्ठित साहित्यकार एड़गर एलन पो की कहानी ‘शराब का कनस्तर’ मानव जीवन के असली संघर्ष की कथा बन गई है। हिंदी उपन्यास में यथार्थ चिंतन पर पुष्पलता सिंह ने एक विस्तृत खाका खींचा है। श्रीराम दवे, कांति कुमार जैन, विष्णु दत्त नागर, कमेन्द्रु शिशिर की रचनाओं में नई सदी का नयापन दिखाई देता है। पत्रिका के अन्य स्तंभ भी पठनीय व संग्रह योग्य हैं।
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