Friday, February 13, 2009

सृजन की आंच...हिंदी साहित्य के लिए

पत्रिका-सृजन की आंच, अंक-अक्टूबर-दिसम्बर।08,स्वरूप-द्वैमासिक, संपादक-डाॅ. माया सिंह, मूल्य-20रू.वार्षिक-180रू. संपर्क-21,22 शुभालय विला, बरखेड़ा, भेल, भोपाल म.प्र. (भारत)
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से प्रकाशित होने वाली नव पत्रिका ‘सृजन की आंच’ का यह दूसरा ही अंक है। इसमें हिंदी के जाने मान आलोचक-विचारक डाॅ. रामविलास शर्मा का आलेख ‘भाषा विज्ञानः अंध विश्वास एवं रूढ़िवाद’ (भारतीय साहित्य की भूमिका से साभार) प्रकाशित किया गया है। यह आलेख भाषा विज्ञान की व्याख्या विश्व की अन्य भाषाओं में निहित ध्वनियों तथा उनकी रचना शैली पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालता है। ‘संत साहित्य की उपादेयता पर डाॅ. राधा वल्लभ शर्मा ने अपने आलेख में सुंदर ढंग से स्पष्ट किया है कि हमारे संत किसी भाषा, संप्रदाय अथवा बोली वाणी के समर्थक न होकर समाज के विकास के लिए कृतसंकल्पित थे। डाॅ. पवन मिश्रा ने ‘भारतीय चिंतन परंपरा में शक्ति की उपासना’ आलेख मंे जनजातिय एवं दलित समाज के देवी देवताओं पर कुछ भी नहीं लिखा है जिसकी वजह से यह आलेख कुछ अधूरा-सा लगता है। नारायण चंद्र भावे, अंशुमान सिंह, कुवेर नाथ राय के आलेख कुछ नया दे सके है इसलिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिए। कविताएं, कहानियां तथा साहित्य की अन्य विधाओं पर इस पत्रिका में अधिक सामग्री न होते हुए भी पत्रिका प्रकाशन के प्रयास का स्वागत किया जाना चाहिए।

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