Wednesday, April 15, 2009

‘मीडिया हमारे समय का सबसे हिंसक शिकारी है और बेरहम दलाल भी’ (संदर्भ वागर्थ)

पत्रिका-वागर्थ, अंक-अप्रैल09, स्वरूप-मासिक, संपादक-विजय बहादुर सिंह, पृष्ठ-146, मूल्य-20रू.(वार्षिक200रू.), संपर्क-भारतीय भाषा परिषद, 36ए, शेक्सपियर शरणि, कोलकाता700.017 (भारत)
पठनीय सामग्री से परिपूर्ण वागर्थ के समीक्षित अंक में आॅस्कर की राजनीति पर मृणाल सेन, के विक्रमसिंह व शशांक दुबे द्वारा आलेख लिखे गए हैं। समकालीन हिंदी कविता में राम और अयोध्या(रघुवंश मणि) तथा भाषा ईश्वर और देरिदा(विनोद शाही) में विषय को विश्लेषणात्मक ढंग से स्पष्ट किया गया है। भारतीय कथा साहित्य की वर्तमान दशा व दिशा पर भालचंद्र जोशी आलेख कुछ चिंता कुछ संदेह हमारे समाज के लिए कुछ विचारणीय बिंदु उठाता है। नवजागरण के पहले राष्ट्रकवि डेरोजियो की मान्यताओं तथा सृजन का संुदर विवेचन कनक तिवारी ने किया है। एक शख्स कहानी सा(कुसुम खेमानी) तथा गांव के आदमी का भारी मन(कृष्ण विहारी मिश्र) पाठक को बांधे रखने में सफल रचनाएं हैं। भाषान्तर के अतर्गत अहमद शामलू, रमानाथ राय तथा वित्त विचार में गिरीश मिश्र साहित्येत्तर विषयों पर साहित्य की सीमा में रहते हुए अच्छे ढंग से प्रकाश डाल सके हैं। कहानियों में भीतरी सन्नाटे(यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’) कंचन का पेड़(मनोहर चमोली मनु) तथा मुन्ना शायर.....(अखिलेश शुक्ल) की रचनाएं विधागत तटबंधों को तोड़कर कथन की प्रस्तुति सुंदर ढंग से कर सकी है। मुन्ना शायर से शादीLooking for someone special? Register at Shaadi.com Matrimonials संबंधी प्रश्न पूछना व उसका विचलित होना कहानी का चरम बिंदु है जहां से असली कथा प्रांरभ् ा होती है। कविताओं में नीलेश रघुवंशी, धु्रव शुक्ल, हरीश भावनी, यश मालवीय किसी वाद विवाद में न पड़कर आम जन के साथ न्याय करते दिखाई पड़ते हैं। पत्रिका के सभी स्थायी स्तंभ, समीक्षाएं तथा अन्य रचनाएं भी संग्रह योग्य व पठनीय बन पड़ी हैं। संपादक श्री विजय बहादुर सिंह ने ‘मीडिया हमारे समय का सबसे हिंसक शिकारी है और बेरहम दलाल भी’ कहकर पाठक की भावनाओं को अपने गंतव्य तक पहुंचा दिया है।

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