Sunday, March 8, 2009

कथा क्रम---------कथा प्रधान त्रैमासिक

पत्रिका-कथा क्रम, अंक-जन.-मार्च2009, स्वरूप-त्रैमासिक, संपादक-शैलेन्द्र सागर, पृष्ठ-120, मूल्य-25रू.,(वार्षिक100रू), संपर्क-3, ट्रांजिट होस्टल, वायरलेस चैराहे के पास, महानगर लखनऊ 226.006 उ.प्र. (भारत)
कथा प्रधान पत्रिका कथा क्रम के इस अंक मंे सात बहुत ही अच्छी कहानियां सम्मलित हैं। इनमें प्रमुख हैं- एपेण्डिक्स(सुषमा मुनीन्द्र), भारत भाग्य विधाता(राकेश कुमार सिंह), यहां प्रेतात्माएं रोती हैं(रमेश कपूर), भंवर(शैलेष), कायर(प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव) एवं साथ-साथ, अलग अलग(राजेश झरपुरे)। सभी कहानियां अपने कथ्य व शिल्प की दृष्टि से अलग अलग पृष्ठभूमि पर लिखी गई हैं। विशेष रूप से एपेण्डिक्स तथा साथ-साथ, अलग अलग कहानियां आज के वातावरण मंे पुरानी पीढी व नवीन विचारों के मध्य समन्वय का रास्ता खोजती है। शैलेष की ‘भंवर’ तथा प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव की कहानी ‘कायर’ अपेक्षाकृत विस्तृत केनवास की कहानियां हैं जिनमें विचारों के टकराव के बजाए बचकर निकलने का तरीका ढूंढने का प्रयास किया गया है। लघुकथाओं में रेस(लोकेन्द्र सिंह कोट), नई जात(आलोक कुमार सातपुते) अच्छी लघुकथाएं हैं। शेष में कुछ भी नया पन नहीं दिखाई देता है। नरेश सक्सेना, कुंवर नारायण, सरिता भालोठिया, राहुल झा तथा कुमार विनोद की कविताएं तथ्यपरक रचनाएं हैं जो आज की कविता के सुर में सुर न मिलाते हुए वैश्विीकरण के नफे नुकसान की ओर संकेत करती हैं। पंकज राग की कविता ‘पापा फुग्गा दो’ में बच्चे ने जो अपेक्षाएं की हैं वे आज के पिता द्वारा शायद ही कभी पूरी की जाती हों। ‘पापा अब तुम भी हंसो’ लिखकर पंकज राग आज के कार्यालयीन कल्चर में जी रहे उस ‘खास आदमी’ को सचेत करते हैं। पत्रिका की सबसे अधिक आकर्षक रचनाएं वरिष्ठ साहित्यकार मधुरेश जी व ख्यात कथाकार स्वयंप्रकाश जी की रचनाएं हैं। इन रचनाओं से कथा का क्रम पूरा हो सका है। अन्य स्थायी स्तंभ, रपट, प्रसंगवश आदि भी पत्रिका को उपयोगी तथा पठ्नीय बनाते हैं। (पत्रिका पर सक्षिप्त समीक्षा)

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